सिर्फ पोर्टल कैसे रोकेगा भूमाफियाओं को: सैटेलाइट और तकनीक के भरोसे जिम्मेदार अधिकारी
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
निगम प्रशासन शहर में सुव्यवस्थित और नियोजित विकास के बड़े-बड़े दावे भले ही कर रहा हो, लेकिन जमीनी हकीकत इससे कोसों दूर है। निगम के जोन स्तर पर तैनात बिल्डिंग अधिकारी और अन्य जिम्मेदार प्रशासनिक अमला हर महीने सरकारी खजाने से मोटी तनख्वाह ले रहा है, इसके बावजूद शहर में अवैध निर्माण और अवैध कॉलोनियों का जाल लगातार फैलता जा रहा है।
अब अपनी विफलता छिपाने और जमीनी स्तर पर जवाबदेही से बचने के लिए निगम प्रशासन एक नए संपत्ति सूचना प्रबंधन प्रणाली पोर्टल और सैटेलाइट-भौगोलिक सूचना प्रणाली तकनीक का सहारा ले रहा है।
सवाल यह उठता है कि जब मैदानी अधिकारी अपनी जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह नाकाम साबित हुए हैं, तो क्या केवल एक कंप्यूटर प्रणाली और सैटेलाइट की तस्वीरें शहर को अवैध निर्माण के इस गंभीर संकट से बचा पाएंगी?
निगम के विभिन्न जोनों में तैनात बिल्डिंग अधिकारियों और बिल्डिंग निरीक्षकों का मुख्य काम अपने-अपने क्षेत्रों में हो रहे निर्माण कार्यों की निगरानी करना और अवैध गतिविधियों पर तुरंत रोक लगाना है।
इन अधिकारियों को शहर की व्यवस्था बनाए रखने के लिए जनता के टैक्स के पैसे से हर महीने सुविधाएं दी जाती हैं। इसके बावजूद शहर की एक भी गली या मुख्य मार्ग ऐसा नहीं है जहां नियमों को ताक पर रखकर धड़ल्ले से अवैध निर्माण न चल रहा हो।
बहुमंजिला इमारतों में बिना वाहन पार्किंग स्थान के निर्माण किए जा रहे हैं, तय मापदंडों से कहीं ज्यादा मंजिलों का निर्माण हो रहा है और आवासीय भूखंडों पर धड़ल्ले से व्यावसायिक गतिविधियां संचालित की जा रही हैं।
यह सब कुछ निगम के जिम्मेदार अधिकारियों की नाक के नीचे और उनकी मौन सहमति से हो रहा है। मैदानी स्तर पर इस घोर लापरवाही ने साफ कर दिया है कि निगम का पूरा प्रशासनिक ढांचा केवल कागजी कार्रवाई और बैठकों तक ही सीमित होकर रह गया है।
इच्छाशक्ति और ईमानदारी का अभाव
नगर निगम ने हाल ही में बड़े जोर-शोर से प्रचारित किया था कि वह जनवरी 2023 के बाद के निर्माण कार्यों का सैटेलाइट डेटा तैयार कर चुका है और अब नगर तथा ग्राम निवेश विभाग के स्वीकृत नक्शों को जोड़कर अवैध कॉलोनियों को पकड़ा जाएगा, लेकिन यह पूरी कवायद असल में प्रशासनिक अधिकारियों की अकर्मण्यता को छिपाने का एक नया बहाना प्रतीत होती है।
डिजिटल तकनीक और सैटेलाइट तस्वीरें निश्चित रूप से सहायक हो सकती हैं, लेकिन वे मैदानी स्तर पर जाकर कार्रवाई नहीं कर सकतीं। जब तक एक सैटेलाइट तस्वीर यह बताएगी कि किसी स्थान पर अवैध निर्माण हो चुका है तब तक भूमाफिया अपना काम पूरा कर चुके होंगे।
असल समस्या तकनीक की कमी नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति और ईमानदारी का अभाव है। यदि जोन स्तर पर तैनात अधिकारी अपने क्षेत्रों का नियमित दौरा करें और प्रारंभिक स्तर पर ही अवैध निर्माण को ध्वस्त करें तो शहर को किसी महंगी प्रणाली या सैटेलाइट तकनीक की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
तकनीक के इस नए जाल को असल में अधिकारियों के लिए एक सुरक्षा कवच के रूप में देखा जा रहा है, ताकि वे कह सकें कि जब तक प्रणाली से चेतावनी नहीं आएगी, वे कार्रवाई नहीं करेंगे।
रातोरात नहीं कटतीं अवैध कॉलोनियां
प्रणाली में नगर तथा ग्राम निवेश विभाग द्वारा स्वीकृत नक्शों को जोड़ने का दावा किया जा रहा है ताकि अवैध कॉलोनियों पर रोक लगाई जा सके, लेकिन सच तो यह है कि शहर के बाहरी इलाकों में अवैध कॉलोनियां रातोरात नहीं कटतीं।
महीनों तक जमीन का समतलीकरण होता है, सड़कें बनती हैं और भूखंड काटे जाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान निगम के संबंधित जोन के अधिकारी पूरी तरह अनजान बने रहने का नाटक करते हैं। जब तक ये कॉलोनियां पूरी तरह बस नहीं जातीं और गरीब या मध्यमवर्गीय नागरिक अपनी गाढ़ी कमाई लगाकर वहां मकान नहीं बना लेते, तब तक निगम प्रशासन गहरी नींद में सोया रहता है।
जैसे ही कॉलोनी पूरी तरह तैयार हो जाती है निगम अचानक जागता है और अवैध घोषित कर तोड़फोड़ की धमकी देने लगता है। अगर प्रशासन शुरुआत में ही सख्त रुख अपनाए तो इन अवैध कॉलोनियों का विकास प्रारंभिक स्तर पर ही रुक जाए।
नागरिक सुरक्षा के नाम पर अपनी जवाबदेही आम जनता पर थोपना
निगम प्रशासन का कहना है कि इस प्रणाली के माध्यम से आम नागरिक भी स्वीकृत कॉलोनियों की वैधता की जांच कर सकेंगे ताकि वे धोखाधड़ी से बच सकें। यह तर्क सुनने में अच्छा लग सकता है, लेकिन यह सीधे तौर पर नगर निगम द्वारा अपनी बुनियादी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने और उसे आम जनता के मत्थे मढ़ने जैसा है।
किसी भी कॉलोनी को वैध या अवैध ठहराना और अवैध निर्माण शुरू होने से पहले ही रोकना पूरी तरह नगर निगम और जिला प्रशासन का वैधानिक दायित्व है। आम नागरिक टैक्स इसलिए चुकाता है ताकि सरकारी एजेंसियां शहर के विकास को नियमबद्ध रख सकें। अब जनता से यह उम्मीद की जा रही है कि वह खुद संपत्ति खरीदने से पहले निगम की प्रणाली पर जाकर छानबीन करें, जबकि जिन अधिकारियों को इसी काम के लिए तैनात किया है।
सैटेलाइट तस्वीर सिर्फ बदलाव दिखा सकती है
निगम इससे पहले भी कई तरह के मोबाइल एप 311 और शिकायत निवारण प्रणालियां लागू कर चुका है, लेकिन जब तक मैदानी अमला लापरवाह बना रहेगा तब तक कोई भी आधुनिक तकनीक शहर के अनियोजित विकास को नहीं रोक सकती।
सैटेलाइट तस्वीर सिर्फ बदलाव दिखा सकती है, लेकिन मौके पर जाकर अवैध निर्माण पर बुलडोजर चलाने या उसे सील करने का काम निगम के अधिकारियों को ही करना होगा। उन बिल्डिंग अधिकारियों और जोन प्रभारियों की जवाबदेही तय होना चाहिए जिनके क्षेत्रों में पिछले कुछ वर्षों में बड़े पैमाने पर अवैध निर्माण हुए हैं।
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