ओबीसी आरक्षण पर हाईकोर्ट में बड़ा मंथन: इंदिरा साहनी फैसले; 50% सीमा और जाति व्यवस्था पर हुई अहम बहस
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, जबलपुर।
मध्यप्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को 27 प्रतिशत आरक्षण देने के मामले में जबलपुर हाईकोर्ट में गुरुवार को हुई सुनवाई कई अहम संवैधानिक सवालों के केंद्र में रही। सुनवाई के दौरान ओबीसी पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के चर्चित इंदिरा साहनी फैसले, 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा, क्वांटिफिएबल डेटा और भारतीय समाज की जातिगत व्यवस्था पर विस्तृत तर्क रखे। मामले की अगली सुनवाई 30 जुलाई को दोपहर 12 बजे होगी।
क्या है पूरा मामला?
मध्यप्रदेश में ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का मामला लंबे समय से हाईकोर्ट में विचाराधीन है। कुछ याचिकाकर्ता 27 प्रतिशत आरक्षण का विरोध कर रहे हैं, जबकि ओबीसी पक्ष का कहना है कि उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण तय किया जाना चाहिए। फिलहाल कोर्ट में 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा, संविधान की व्याख्या और प्रतिनिधित्व के सिद्धांत पर बहस जारी है।
इंदिरा साहनी फैसले पर उठाए सवाल
जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की विशेष खंडपीठ के समक्ष ओबीसी पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विनायक प्रसाद शाह ने दलील दी कि इंदिरा साहनी का फैसला संविधान नहीं है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का कार्य कानून की व्याख्या करना है, नया कानून बनाना नहीं।
उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया कि मामले का निर्णय संविधान और विधिक प्रावधानों के आधार पर किया जाए, न कि केवल न्यायिक टिप्पणियों के आधार पर। इसी संदर्भ में 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा पर भी सवाल उठाए गए।
आबादी के अनुपात में आरक्षण की मांग दोहराई
ओबीसी पक्ष ने कोर्ट में कहा कि संविधान में जहां-जहां प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की गई है, वहां जनसंख्या को आधार माना गया है। राष्ट्रपति चुनाव, लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकायों के उदाहरण देते हुए अधिवक्ता ने तर्क दिया कि अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) को भी आबादी के अनुपात में आरक्षण मिला है, इसलिए ओबीसी के साथ भी यही सिद्धांत अपनाया जाना चाहिए।
उनका कहना था कि मौजूदा 27 प्रतिशत आरक्षण ओबीसी की वास्तविक जनसंख्या के अनुरूप नहीं है।
क्वांटिफिएबल डेटा पर भी हुई बहस
सुनवाई के दौरान क्वांटिफिएबल डेटा का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। ओबीसी पक्ष ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने यह जरूर बताया है कि किन आधारों पर गणना नहीं होगी, लेकिन प्रतिनिधित्व तय करने का स्पष्ट तरीका किसी फैसले में निर्धारित नहीं किया गया है। ऐसे में राज्यों के सामने व्यावहारिक कठिनाइयां पैदा होती हैं और इस विषय पर स्पष्ट कानूनी व्याख्या की आवश्यकता है।
ऋग्वेद और मानव धर्मशास्त्र का भी हुआ उल्लेख
बहस के दौरान भारतीय समाज की जातिगत व्यवस्था के ऐतिहासिक पहलुओं का भी उल्लेख किया गया। ओबीसी पक्ष ने कोर्ट के समक्ष कहा कि ऋग्वेद के कुछ संदर्भों से जाति व्यवस्था की शुरुआत मानी जाती है और बाद में मानव धर्मशास्त्र के आधार पर समाज में जातिगत विभाजन मजबूत हुआ। इसी ऐतिहासिक सामाजिक असमानता को दूर करने के लिए संविधान में आरक्षण की व्यवस्था की गई।
अधिवक्ता ने कहा कि आरक्षण केवल सामाजिक कल्याण की योजना नहीं, बल्कि शासन और प्रशासन में सभी वर्गों की समान भागीदारी सुनिश्चित करने का संवैधानिक माध्यम है।
तय समय के बाद भी चलती रही सुनवाई
मामले की सुनवाई शाम 4:30 बजे तक निर्धारित थी, लेकिन कोर्ट ने अतिरिक्त समय देते हुए करीब आधे घंटे तक बहस सुनी। ओबीसी पक्ष ने कहा कि अभी कई महत्वपूर्ण कानूनी पहलुओं पर उनके तर्क शेष हैं, जिन्हें अगली सुनवाई में रखा जाएगा।
सरकार की दलील अभी बाकी
पहले कार्यक्रम के अनुसार राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता के.एम. नटराजन को गुरुवार और शुक्रवार को पक्ष रखना था, लेकिन अन्य याचिकाकर्ताओं की बहस पूरी नहीं हो सकी। अब हाईकोर्ट ने निर्देश दिया है कि पहले सभी पक्ष अपनी दलीलें पूरी करेंगे, उसके बाद राज्य सरकार अपना पक्ष रखेगी।
अगली सुनवाई 30 जुलाई को
हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 30 जुलाई को दोपहर 12 बजे निर्धारित की है। माना जा रहा है कि आने वाली सुनवाई में सरकार की दलीलों के बाद इस बहुचर्चित मामले में बहस निर्णायक चरण की ओर बढ़ सकती है।
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