4 साल से एलओसी: विदेश में बैठा सनपाल फिर भी शहपुरा में उसके नाम चली जमीन की फाइल
KHULASA FIRST
संवाददाता

4 नवंबर 2025 को लगाया आवेदन इसके बाद जमीन का हुआ नामांतरण अब राजस्व रिकॉर्ड से उठे बड़े सवाल
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
भारतीय जांच एजेंसियों की फाइलों में लंबे समय से फरार बताए जा रहे सतीश सनपाल की कहानी अब सट्टे और दुबई के कारोबारी नेटवर्क से निकलकर जबलपुर की जमीन तक पहुंच गई है। नया सवाल यह है कि जिस व्यक्ति के खिलाफ वर्षों पहले लुकआउट सर्कुलर (एलओसी) जारी होने की बात सामने आई और जो लंबे समय से विदेश में रह रहा है, उसके नाम पर शहपुरा की जमीन के नामांतरण की प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ी? मामले से जुड़े दस्तावेजों के मुताबिक इस जमीन के नामांतरण के लिए 4 नवंबर 2025 को आवेदन लगाया गया था।
इसके बाद जमीन सतीश सनपाल के नाम हस्तांतरित/नामांतरित होने की बात सामने आई है। अब यही तारीख और इसके बाद पूरी हुई राजस्व प्रक्रिया इस पूरे मामले का सबसे अहम बिंदु बन गई है।
सवाल यह नहीं है कि विदेश में रह रहा व्यक्ति जमीन का मालिक नहीं हो सकता। सवाल यह है कि नामांतरण की प्रक्रिया में आवेदन किसने लगाया, कौन से दस्तावेज लगाए गए, किस आधार पर राजस्व रिकॉर्ड बदला गया और सनपाल की ओर से प्रक्रिया किसने पूरी की? यदि पावर ऑफ अटॉर्नी या अधिकृत प्रतिनिधि के जरिए यह प्रक्रिया हुई तो उसका रिकॉर्ड क्या है? यही वे बिंदु हैं, जिनकी जांच इस मामले की वास्तविक तस्वीर साफ कर सकती है।
सट्टे का काम बुआ के बेटे के साथ शुरू करने का दावा : सनपाल की कहानी में एक और कड़ी अब सामने आई है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, उसने जबलपुर में ऑनलाइन सट्टे का काम अपनी बुआ के बेटे गुरमीत आहूजा के साथ शुरू किया था।
दावा है कि कारोबार चल निकलने के बाद सनपाल विदेश चला गया और वहीं से नेटवर्क संभालने लगा। दूसरी ओर, गुरमीत आहूजा के जबलपुर में रहकर सनपाल के काम को संभालने की बात भी सामने आ रही है। यदि जांच में यह कड़ी पुष्ट होती है तो विदेश में बैठे सनपाल और जबलपुर में मौजूद स्थानीय नेटवर्क के बीच संबंधों की जांच महत्वपूर्ण हो जाएगी।
एलओसी के बाद भी जमीन की फाइल कैसे चली?... सनपाल के खिलाफ अगस्त 2022 में जबलपुर पुलिस के प्रतिवेदन के आधार पर ब्यूरो ऑफ इमिग्रेशन द्वारा एलओसी जारी किए जाने की जानकारी सामने आई थी।
पुलिस ने उस दौर में उसे कथित ऑनलाइन सट्टा नेटवर्क से जोड़ते हुए तलाश शुरू की थी। अब करीब चार साल बाद 4 नवंबर 2025 के जमीन नामांतरण आवेदन ने एक अलग सवाल खड़ा कर दिया है। एलओसी का अर्थ जमीन खरीदने या नामांतरण पर स्वतः रोक होना नहीं है, लेकिन ऐसी स्थिति में राजस्व रिकॉर्ड में हुए प्रत्येक कदम के दस्तावेज और प्रक्रिया की जांच बेहद अहम हो जाती है।
यानी जांच का फोकस अब इन सवालों पर होना चाहिए कि 4 नवंबर 2025 को नामांतरण का आवेदन किसने लगाया? आवेदन के साथ कौन-कौन से दस्तावेज लगाए गए? क्या सनपाल की ओर से कोई अधिकृत प्रतिनिधि मौजूद था? पावर ऑफ अटॉर्नी थी तो वह कब और किसके नाम जारी हुई?
राजस्व रिकॉर्ड में सनपाल का नाम किस आधार पर दर्ज किया गया? इन सवालों के जवाब सामने आते ही स्पष्ट होगा कि यह सामान्य राजस्व प्रक्रिया थी या इसमें किसी स्तर पर नियमों की अनदेखी हुई।
हाईकोर्ट में भी नहीं मिली राहत
सनपाल के खिलाफ जबलपुर के अलग-अलग थानों में दर्ज मामलों को लेकर मामला अब हाईकोर्ट तक पहुंच चुका है। अगस्त 2026 में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने उसके द्वारा एफआईआर और आपराधिक कार्रवाई रद्द करने की मांग वाली याचिकाओं में राहत देने से इनकार किया।
अदालत ने कहा कि जांच के दौरान जुटाई गई सामग्री और आरोपों की वास्तविकता का परीक्षण ट्रायल के दौरान होना चाहिए।एक मामले में अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि सनपाल कथित तौर पर विदेश में था और घटना स्थल पर मौजूद नहीं था, उसके खिलाफ कार्रवाई खत्म नहीं की जा सकती। यदि अभियोजन अन्य लोगों, कंपनियों, वित्तीय लेनदेन या संचार के माध्यम से उसकी कथित भूमिका साबित करना चाहता है तो इसका परीक्षण ट्रायल में होगा।
जबलपुर में पहले भी कार्रवाई, अब जमीन का नया एंगल... सनपाल से जुड़े मामलों में जबलपुर पुलिस की कार्रवाई पहले भी सामने आती रही है। 2022 में कथित सट्टा गतिविधियों से जुड़े एक मामले में पुलिस ने कार्रवाई की थी।
हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में एक मामले में सह-आरोपियों से 23 लाख रुपए की नकदी बरामद होने और जांच के दौरान सनपाल को कथित नेटवर्क से जोड़ने वाली सामग्री जुटाए जाने का उल्लेख है।
एक अन्य मामले में हाईकोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार पुलिस ने सनपाल को कथित सट्टा नेटवर्क का मास्टरमाइंड बताते हुए जांच की थी और चार्जशीट में उसके खिलाफ सामग्री होने का दावा किया था। अदालत ने उस स्तर पर इन आरोपों की अंतिम सत्यता तय नहीं की, बल्कि उन्हें ट्रायल में जांचे जाने योग्य माना।
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