अधिकारियों के करप्शन से हिला उद्योग जगत: हजारगो इंडस्ट्री का हेजार्डस अग्निकांड
KHULASA FIRST
संवाददाता

नामांतरण फर्जीवाड़ा : 08 जनवरी 2020 को नाम परिवर्तन के बाद भी जुलाई 2020 तक पुराने नाम से संचालित रही, शिकायत को दफन करवाया
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
पीथमपुर में उद्योगों के खतरनाक कचरे का निष्पादन करने के नाम पर खड़ी की गई हजारगो कंपनी की बुनियाद उद्योग और प्रदूषण नियंत्रण विभाग में फैले हेजार्डस ( जानलेवा) कचरे की तरह भ्रष्टाचार का उदाहरण है। इस सुनियोजित अग्निकांड के किरदार दो बड़े आईएएस अफसर हैं और इन सबके ऊपर इस पूरे जालसाजी के कर्मकांड के संरक्षक प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एक बड़े अधिकारी।
इनकी अनुमति और अनदेखी से ही भ्रष्टाचार का अग्निकांड हुआ। जिम्मेदार अधिकारियों की जांच और उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए उद्योग जगत आवाज उठा रहा है। उद्योगपति कहते हैं प्रकरण मात्र एक औद्योगिक दुर्घटना नहीं, बल्कि प्रशासनिक तंत्र के भीतर निहित सुनियोजित लापरवाही एवं संभावित भ्रष्टाचार का प्रत्यक्ष उदाहरण है, जिसने जन-जीवन, पर्यावरण और औद्योगिक सुरक्षा को गंभीर खतरे में डाला है।
इस भीषण अग्निकांड के बाद मांग उठी है कि कंपनी को भूमि एवं प्रोजेक्ट ट्रांसफर अनुमति (एमपीआईडीसी से) की पूरी फाइल नोटिंग की जांच कराई जाए और सार्वजनिक किया जाए। अनुमति देते समय किन नियमों/गाइड लाइन का पालन किया गया? नियमों का पालन होता तो कथित इंडस्ट्री अस्तित्व में ही नहीं आ पाती, क्योंकि जिस काम के लिए अनुमति दी गई थी, वह इसके लिए असंभव था और आज भी है। सब कुछ जालसाजी कर चल रहा है।
इस सबके लिए तीन बड़े अधिकारी, जिनमें दो आईएएस शामिल है, की भूमिका सवालों में है और सबसे बड़े खिलाड़ी प्रदूषण विभाग के एक बड़े अफसर बताए जाते हैं, जो भोपाल में मप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के कर्ताधर्ता हैं। वह इस इंडस्ट्री में स्लीपिंग पार्टनर के रूप में भी चर्चित हैं। उनके बारे में कहा जाता है असली मालिक हैं। जिन प्रमोद खंडेलवाल को संचालक बताया जाता है, वे तो चेहरा मात्र हैं। इसमें कितनी सच्चाई है यह तो जांच के बाद ही सामने आएगा लेकिन औद्योगिक संगठन कह रहे हैं यह सोलह आने सच है।
रोहन सक्सेना की मेहरबानी
रोहन सक्सेना द्वारा अनुमोदन का आधार क्या था? उनकी जानकारी में लाने और लिखित शिकायत के बाद भी उन्होंने हजार को इंडस्ट्री पर कुछ ज्यादा ही मेहरबानी कर दी। उद्योग क्षेत्र की भूमि, जिस पर यह इंडस्ट्री है, उसे हजारगो के नाम करना और जो पहले इंडस्ट्री थी, उस पर भी इस कंपनी के साथ घालमेल कर जलसाजी को नजरअंदाज कर राजस्व का नुकसान कराया। उद्योग विभाग के एक बड़े और विवादास्पद अधिकारी, जो आइएएस हैं, ने भी सब कुछ जानते हुए खारिज प्रोजेक्ट को पुनः मंजूरी दे दी। यह कैसे संभव हुआ इसकी जांच जरूरी है। मार्च 2020 में खारिज प्रस्ताव को पुनः मंजूरी देते समय क्या नए तथ्य प्रस्तुत किए गए? इसकी जांच होगी तो बहुत से रहस्यों का खुलासा होगा।
स्पष्ट प्रशासनिक मिलीभगत के सबूत
तीन स्तर (एमपीआईडीसी + प्रशासन + एमपीपीसीबी) द्वारा नियमों की अनदेखी
केवल लापरवाही नहीं, बल्कि संरक्षित भ्रष्टाचार का मामला प्रतीत होता है।
असंभव परियोजना को अनुमति
2.25 एकड़ में पांच लाख एमटी क्षमता (तकनीकी रूप से अव्यावहारिक) प्लांट की अनुमति बिना वा सत्यापन दी गई, जो मेलीफाइड इंटेंट दर्शाता है।
खारिज प्रस्ताव का पुनर्जीवन
पहले नियम विरुद्ध बताकर प्रस्ताव खारिज बाद में बिना ठोस आधार मंजूरी प्रक्रियात्मक धोखाधड़ी है।
अग्निकांड: पूर्व चेतावनियों की अनदेखी
खतरनाक वेस्ट का अवैध भंडारण
निरीक्षण के बावजूद कार्रवाई नहीं करना आपराधिक लापरवाही है।
जिम्मेदारी तय करने की मांग
उद्योगपतियों ने तीन अधिकारियों रोहन सक्सेना, जॉन किंग्सली और एएन मिश्रा पर इस अग्निकांड के लिए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज किए जाने की मांग की है। साथ ही उच्च स्तरीय स्वतंत्र जांच (लोकायुक्त/सीबीआई स्तर), सभी वित्तीय लेनदेन की जांच भविष्य में ऐसे मामलों के लिए जवाबदेही तय करने की नीति निर्धारित करने की मांग की है।
पर्यावरण स्वीकृति कैसे मिली?
खतरनाक अपशिष्ट जलाने वाली इस फैक्ट्री को लाइसेंस और उसके लिए सबसे जरूरी शर्त पर्यावरण स्वीकृति कैसे मिल गई इसकी जांच बहुत जरूरी है। पर्यावरणीय स्वीकृति की कार्रवाई मप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीपीसीबी) करता है और इस बोर्ड के प्रमुख और पुराने खिलाड़ी अच्युतानंद मिश्र हैं, जिनका हर सरकार में दखल होता है और उनकी जरूरत भी बनी रहती ह,ै क्योंकि भ्रष्टाचार की गंगा का एक बड़ा हिस्सा प्रदूषण नियंत्रण विभाग से होकर सरकारी तंत्र तक जाता है। पर्यावरण मंजूरी इसलिए भी सवालों के घेरे में है क्योंकि 2.25 एकड़ भूमि पर 5 लाख मीट्रिक टन वार्षिक क्षमता की अनुमति आंख मूंद कर दे दी गई। यह ठीक उसी तरह थी जैसे दिन को रात कहा जाए और सरकारी तंत्र उसे मान ले, इस तरह की अनुमति का आधार क्या था? इसकी जांच होना चाहिए।
पर्यावरण प्रभाव आकलन सार्वजनिक हो
संबंधित अधिकारी मिश्र द्वारा दी गई स्वीकृति की पूरी फाइल सार्वजनिक की जानी चाहिए। पिछले तीन वर्षों में क्या किसी निरीक्षण में खतरनाक कचरे या सुरक्षा उल्लंघन का उल्लेख संबंधित विभागों की फाइलों में दर्ज है या नहीं यह भी जांच का विषय है क्योंकि आग तो बीते तीन वर्षों से लग रही है इसके बावजूद जिम्मेदार विभाग हिसाब में हाथ सेकते रहे यानी खूब भ्रष्टाचार करते रहे, यही कहा जाएगा।
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