जानिये प्रदेश में कब तक पड़ सकती हैं फुहारें: किस पूर्वानुमान से बढ़ रही चिंता; कितने जिलों में सामान्य मानसून के संकेत
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, भोपाल।
मध्य प्रदेश में इस वर्ष मानसून को लेकर मौसम विभाग का पूर्वानुमान चिंता बढ़ाने वाला है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अनुसार प्रदेश में इस बार मानसून सामान्य से कमजोर रह सकता है। अल-नीनो प्रभाव के चलते मानसून की रफ्तार और वर्षा का पैटर्न प्रभावित होने की आशंका जताई गई है। इसके कारण राज्य के अधिकांश जिलों में सामान्य से कम बारिश होने का अनुमान है।
मौसम विभाग के ताजा पूर्वानुमान के अनुसार प्रदेश में मानसून की एंट्री भी तय समय से लगभग 5 से 8 दिन देरी से हो सकती है। सामान्य तौर पर मध्य प्रदेश में मानसून जून के मध्य तक पहुंच जाता है, लेकिन इस बार इसके 20 जून के बाद प्रवेश करने की संभावना जताई गई है।
औसत से कम बारिश का अनुमान
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार मध्य प्रदेश में सामान्य तौर पर लगभग 37.3 इंच वर्षा दर्ज की जाती है। हालांकि इस बार राज्य में केवल 30 से 32 इंच तक बारिश होने का अनुमान लगाया गया है। यदि यह अनुमान सही साबित होता है तो प्रदेश में कृषि, जल संसाधनों और पेयजल व्यवस्था पर व्यापक असर पड़ सकता है। पूर्वानुमान के मुताबिक भोपाल, इंदौर, जबलपुर सहित प्रदेश के 47 जिलों में सामान्य से कम वर्षा हो सकती है।
केवल 8 जिलों में सामान्य मानसून के संकेत
मौसम विभाग के अनुसार प्रदेश के कुछ जिलों में सामान्य या सामान्य से अधिक वर्षा होने की संभावना बनी हुई है। इनमें ग्वालियर, भिंड, नीमच, दमोह, अनूपपुर, उज्जैन, अलीराजपुर और बड़वानी जैसे जिले शामिल हैं।
वहीं अशोकनगर, सागर, नर्मदापुरम, रायसेन, मंडला, डिंडौरी, खरगोन, बुरहानपुर और नरसिंहपुर जैसे जिलों में सामान्य से 10 से 15 प्रतिशत तक कम वर्षा होने का अनुमान है। अन्य अधिकांश जिलों में सामान्य वर्षा की तुलना में लगभग 90 प्रतिशत तक ही बारिश होने की संभावना जताई गई है।
जून में कमजोर रहेगा मानसून
मौसम विभाग का कहना है कि जून महीने में बारिश सामान्य से कम रह सकती है। हालांकि जुलाई में मानसून कुछ बेहतर प्रदर्शन कर सकता है और वर्षा गतिविधियों में तेजी आने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का मानना है कि मानसून के शुरुआती दौर में कमजोरी का असर खरीफ फसलों की बुवाई पर पड़ सकता है। किसान समुदाय की नजर अब जुलाई माह की बारिश पर टिकी हुई है।
अल-नीनो बना प्रमुख कारण
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार इस बार कमजोर मानसून की सबसे बड़ी वजह अल-नीनो प्रभाव को माना जा रहा है। अल-नीनो के दौरान प्रशांत महासागर के तापमान में असामान्य वृद्धि होती है, जिसका असर भारतीय मानसून पर भी पड़ता है।
इसके कारण मानसूनी हवाओं की तीव्रता कमजोर हो सकती है और वर्षा का वितरण असंतुलित हो सकता है। कई बार इसके चलते कुछ क्षेत्रों में सामान्य से कम और कुछ स्थानों पर असामान्य वर्षा देखने को मिलती है।
खेती पर पड़ सकता है असर
पिछले दो वर्षों में मध्य प्रदेश में सामान्य से अधिक वर्षा दर्ज की गई थी, जिससे कृषि उत्पादन को बड़ा लाभ मिला था। विशेष रूप से सोयाबीन, गेहूं और चना जैसी प्रमुख फसलों की पैदावार में वृद्धि हुई थी।
सोयाबीन उत्पादन में प्रति हेक्टेयर लगभग दो क्विंटल तक की वृद्धि दर्ज की गई थी। वहीं गेहूं उत्पादन भी बेहतर रहा, जिसके चलते सरकार ने रिकॉर्ड स्तर पर समर्थन मूल्य पर खरीद की थी। लेकिन इस वर्ष यदि वर्षा सामान्य से कम होती है तो खरीफ फसलों की बुवाई, उत्पादन और किसानों की आय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
जल संकट बढ़ने की आशंका
कम बारिश का असर केवल खेती तक सीमित नहीं रहेगा। प्रदेश के कई शहर पहले से ही पेयजल संकट का सामना कर रहे हैं। इंदौर, ग्वालियर और अन्य शहरों में पानी की कमी को लेकर लोगों को परेशानी झेलनी पड़ रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मानसून कमजोर रहा तो आने वाले महीनों में जलाशयों का जलस्तर प्रभावित हो सकता है, जिससे पेयजल और सिंचाई दोनों के लिए संकट गहरा सकता है।
मानसून पूर्व बारिश से मिली राहत
हालांकि मानसून की औपचारिक एंट्री से पहले प्रदेश के कई हिस्सों में प्री-मानसून गतिविधियां शुरू हो चुकी हैं। शुक्रवार को ग्वालियर, मुरैना सहित कई जिलों में बारिश दर्ज की गई, जिससे लोगों को गर्मी से कुछ राहत मिली।
फिर भी मौसम विभाग का कहना है कि मानसून की वास्तविक स्थिति का आकलन जून और जुलाई की वर्षा गतिविधियों के आधार पर ही स्पष्ट हो सकेगा। फिलहाल प्रदेश में किसानों, जल प्रबंधन एजेंसियों और प्रशासन की नजर आगामी मानसून सीजन पर टिकी हुई है, क्योंकि इस बार की बारिश कृषि उत्पादन, जल उपलब्धता और आम जनजीवन पर बड़ा असर डाल सकती है।
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