हनुमान चट्टी: बद्री विशाल का ‘आत्मिक द्वार’ है
KHULASA FIRST
संवाददाता

हिमालय की गोद में पिघल गया था महाबली भीम का अहंकार, जब भीम से न उठी एक पूंछ, ऐसा आध्यात्मिक पड़ाव जहां शक्ति ने सीखी विनम्रता, दो पवनपुत्रों का मिलन, जहां भाई ने भाई को पहचानना सिखाया
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
हिमालय की गगनचुंबी चोटियों के बीच बसा बद्रीनाथ धाम केवल ईंट-पत्थरों का मंदिर नहीं, बल्कि करोड़ों हिंदुओं की आस्था का वह केंद्र है जहां पहुंचकर हर मस्तक झुक जाता है, लेकिन इस परमधाम की देहली पर कदम रखने से पहले एक ऐसा पड़ाव आता है, जिसे अध्यात्म की भाषा में ‘शुद्धिकरण का द्वार’ कहा जाता है।
ऋषिकेश-बद्रीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित ‘हनुमान चट्टी’ वह ऐतिहासिक स्थल है, जहां द्वापर युग में शक्ति और भक्ति का वह विलक्षण संवाद हुआ था, जिसने महाभारत के सबसे शक्तिशाली योद्धा भीम की जीवन-दृष्टि बदल दी थी।
ऐतिहासिक वृत्तांत- जब दो ‘पवनपुत्रों’ के मिलन से कांपा था हिमालय... जब हम इतिहास और पौराणिक कथाओं को खंगालते हैं, तो हनुमान चट्टी की घटना सबसे रोमांचक प्रतीत होती है। पांडवों के अज्ञातवास के दौरान, जब द्रौपदी की इच्छा पर भीम ‘सौगंधिक पुष्प’ लेने निकले, तो उन्हें अपनी दस हजार हाथियों की शक्ति पर अटूट गर्व था।
अहंकार का विसर्जन... इसी मार्ग पर एक वृद्ध वानर के रूप में लेटे हनुमान जी ने जब भीम से अपनी पूंछ हटाने को कहा, तो भीम का पौरुष बौना साबित हो गया। भीम ने जब पूरी शक्ति झोंक दी और पूंछ टस से मस नहीं हुई, तब उन्हें आभास हुआ कि यह कोई सामान्य जीव नहीं बल्कि साक्षात ईश्वरीय शक्ति है।
यहां स्थित ‘हनुमान शिला’ आज भी उस दिव्य घटना की गवाही देती है। यह स्थान सिखाता है कि ईश्वर के द्वार पर शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि समर्पण का भाव ही काम आता है।
पर्यटन और प्रकृति का कैनवास-संगम की कलकल और देवदार की खुशबू... हनुमान चट्टी केवल भक्तों के लिए ही नहीं, बल्कि प्रकृति प्रेमियों और अन्वेषकों के लिए भी एक आकर्षण का केंद्र है।
वह इसलिए कि यह नदियों का संगम है। यहां अलकनंदा का रौद्र रूप और हनुमान गंगा की चंचलता का मिलन देखते ही बनता है। इस संगम पर स्नान का विशेष महत्व है।
वनस्पति वैभव- यहां के जंगलों में ‘ब्रह्मकमल’ (उत्तराखंड का राज्य पुष्प) और ‘बुरांश’ की बहुतायत है। जड़ी-बूटियों के शोधकर्ताओं के लिए यह क्षेत्र किसी प्रयोगशाला से कम नहीं है।
साहसिक ट्रेकिंग- हनुमान चट्टी से ही ‘डोडिताल’ (गणेश जी का जन्मस्थान माना जाने वाला) और ‘यमुनोत्री’ के लिए प्राचीन पैदल मार्ग निकलते हैं। ट्रेकर्स के लिए यहां के ऊबड़-खाबड़ रास्ते और बुग्याल (मखमली घास के मैदान) चुनौती और रोमांच दोनों प्रदान करते हैं।
चारधाम यात्रा-बदलती व्यवस्थाएं और बुनियादी ढांचा... इस वर्ष की चारधाम यात्रा में हनुमान चट्टी एक प्रमुख ‘ट्रांजिट पॉइंट’ के रूप में उभरा है। ऑल वेदर रोड के निर्माण के बाद यहां तक पहुंचना अब पहले जैसा दुर्गम नहीं रहा। प्रशासन ने यहां यात्रियों के लिए डिजिटल सूचना केंद्र और आधुनिक स्वास्थ्य शिविर स्थापित किए हैं।
‘स्वच्छ भारत अभियान’ के तहत यहां कचरा प्रबंधन के विशेष इंतजाम किए गए हैं ताकि अलकनंदा की निर्मलता बनी रहे। यात्रा सीजन में यहां के छोटे व्यापारियों, हस्तशिल्पकारों और ‘पहाड़ी कैफे’ संचालकों को बड़ा बाजार मिलता है। यहां का स्थानीय ‘मंडुआ’ और ‘झंगोरा’ पर्यटकों के बीच काफी लोकप्रिय हो रहा है।
क्यों जरूरी है हनुमान चट्टी का ठहराव?... हनुमान चट्टी महज एक भौगोलिक ठहराव नहीं है। यह ‘आत्म-मंथन’ का स्थान है। आज के युग में जहां हर व्यक्ति ‘अहं’ की दौड़ में शामिल है, हनुमान चट्टी का ‘बूढ़ा वानर’ हमें ठहरने और झुकने की कला सिखाता है।
बद्री विशाल के दर्शन की सार्थकता इसी में है कि यात्री अपने भीतर के ‘भीम’ (अहंकार) को यहीं छोड़ जाए और हनुमान जैसी ‘भक्ति’ लेकर नारायण के चरणों में उपस्थित हो। वास्तव में, हनुमान चट्टी वह दर्पण है, जहां पहुंचकर इंसान को अपनी सीमाओं का ज्ञान होता है और यही ज्ञान उसे मोक्ष की ओर ले जाता है।
स्कंद पुराण का उद्घोष- केदारखंड में वर्णित महिमा
धार्मिक ग्रंथों, विशेषकर स्कंद पुराण के ‘केदारखंड’ में इस क्षेत्र को ‘पावन गंगा-संगम’ की संज्ञा दी गई है। पुराणों के अनुसार, अलकनंदा और हनुमान गंगा का यह मिलन स्थल देवताओं की तपस्थली रहा है।
ऋषियों का मत है कि बद्रीनाथ की यात्रा तब तक फलित नहीं होती, जब तक यात्री हनुमान चट्टी में रुककर पवनपुत्र की अनुमति न ले ले। यहां की वायु में एक विशेष स्पंदन है, जो यात्रियों को भौतिक संसार से काटकर दैवीय ऊर्जा से जोड़ता है।
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