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क्या समाप्त हो रहा है महात्मा गांधी की विचारधारा का युग...

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संवाददाता

17 दिसंबर 2025, 5:01 pm
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क्या समाप्त हो रहा है महात्मा गांधी की विचारधारा का युग...

संजय सक्सेना वरिष्ठ पत्रकार खुलासा फर्स्ट, इंदौर
मोहनदास करमचंद गांधी, जिन्हें महात्मा गांधी के नाम से जाना जाता है, आजादी की लड़ाई के प्रमुख नायक रहे हैं। लेकिन आज के भारत में उनकी छवि पर सवाल उठ रहे हैं। कई लोग मानते हैं कि उनको नापसंद करने वालों की तादाद तेजी से बढ़ रही है।

सोशल मीडिया पर बहसें भड़कती हैं, जहां गांधी को हिंदू विरोधी ठहराया जाता है। खासकर युवा पीढ़ी में यह भावना मजबूत हो रही है। पुरानी किताबें पढ़कर या वीडियो देखकर लोग उनके फैसलों पर सवाल खड़े करते हैं।

क्या वाकई गांधी ने हिंदुओं को अनदेखा किया और मुसलमानों पर ज्यादा भरोसा जताया? देश के बंटवारे के समय क्या उन्होंने सिर्फ एक पक्ष के हित सोचे? बदलते भारत में उनके विचार क्यों पीछे छूटते नजर आ रहे हैं?

यह बदलाव हाल के वर्षों में नजर आया है। सोशल मीडिया पर गांधी के खिलाफ मीम्स और पोस्ट्स की बाढ़ आ गई है। कुछ लोग उन्हें ्मुस्लिम तुष्टिकरणश् का प्रतीक बताते हैं। दावा किया जाता है कि गांधी ने हिंदू भावनाओं को ठुकराया।

इसका एक कारण है खत्री हत्या का बदला न लेना। 1948 में नाथूराम गोडसे ने गांधी की हत्या की। गोडसे हिंदू राष्ट्रवाद के समर्थक थे। वे मानते थे कि गांधी ने बंटवारे के दौरान हिंदुओं का नुकसान किया। हत्या के बाद कुछ हिंदू संगठनों ने आक्रोश जताया।

लेकिन गांधी ने पहले कलकत्ता में भूख हड़ताल की, जिससे सांप्रदायिक दंगे थमे। फिर दिल्ली में भी ऐसा ही किया। लोगों का कहना है कि इससे हिंदुओं को न्याय न मिला। वे पूछते हैं कि पाकिस्तान जाने वाले हिंदुओं की संपत्ति लूटी गई, तो गांधी ने क्यों चुप्पी साधी? क्या यह हिंदू विरोधी रुख नहीं था?

गांधी के फैसलों में कई ऐसे पल हैं, जिन्हें हिंदू विरोधी कहा जाता है। खिलाफत आंदोलन इसका बड़ा उदाहरण है। 1919-1924 के बीच गांधी ने तुर्की के खलीफा के पक्ष में मुसलमानों का साथ दिया। हिंदू-मुस्लिम एकता के नाम पर उन्होंने हिंदुओं से अपील की कि मुसलमानों का विश्वास जीतें।

लेकिन जब खिलाफत विफल हुई, तो हिंदू नुकसान में रहे। मालाबार में विद्रोह हुआ, जिसमें हजारों हिंदुओं की हत्या हुई। गांधी ने इसे श्हिंदू अत्याचार कहा। लोगों का गुस्सा भड़का। वे कहते हैं कि गांधी ने मुसलमानों की हिंसा को नजरअंदाज किया।

इसी तरह कोहाट दंगे में हिंदुओं को घर छोड़ने पड़े। गांधी ने मुसलमानों से संपत्ति न लूटने की अपील की, लेकिन हिंदुओं की चुप्पी पर सवाल न उठाया।

देश के बंटवारे के समय गांधी का रवैया सबसे ज्यादा विवादास्पद रहा। 1947 में भारत-पाकिस्तान का विभाजन हुआ। लाखों हिंदू और सिख पाकिस्तान से विस्थापित हुए।

संपत्ति लूटी गई, महिलाओं पर अत्याचार हुए। लेकिन गांधी ने नेहरू सरकार से पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये देने को कहा।

यह राशि बंटवारे के समय रोकी गई थी। उनका तर्क था कि भारत को पाकिस्तान का कर्ज चुकाना चाहिए। आलोचक कहते हैं कि यह फैसला हिंदू शरणार्थियों के दर्द को भूल गया। वे भूखे मर रहे थे, लेकिन पैसा दुश्मन देश को दिया गया। गांधी ने कहा कि बिना पैसे दिए पाकिस्तान दंगे थाम सकता है, लेकिन हिंदुओं ने इसे अन्याय माना। क्या गांधी ने मुसलमानों के हित ही सोचे? जिन्ना की मांग पर देश टूटा, फिर भी गांधी ने हिंदू संगठनों को दबाया। आरएसएस पर प्रतिबंध लगवाया। लोग पूछते हैं कि हिंदू पीड़ितों के लिए ऐसा क्यों न किया?

गांधी के विचारों में अहिंसा मुख्य था। लेकिन आज के भारत में यह विचार कमजोर पड़ रहा है। आतंकवाद, सीमा पर हमले, चीन-पाकिस्तान की धमकियां। युवा कहते हैं कि गांधी की अहिंसा से दुश्मन मजबूत होते हैं। कश्मीर में हिंदू कश्मीरी पंडितों का नरसंहार हुआ। गांधी जीवित होते तो क्या कहते? उनके अनुयायी कहते हैं कि गांधी ने एकता सिखाई।

लेकिन आलोचक चेताते हैं कि यह एकतरफा एकता थी। गांधी ने हिंदू त्योहारों पर कमजोर दिया। रामराज्य की बात की, लेकिन मूर्ति पूजा पर सवाल उठाए। वे कहते थे कि भगवान सर्वव्यापी हैं। हिंदू परंपराओं को कमजोर करने का आरोप लगता है। मुसलमानों को गाय काटने की छूट दी। हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंची।

बदलते भारत में गांधी अप्रासंगिक क्यों हो रहे हैं? आज का भारत आर्थिक शक्ति बन रहा है। चंद्रयान, मंगलयान, तेज विकास। युवा राष्ट्रवाद से प्रेरित हैं। मोदी सरकार की नीतियां हिंदू अस्मिता पर जोर देती हैं। राम मंदिर निर्माण, नागरिकता कानून। ये गांधी के विचारों से अलग हैं। सोशल मीडिया ने इतिहास को नया रूप दिया।

पुरानी किताबें झूठी बताई जाती हैं। गांधी को नेहरू का साथी ठहराया जाता है। नेहरू की धर्मनिरपेक्षता को गांधी का वारिस कहा जाता है। लेकिन हिंदू कहते हैं कि यह छलावा था। बाबरी मस्जिद विवाद में गांधी चुप रहे। आज के भारत में सांस्कृतिक जागरण हो रहा है। योग, आयुर्वेद, वेदांत की वापसी। गांधी का पश्चिमी प्रभाव वाला अहिंसा अब पुराना लगता है।

एक सर्वे बताता है कि 18-35 साल के 40 प्रतिशत युवा गांधी को नायक नहीं मानते। वे भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस को पसंद करते हैं। वे हिंसा से आजादी दिलाने वाले मानते हैं। गांधी की भूख हड़ताल को कमजोरी कहा जाता है। ब्रिटिश चले गए क्योंकि जापान ने दबाव डाला, ऐसा दावा है। गांधी का योगदान कम बताते हैं। राजनीति में भी बदलाव आया। भाजपा की लहर में हिंदू राष्ट्रवाद हावी है। विपक्ष गांधी को ढाल बनाता है, लेकिन जनता अस्वीकार कर रही।

फिर भी गांधी के समर्थक हैं। वे कहते हैं कि बिना गांधी के आजादी न मिलती। विश्व पटल पर भारत की छवि बनी। लेकिन बहस जारी है। क्या गांधी हिंदू विरोधी थे? उनके फैसले संदर्भ में देखें तो मुश्किल समय में एकता बनाए रखने की कोशिश थी। लेकिन आज हिंदू जागरूक हैं। वे पुरानी भूले नहीं दोहराना चाहते। बंटवारे का दर्द आज भी ताजा है। पाकिस्तान आतंक फैला रहा है।

गांधी की नीतियां तब कारगर थीं, अब नहीं। भारत मजबूत हो रहा है। गांधी को याद रखेंगे, लेकिन उनके हर फैसले को चुनौती देंगे। यह बहस भारत के भविष्य को आकार देगी। क्या गांधी प्रासंगिक रहेंगे? या नई पीढ़ी नया इतिहास लिखेगी? समय बताएगा। लेकिन एक बात साफ है कि नापसंदगी बढ़ रही है। सोशल मीडिया ने आवाज दी। हिंदू अपनी पीड़ा बयान कर रहे हैं। गांधी का युग बीत रहा है। नया भारत उभर रहा है।

गांधी के फैसलों में कई ऐसे पल हैं, जिन्हें हिंदू विरोधी कहा जाता है। खिलाफत आंदोलन इसका बड़ा उदाहरण है। 1919-1924 के बीच गांधी ने तुर्की के खलीफा के पक्ष में मुसलमानों का साथ दिया। हिंदू-मुस्लिम एकता के नाम पर उन्होंने हिंदुओं से अपील की कि मुसलमानों का विश्वास जीतें, लेकिन जब खिलाफत विफल हुई, तो हिंदू नुकसान में रहे।

मालाबार में विद्रोह हुआ, जिसमें हजारों हिंदुओं की हत्या हुई। गांधी ने इसे श्हिंदू अत्याचार कहा। लोगों का गुस्सा भड़का। वे कहते हैं कि गांधी ने मुसलमानों की हिंसा को नजरअंदाज किया। इसी तरह कोहाट दंगे में हिंदुओं को घर छोड़ने पड़े। गांधी ने मुसलमानों से संपत्ति न लूटने की अपील की, लेकिन हिंदुओं की चुप्पी पर सवाल न उठाया।

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