जानिये भोजशाला पर हाईकोर्ट के फैसले में क्या बना आधार: इन प्रणामों के आधार पर हुआ धार्मिक स्वरूप का निर्धारण; किस प्रकरण की तरह माना
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, धार।
ऐतिहासिक भोजशाला को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने अपने विस्तृत फैसले में स्पष्ट किया है कि इस स्थल के धार्मिक स्वरूप का निर्धारण केवल आस्था के आधार पर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर किया गया है। न्यायालय ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट, संस्कृत शिलालेख, स्थापत्य अवशेष और ऐतिहासिक अभिलेखों को प्रमुख आधार मानते हुए इसे देवी वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर माना है।
अयोध्या प्रकरण जैसे सिद्धांतों का अनुसरण
न्यायालय ने कहा कि धार्मिक आस्था को केवल तर्क से नहीं परखा जा सकता, बल्कि उसकी निरंतर परंपरा भी महत्वपूर्ण होती है। अयोध्या प्रकरण की तरह यहां भी पुरातात्विक प्रमाण, धार्मिक चिह्न, ऐतिहासिक दस्तावेज और पूजा की परंपरा को समग्र रूप से देखा गया। न्यायालय के अनुसार उपलब्ध साक्ष्य यह संकेत देते हैं कि यह परिसर मूल रूप से संस्कृत शिक्षा और देवी सरस्वती की उपासना से जुड़ा था।
पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट को माना विश्वसनीय
न्यायालय ने कहा कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण एक विशेषज्ञ संस्था है, जिसकी रिपोर्ट को सामान्य मत नहीं माना जा सकता। अदालत के अनुसार पुरातत्व विज्ञान ठोस साक्ष्य प्रस्तुत करता है और उसकी रिपोर्ट का समग्र मूल्यांकन आवश्यक है।
पुरानी संरचना के अवशेषों का उपयोग
वैज्ञानिक सर्वेक्षण, भू-भौतिकीय परीक्षण और उत्खनन से यह तथ्य सामने आया कि वर्तमान संरचना एक प्राचीन भव्य निर्माण के ऊपर खड़ी है। पुराने मंदिर के स्तंभ, मूर्तियां, बीम और शिलालेखों को काटकर या परिवर्तित कर वर्तमान ढांचे में उपयोग किया गया।
106 खंभे और 82 स्तंभ बने अहम प्रमाण
परिसर में मिले 106 खंभों और 82 स्तंभों की शैली मंदिरों जैसी पाई गई। इनमें देवी-देवताओं और मानव आकृतियों के चिह्न मिले, जिन्हें बाद में क्षतिग्रस्त किया गया था। न्यायालय ने इसे महत्वपूर्ण साक्ष्य माना।
संस्कृत शिलालेखों से मिला सरस्वती उपासना का प्रमाण
150 से अधिक संस्कृत और प्राकृत शिलालेखों में ‘सरस्वत्यै नमः’ और ‘ॐ नमः शिवाय’ जैसे उल्लेख मिले। एक प्रमुख शिलालेख में “शारदा देवी के सदन” में नाट्य प्रस्तुति का उल्लेख है, जिसे न्यायालय ने शिक्षा और सरस्वती उपासना का संकेत माना।
ऐतिहासिक दस्तावेजों ने किया समर्थन
विभिन्न ऐतिहासिक ग्रंथों और अभिलेखों में भोजशाला को राजा भोज कालीन संस्कृत शिक्षा केंद्र बताया गया है। न्यायालय ने इन्हें सहायक प्रमाण के रूप में महत्वपूर्ण माना।
मुस्लिम और जैन पक्ष के दावे खारिज
न्यायालय ने कहा कि यह साबित करने के पर्याप्त प्रमाण नहीं दिए गए कि यह स्थल प्रारंभ से मस्जिद था या वक्फ संपत्ति है। केवल लंबे समय तक उपयोग से स्वामित्व सिद्ध नहीं होता।
वहीं जैन पक्ष के दावे को भी निर्णायक नहीं माना गया और कहा गया कि प्राचीन काल में विभिन्न परंपराओं का सह-अस्तित्व सामान्य बात थी।
ऋग्वेद का उल्लेख, सरस्वती को माना ज्ञान की देवी
न्यायालय ने ऋग्वेद का हवाला देते हुए कहा कि सरस्वती ज्ञान की देवी हैं और भोजशाला का संबंध संस्कृत शिक्षा से रहा है। ऐसे में यह निष्कर्ष उचित है कि यह स्थल सरस्वती उपासना से जुड़ा रहा होगा।
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