देवभूमि का गुप्त खजाना खरसाली: जहां आज भी धड़कता है यमुनोत्री का हृदय
KHULASA FIRST
संवाददाता

यमुनोत्री की ‘आत्मा’ का ठिकाना, जहां आज भी जीवित हैं पांडव काल की परंपराएं
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड को ‘देवभूमि’ यूं ही नहीं कहा जाता। यहां के हर पत्थर में एक कहानी और हर गांव में एक परंपरा सांस लेती है। यमुनोत्री नेशनल हाईवे के अंतिम पड़ाव जानकी चट्टी से महज एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित ‘खरसाली’ एक ऐसा ही गांव है, जो केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं बल्कि आस्था का जीवंत केंद्र है।
अधिकांश पर्यटक इसे केवल यमुनोत्री के रास्ते में आने वाला एक पड़ाव मानते हैं, लेकिन गहराई से देखने पर पता चलता है कि यमुनोत्री की धार्मिक सत्ता का असली केंद्र यही है।
शीतकालीन प्रवास- जब ‘खरसाली’ बनती है उत्तर की काशी... हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, भाई-दूज (दीपावली के बाद) के दिन जब यमुनोत्री धाम के कपाट बंद होते हैं, तो यमुना जी की डोली अपनी मायके यानी खरसाली के लिए प्रस्थान करती है।
अगले छह महीनों तक मां यमुना यहीं विराजमान रहती हैं। परंपरा का निर्वाह करते हुए डोली के स्वागत के लिए पूरा गांव पारंपरिक वाद्य यंत्रों (ढोल-दमोह) और लोक गीतों से गूंज उठता है।
सर्दियों में जब ऊपरी हिमालय बर्फ की सफेद चादर से ढंक जाता है और आम आदमी के लिए वहां पहुंचना असंभव होता है, तब खरसाली ही वह स्थान है जहां श्रद्धालु यमुना जी के दर्शन कर पुण्य कमाते हैं।
शनिदेव का प्राचीन मंदिर- स्थापत्य और सुरक्षा का अद्भुत संगम... खरसाली की सबसे बड़ी विशेषता यहां स्थित शनिदेव मंदिर है। मान्यता है कि शनिदेव मां यमुना के भाई हैं और वे यहां अपनी बहन की रक्षा के लिए सदियों से तैनात हैं।
स्थानीय निवासियों का दावा है कि इस मंदिर का निर्माण पांडवों ने किया था। बिना किसी आधुनिक मशीनरी के, विशाल पत्थरों और देवदार की लकड़ियों को इतनी ऊंचाई पर कैसे जोड़ा गया, यह आज भी एक रहस्य है।
यह मंदिर पांच मंजिला है और पूरी तरह से पारंपरिक ‘कोटी-बनाल’ शैली में बना है। पत्थर और लकड़ी की वैकल्पिक परतों का उपयोग इसे इतना लचीला बनाता है कि सदियों से आए भीषण भूकंपों का भी इस पर कोई असर नहीं हुआ। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि गांव पर कोई भी विपत्ति आने से पहले शनिदेव की मूर्ति के हाव-भाव में बदलाव आ जाता है, जिसे गांव के पुजारी पहले ही भांप लेते हैं।
नक्काशीदार बालकनियां और स्लेट... खरसाली में समय जैसे ठहर सा गया है। यहां के घर लकड़ी की नक्काशीदार बालकनियों और स्लेट (पत्थर) की छतों से सजे हैं। यहां का समाज आज भी सामूहिक खेती और पशुपालन पर टिका है।
सर्दियों में जब खेती संभव नहीं होती, तब यहां के लोग ऊन कताई और अपनी पारंपरिक कलाओं में व्यस्त रहते हैं। जहां यमुनोत्री में व्यावसायिकता बढ़ रही है, वहीं खरसाली अभी भी ‘इको-टूरिज्म’ और ‘होमस्टे’ का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करता है। यहां पर्यटक केवल यात्री बनकर नहीं, बल्कि मेहमान बनकर आते हैं।
पर्यटन मानचित्र पर नहीं आ पाया... इतनी समृद्ध विरासत होने के बावजूद, खरसाली अभी भी उस तरह के पर्यटन मानचित्र पर नहीं आ पाया है जिसका वह हकदार है। यहां से हिमालय की चोटियों का जो नजारा दिखता है, वह किसी भी महंगे हिल स्टेशन से कहीं बेहतर है। लोगों का कहना है कि सरकार को चाहिए कि इस ‘शीतकालीन यमुनोत्री’ को एक स्वतंत्र पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करे ताकि स्थानीय युवाओं को पलायन न करना पड़े।
हिमालय की शांति और प्राचीन भारत की झलक... इस जगह का निकटतम हवाई अड्डा जौली ग्रांट (देहरादून) है। ऋषिकेश या देहरादून से उत्तरकाशी होते हुए जानकी चट्टी तक बस या टैक्सी उपलब्ध है। वहां से पैदल मार्ग या घोड़े-खच्चर के जरिए खरसाली पहुंचा जा सकता है।
खरसाली गांव हमें सिखाता है कि श्रद्धा केवल ऊंची चोटियों पर नहीं, बल्कि उन जड़ों में भी है जो सदियों से अपनी संस्कृति को सींच रही हैं। यदि आप हिमालय की शांति और प्राचीन भारत की झलक देखना चाहते हैं, तो यमुनोत्री यात्रा में खरसाली के लिए एक दिन अतिरिक्त जरूर रखें। यह ‘अनजाना पक्ष’ आपकी यात्रा को पूर्ण बना देगा।
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