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महाऋषि पुलस्त की तपस्थली है: श्री बूढ़ा अमरनाथ धाम

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संवाददाता

08 जुलाई 2026, 7:11 pm
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महाऋषि पुलस्त की तपस्थली है

जहां स्वयंभू ‘बाबा चट्टानी’ के रूप में विराजे हैं भगवान शिव; रानी चन्द्रिका की अटूट भक्ति, बूढ़े साधु के रूप में शिव के दर्शन और स्वामी चन्द्रचूढ़ मुनि द्वारा धाम के पुनः प्रकटीकरण से जुड़ी है हजारों वर्षों पुरानी आस्था; सावन और रक्षा बंधन पर उमड़ता है श्रद्धालुओं का सैलाब

संदीप सेन वरिष्ठ पत्रकार, खुलासा फर्स्ट।
पुंछ (जम्मू-कश्मीर)। सीमांत जिला पुंछ के मंडी क्षेत्र स्थित श्री बूढ़ा अमरनाथ धाम केवल एक प्राचीन शिव मंदिर ही नहीं, बल्कि सनातन आस्था, तपस्या, त्याग और दिव्य चमत्कारों का जीवंत प्रतीक माना जाता है। समुद्र तल से ऊंचाई पर स्थित इस पवित्र धाम के संबंध में मान्यता है कि यहां स्वयं भगवान शिव ने महाऋषि पुलस्त की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयंभू शिवलिंग के रूप में प्रकट होकर इस स्थान को युगों-युगों तक भक्तों की आस्था का केंद्र बनने का वरदान दिया था।

मंदिर के मुख्य पुजारी राकेश कुमार शर्मा के अनुसार श्री बूढ़ा अमरनाथ धाम का इतिहास सतयुग से जुड़ा हुआ है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार लंका के राजा रावण के दादा महाऋषि पुलस्त को एक दिन ध्यानावस्था में यह दिव्य बोध हुआ कि कश्यप देश की पांचाल पर्वत शृंंखला की गोद में वह पवित्र स्थान स्थित है, जहां भगवान शिव ने पहली बार माता पार्वती को अमर कथा का उपदेश दिया था। इस दिव्य संकेत के बाद महाऋषि पुलस्त वर्तमान श्री बूढ़ा अमरनाथ धाम पहुंचे और एक पत्थर की शिला में बनी छोटी गुफा में भगवान शिव के दर्शन के लिए कठोर तपस्या प्रारंभ कर दी।

वर्षों की तपस्या से प्रसन्न हुए भोलेनाथ...कई वर्षों तक अखंड तप और समाधि के बाद भगवान शिव महाऋषि पुलस्त के समक्ष प्रकट हुए। महाऋषि ने भगवान की स्तुति करते हुए कहा कि उनके दर्शन से उनका जीवन धन्य हो गया है। जब भगवान शिव ने उनसे वरदान मांगने को कहा तो उन्होंने अपने लिए कुछ भी न मांगते हुए केवल यही प्रार्थना की कि जिस स्थान पर उन्हें भगवान के दर्शन हुए हैं, वह स्थल युगों-युगों तक शिवभक्तों के लिए पवित्र तीर्थ बना रहे।

महाऋषि की निष्काम भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान भोलेनाथ ने मुस्कुराते हुए “तथास्तु” कहा और उसी चट्टान की गुफा में स्वयंभू शिवलिंग के रूप में प्रकट हो गए। यह शिवलिंग श्वेत चकमक पत्थर के समान दिखाई देता है तथा इसकी प्राकृतिक बनावट चट्टान जैसी होने के कारण श्रद्धालु आज भी इसे श्रद्धापूर्वक ‘बाबा चट्टानी’ के नाम से पुकारते हैं।

पुलस्त्य नगरी से बना पुंछ, नदी बनी पुलस्त्य गंगा...मान्यता है कि भगवान शिव के वरदान के बाद महाऋषि पुलस्त्य ने वर्षों तक इसी स्थान पर तप किया। उनके तप के कारण पूरे क्षेत्र का नाम पुलस्त्य नगरी पड़ा, जो समय के साथ अपभ्रंश होकर वर्तमान पुंछ कहलाया। मंदिर के समीप बहने वाली पवित्र नदी का नाम भी पुलस्त गंगा पड़ा। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि इस नदी में स्नान करने से पापों का नाश होता है तथा भगवान बूढ़ा अमरनाथ प्रत्येक सच्चे भक्त की मनोकामना पूर्ण करते हैं।

ऐसे पड़ा बूढ़ा अमरनाथ नाम... मंदिर से जुड़ी दूसरी प्रमुख धार्मिक कथा लगभग दो हजार वर्ष पुरानी मानी जाती है। उस समय वर्तमान लोरन गांव को लोवरकोट के नाम से जाना जाता था, जो तत्कालीन विशाल जम्मू-कश्मीर राज्य की राजधानी थी। उस राज्य पर परम शिवभक्त एवं धर्मपरायण रानी चन्द्रिका का शासन था। रानी चन्द्रिका प्रत्येक वर्ष श्रावण मास में कश्मीर स्थित श्री अमरनाथ गुफा में हिमलिंग के दर्शन कर ही अपना व्रत पूर्ण करती थीं। एक वर्ष भारी हिमपात के कारण सभी मार्ग बंद हो गए और वे अमरनाथ यात्रा पर नहीं जा सकीं।

इसे भगवान शिव की नाराजगी मानते हुए उन्होंने अन्न-जल का त्याग कर दिया। धीरे-धीरे उनकी स्थिति अत्यंत गंभीर हो गई। इसी दौरान एक दिन रानी के समक्ष एक वृद्ध साधु प्रकट हुए और उन्होंने कहा कि महल से लगभग दस मील दूर भगवान शिव का एक लुप्त धाम है, जिसके दर्शन का फल श्री अमरनाथ के समान है।

कुछ समय बाद वही साधु महल के द्वार पर भिक्षा मांगने पहुंचे और रानी के हाथों से ही भिक्षा लेने का आग्रह किया। दासियों ने जब रानी को साधु की बात बताई तो वे आश्चर्यचकित रह गईं, क्योंकि कुछ समय पहले तक अति दुर्बल रानी पूर्णतः स्वस्थ होकर खड़ी थीं। रानी स्वयं भिक्षा लेकर द्वार पर पहुंचीं तो उन्होंने उसी साधु को पहचान लिया, जिसने उन्हें दिव्य संकेत दिया था।

त्रिशूल के संकेत पर प्रकट हुआ चट्टान का मंदिर... रानी चन्द्रिका साधु के साथ पालकी और सैनिकों के काफिले सहित वन क्षेत्र की ओर रवाना हुईं। चीड़ और देवदार के घने जंगलों के बीच साधु ने अपने त्रिशूल से एक स्थान पर संकेत किया। खुदाई कराए जाने पर एक ही चट्टान से निर्मित चार द्वारों वाला प्राचीन मंदिर प्रकट हुआ, जिसे आज भी शिव पालकी के नाम से जाना जाता है। मंदिर के भीतर भगवान शिव का स्वयंभू चट्टानी शिवलिंग विराजमान था।

जब रानी पूजा के लिए मंदिर में प्रवेश कर रही थीं, तभी वह बूढ़ा साधु अचानक अदृश्य हो गया। तब रानी को अनुभूति हुई कि स्वयं भगवान शिव बूढ़े साधु का रूप धारण कर उन्हें इस पवित्र धाम तक लाए थे। भावविभोर होकर उन्होंने भगवान से क्षमा याचना की और उसी दिन से इस धाम का नाम “श्री बूढ़ा अमरनाथ” पड़ गया, जो आज भी श्रद्धापूर्वक प्रचलित है।

स्वामी चन्द्रचूढ़ मुनि ने पुनः कराया धाम का प्रकटीकरण... धार्मिक मान्यता के अनुसार समय के साथ प्राकृतिक परिवर्तनों के कारण यह पवित्र धाम एक बार फिर अदृश्य हो गया था। बाद में दक्षिण भारत के महान संत स्वामी चन्द्रचूढ़ मुनी ने इस स्थल को पुनः खोजकर उजागर किया और वर्षों तक यहां तपस्या की। मंदिर परिसर के पूर्वी भाग में उनकी समाधि आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बनी हुई है।

पुलस्त्य गंगा में स्नान कर करते हैं बाबा के दर्शन... राजपुरा (मंडी) क्षेत्र में स्थित श्री बूढ़ा अमरनाथ मंदिर पुंछ मुख्यालय से लगभग 22 किलोमीटर दूर है तथा जम्मू से सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है। मंदिर के साथ बहने वाली पुलस्त्य गंगा में स्नान करने के बाद श्रद्धालु बाबा चट्टानी के दर्शन करते हैं। सावन मास और रक्षा बंधन के अवसर पर यहां लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।

भव्य छड़ी यात्रा का विशेष महत्व... श्री बूढ़ा अमरनाथ की वार्षिक छड़ी यात्रा पुंछ स्थित श्री दशनामी अखाड़े से विधिवत पूजा-अर्चना के बाद प्रारंभ होती है। इस अवसर पर जिला प्रशासन, संत-महात्मा, स्थानीय नागरिक तथा हजारों श्रद्धालु उपस्थित रहते हैं। पूजा के बाद जम्मू-कश्मीर पुलिस द्वारा पवित्र छड़ी को गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता है और फिर बैंड-बाजों तथा ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष के बीच यात्रा मंडी स्थित धाम के लिए रवाना होती है।

पूरे यात्रा मार्ग पर विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक संस्थाओं द्वारा श्रद्धालुओं के लिए निःशुल्क चाय, नाश्ता, फल एवं भोजन की व्यवस्था की जाती है। चंडक स्थित मां चंडिका मंदिर में यात्रियों के लिए विशाल भंडारा आयोजित होता है, जबकि धाम से लगभग चार किलोमीटर पहले मां दुर्गा मंदिर पर ग्रामीणों एवं सेना की ओर से चाय की व्यवस्था की जाती है।

तीन दिवसीय मेले का होता है आयोजन... श्री बूढ़ा अमरनाथ मंदिर पहुंचने पर सीमा सुरक्षा बल, मंदिर ट्रस्ट तथा जिला प्रशासन द्वारा छड़ी का भव्य स्वागत किया जाता है। पुलिस एक बार फिर पवित्र छड़ी को सलामी देती है। इसके बाद मंदिर ट्रस्ट के सदस्य बाबा चट्टानी शिवलिंग पर पवित्र छड़ी स्थापित करते हैं, जो रक्षा बंधन के एक दिन बाद तक विराजमान रहती है। छड़ी यात्रा के साथ ही तीन दिवसीय विशाल धार्मिक मेले का शुभारंभ होता है।

इस दौरान प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु कतारबद्ध होकर बाबा बूढ़ा अमरनाथ के दर्शन करते हैं। मंदिर ट्रस्ट, जिला प्रशासन तथा अनेक सामाजिक एवं धार्मिक संगठन यात्रियों के भोजन, आवास, चिकित्सा और अन्य सभी आवश्यक सुविधाओं का समुचित प्रबंध करते हैं।

वर्षभर चलता है निःशुल्क लंगर... भगवती नगर (जम्मू) से यात्रा प्रारंभ कर श्रद्धालु पहले पुंछ पहुंचते हैं, जहां दशनामी अखाड़े में रात्रि विश्राम एवं निःशुल्क भोजन की व्यवस्था रहती है। अगले दिन श्रद्धालु मंडी पहुंचकर पुलस्त गंगा में स्नान कर बाबा बूढ़ा अमरनाथ के दर्शन करते हैं। मंदिर समिति द्वारा वर्षभर श्रद्धालुओं के लिए निःशुल्क लंगर संचालित किया जाता है।

ट्रस्ट के संरक्षण में संचालित हो रहा धाम... मंदिर के मुख्य पुजारी राकेश कुमार शर्मा ने बताया कि श्री बूढ़ा अमरनाथ मंदिर का संचालन एवं व्यवस्थापन अनंत श्री विभूषित अटल अखाड़ा पीठाधीश्वर, जगद्गुरु आचार्य महामंडलेश्वर श्री श्री 1008 स्वामी विश्वात्मानन्द सरस्वती जी महाराज के संरक्षण एवं मार्गदर्शन में किया जा रहा है। मंदिर ट्रस्ट श्रद्धालुओं की सुविधाओं और धाम के धार्मिक गौरव को बनाए रखने के लिए निरंतर कार्य कर रहा है।

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