भूमाफिया, चंदा और देवस्थान: क्या मंदिर अब आस्था नहीं; कमाई का सबसे बड़ा कारोबार बन गए हैं
KHULASA FIRST
संवाददाता

राम मंदिर से लेकर मध्य प्रदेश तक... दान, चंदे और देवस्थान की जमीनों पर उठते सवाल, आखिर धर्म की संपत्ति का सबसे बड़ा दुश्मन कौन?
अंकित शाह 99264-99912 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
देश में मंदिरों में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाया जाने वाला दान, चढ़ावा और सदियों पहले धर्म रक्षा के उद्देश्य से दान की गई बेशकीमती जमीनें आज कथित तौर पर सबसे बड़े संगठित भ्रष्टाचार का केंद्र बनती दिखाई दे रही हैं।
हाल के वर्षों में मंदिरों से जुड़े दान और वित्तीय अनियमितताओं को लेकर उठे विवादों के बीच अब मध्यप्रदेश, विशेषकर इंदौर में देवस्थान की जमीनों पर कब्जे, फर्जी नामांतरण, अवैध कॉलोनियों और प्रशासनिक मिलीभगत के गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं।
इतिहास गवाह है कि आक्रमणकारियों ने मंदिरों को लूटा, तोड़ा और अनेक धार्मिक स्थलों पर कब्जे किए, लेकिन आज जब देश स्वतंत्र है, तब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर मंदिरों की संपत्ति किसके संरक्षण में है और यदि वह सुरक्षित नहीं है तो जिम्मेदार कौन है? यह प्रश्न केवल आस्था का नहीं, बल्कि सार्वजनिक संपत्ति, कानून और प्रशासनिक जवाबदेही का भी है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि विभिन्न मामलों में लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होना शेष है। जिन व्यक्तियों या अधिकारियों के नाम शिकायतों में आए हैं, उनके विरुद्ध आरोप सिद्ध होना अभी बाकी है।
दान की जमीनें बनी सोने की खान, फिर शुरू हुआ कब्जे का खेल... सदियों से राजा-महाराजाओं, जागीरदारों और समाज के दानदाताओं ने मंदिरों के भरण-पोषण, गौसेवा और धार्मिक गतिविधियों के लिए विशाल कृषि भूमि और संपत्तियां दान की थीं। समय के साथ शहरों के विस्तार ने इन जमीनों का बाजार मूल्य हजारों करोड़ रुपये तक पहुंचा दिया।
विधानसभा में सरकार ने माना- इंदौर में 1015 शासन संधारित मंदिर...धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग से विधानसभा में पूछे गए प्रश्न क्रमांक 873 के उत्तर में सरकार ने स्वीकार किया कि इंदौर जिले में 1015 शासन संधारित मंदिर हैं।
यह स्वीकारोक्ति इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि दूसरी ओर लंबे समय से अनेक मंदिरों की जमीनों पर कथित अतिक्रमण और अवैध उपयोग की शिकायतें लंबित हैं। प्रश्न में मंदिरों के जीर्णोद्धार, संरक्षण और विकास की जानकारी मांगी गई थी, जबकि अनेक शिकायतकर्ता सवाल उठा रहे हैं कि जब मंदिरों की मूल संपत्ति ही सुरक्षित नहीं है तो केवल जीर्णोद्धार पर्याप्त कैसे माना जा सकता है।
40 सरकारी मंदिरों की जमीनों पर कब्जे के आरोप
उपलब्ध राजस्व अभिलेखों और शिकायतों के अनुसार इंदौर जिले के लगभग 40 सरकारी मंदिरों की भूमि पर अतिक्रमण या अवैध उपयोग के आरोप लगाए गए हैं। इनमें मल्हारगंज, जूनी इंदौर, बिचौली हप्सी, हातोद, देपालपुर, सांवेर और राऊ तहसीलों के मंदिर शामिल बताए गए हैं।
कई मामलों में कलेक्टर, कमिश्नर व्यवस्थापक के रूप में दर्ज हैं, जबकि आरोप है कि भूमि पर निजी कब्जे, व्यावसायिक गतिविधियां अथवा सरकारी परियोजनाएं संचालित हो रही हैं। शिकायतों में मेडिकल कॉलेज,आईडीए योजनाएं,बस डिपो, पानी की टंकी, बैंक, पेट्रोल पंप, गोदाम, कॉलोनियां, फैक्ट्री, धर्मशाला, गोशाला और अन्य निर्माणों का उल्लेख किया गया है।
प्रशासन पर सबसे बड़ा सवाल
यदि भूमि आज भी राजस्व रिकॉर्ड में देवस्थान अथवा शासन के नाम दर्ज है तो—
निजी नामांतरण कैसे हुए?
रजिस्ट्रियां किस आधार पर हुईं?
सीमांकन और अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
जिन अधिकारियों पर संरक्षण देने के आरोप हैं, उनकी जवाबदेही कब तय होगी?
वर्षों से लंबित शिकायतों का अंतिम परिणाम क्या है?
विदुर नगर से लेकर अहीरखेड़ी तक…सरकारी जमीन कैसे बनी निजी संपत्ति?
अहीरखेड़ी की 443 एकड़ भूमि और विदुर नगर सह. संस्था से जुड़े मामलों में भी गंभीर आरोप हैं। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि शासकीय भूमि बाद में निजी नामों पर दर्ज हुई, उसके बाद हजारों प्लॉटों का आवंटन, फर्जी रजिस्ट्रियां और अवैध कॉलोनियों का विकास हुआ।
आरोपों के अनुसार इससे शासन को हजारों करोड़ रुपये का राजस्व नुकसान हुआ। इन मामलों की भी विभिन्न स्तरों पर जांच और शिकायतें वर्षों से लंबित बताई जाती हैं।
प्राचीन महादेव मंदिर की भूमि पर सबसे बड़ा विवाद
इंदौर के केशरबाग क्षेत्र स्थित प्राचीन श्री महादेव मंदिर चन्द्रहास्य देवस्थल की कथित लगभग 35 एकड़ इनामी भूमि को लेकर गंभीर विवाद सामने आया है। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि होलकर स्टेट और मिसल बंदोबस्त के ऐतिहासिक रिकॉर्ड में यह भूमि मंदिर के नाम दर्ज थी।
आरोप है कि बाद में राजस्व अभिलेखों में हेरफेर कर निजी नाम दर्ज किए गए और आगे चलकर भूमि का उपयोग कॉलोनियां विकसित करने तथा अन्य निजी प्रयोजनों के लिए किया गया।
मामले में कई स्तरों पर शिकायतें, जांच की मांग और न्यायिक हस्तक्षेप की अपील की गई है। आरोप यह भी है कि जांच लंबित रहने से अब तक भूमि का सीमांकन और वास्तविक स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी।
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