संवाद से ही विवादों के समाधान तक पहुंचना संभव: इंदौर में वेस्ट जोन सम्मेलन में सुलभ न्याय पर मंथन; मध्यस्थता और तकनीक से लंबित मामलों के बोझ को कम करने पर जोर
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि संवाद, सम्मान और समावेशन की भावना के साथ जरूरतमंद तक पहुंचना होगा। पीड़ित को सबसे पहले यह विश्वास होना चाहिए कि उसकी बात सुनी जा रही है।
संवाद से ही विवादों का समाधान और न्याय तक समान पहुंच संभव है। यह बात भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने शनिवार को इंदौर के ब्रिलियंट कन्वेंशन सेंटर में आयोजित वेस्ट जोन रीजनल कॉन्फ्रेंस में कही।
‘एनहांसिंग एक्सेस टू जस्टिस’ विषय पर आयोजित सम्मेलन में सीजेआई ने कहा कि सशक्त भविष्य, गरिमा और समावेशन केवल शब्द नहीं, बल्कि विधिक सहायता की वास्तविक परिभाषा हैं। न्याय की प्रक्रिया केवल न्यायपालिका या किसी एक संस्था की जिम्मेदारी नहीं है।
इसमें सभी को मिलकर योगदान देना होगा। मध्यस्थता की शुरुआत भी सामने वाले को सुनने से होती है। किसी पीड़ित को न्याय मिलने से पहले यह भरोसा होना जरूरी है कि उसकी पीड़ा को समझने वाला कोई है।
तकनीक और समावेशन पर जोर... केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि न्याय केवल अदालतों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए।
संविधान के अनुच्छेद 39ए में आर्थिक और सामाजिक स्थिति की परवाह किए बिना नि:शुल्क विधिक सहायता की भावना निहित है। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस न्याय प्रक्रिया को बहुभाषीय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि साइन लैंग्वेज में नालसा का थीम सॉन्ग और ब्रेल लिपि में विधिक सेवाओं की मार्गदर्शिका दिव्यांगजनों के लिए न्याय की पहुंच को आसान बनाएगी।
वहीं जस्टिस मनमोहन ने न्याय को केवल विवाद निपटाने की प्रक्रिया के बजाय भविष्य की आधारभूत व्यवस्था के रूप में देखने की जरूरत बताई। उन्होंने मध्यस्थता को न्याय व्यवस्था में मामलों के त्वरित समाधान का प्रभावी माध्यम बताया।
अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे न्याय
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि समानता का वास्तविक अर्थ यही है कि समाज का कोई व्यक्ति पीछे न छूटे। हमारी क्षमता का आकलन इस बात से नहीं होना चाहिए कि जो व्यक्ति हमारे पास पहुंच गया, हमने उसकी कितनी मदद की, बल्कि असली परीक्षा यह है कि जो हमारे पास नहीं आया, हम उसके पास कैसे पहुंचे।
उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश के जनजातीय समुदाय, गोवा के मछुआरे, गुजरात के प्रवासी श्रमिक और मुंबई में रहने वाली महिलाओं की समस्याएं अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए सभी के लिए एक जैसा समाधान नहीं हो सकता। स्थानीय समस्या को समझने के लिए स्थानीय भाषा, परिस्थितियों और पीड़ा को समझना जरूरी है।
मध्यस्थता से घटेगा मुकदमों का बोझ
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि भारत की न्याय परंपरा में पंच परमेश्वर से लेकर भगवान श्रीकृष्ण तक संवाद और समझौते के माध्यम से विवादों के समाधान के उदाहरण मिलते हैं। छोटे-छोटे मामलों को मध्यस्थता से निपटाने से लंबित मामलों का बोझ कम किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि आधुनिक न्याय व्यवस्था में ई-केस फाइलिंग, वर्चुअल सुनवाई, डिजिटल डेटा और आधुनिक न्याय प्रबंधन जैसी व्यवस्थाओं को अपनाया जा रहा है। साइबर सुरक्षा, ई-जीरो एफआईआर और तकनीकी संसाधनों के माध्यम से पुलिस व्यवस्था को भी मजबूत किया जा रहा है। पेपर लीक और धोखाधड़ी जैसे मामलों में त्वरित कार्रवाई के लिए इंदौर, भोपाल, ग्वालियर और जबलपुर में फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित किए गए हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि न्याय में देरी भी अन्याय के समान है। उन्होंने मालवा की न्याय परंपरा का उल्लेख करते हुए लोकमाता अहिल्याबाई होलकर और सम्राट विक्रमादित्य के उदाहरण सामने रखे।
उनके अनुसार अहिल्याबाई होलकर ने प्रजा और अपने परिवार के बीच न्याय करते समय भेदभाव नहीं किया। यही निष्पक्षता न्याय व्यवस्था की मूल भावना है।
योजनाओं और कार्यक्रमों का शुभारंभ
सम्मेलन में ‘एन्श्योरिंग एक्सेस प्रोटेक्टिंग राइट्स बिल्डिंग फ्यूचर’ पुस्तक, ‘न्याय सबके लिए’, ब्रेल लिपि में मार्गदर्शिका और ‘न्याय के स्वर’ का विमोचन किया गया। नालसा के थीम सॉन्ग को इंडियन साइन लैंग्वेज में लॉन्च किया गया।
इसके साथ ही मध्यस्थता पर सर्टिफिकेट कोर्स ‘विवाद से सहमति’ और ‘जस्टिस टू चिल्ड्रन लिटिगेशन फेलोशिप प्रोग्राम’ की शुरुआत हुई। सम्मेलन में सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश, विधिक सेवा प्राधिकरणों के वरिष्ठ पदाधिकारी, न्यायिक अधिकारी और जनप्रतिनिधि मौजूद रहे।
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश विवेक रुसिया ने कहा कि तकनीकी नवाचारों और प्रशिक्षित मध्यस्थों के माध्यम से न्याय को अधिक सरल, सहज और सम्मानजनक बनाया जा रहा है। लोक अदालतों, कारागार सुधार और जनजातीय क्षेत्रों तक विधिक सेवाओं के विस्तार को भी उन्होंने महत्वपूर्ण बताया।
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