बढ़ती जमीन की जंग: मुआवजा, गाइड लाइन और अधिग्रहण के खिलाफ उबल रहा आक्रोश
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
विकास परियोजनाओं के नाम पर भूमि अधिग्रहण के खिलाफ किसानों का आक्रोश लगातार बढ़ रहा है। धामनोद-बड़वाह फोरलेन, इंदौर-मनमाड़ रेल लाइन, पश्चिम आउटर रिंग रोड और इंदौर-बुधनी रेल लाइन जैसी बड़ी परियोजनाओं के खिलाफ किसान खुलकर मैदान में उतर आए हैं।
साफ कहना है कि सरकार एक तरफ चार गुना मुआवजे की बात करती है, दूसरी ओर जमीन की गाइड लाइन वर्षों कृत्रिम रूप से कम रखकर वास्तविक कीमत से किसानों को वंचित किया जा रहा है।
धामनोद-बड़वाह फोरलेन परियोजना प्रभावित किसानों और किसान संगठनों का आरोप है शासन ने 15 वर्षों में सुनियोजित तरीके से गाइड लाइन में कटौती की, ताकि अधिग्रहण के दौरान कम मुआवजा देना पड़े।
2008 से 2015, 2018-19 और 2021 के बाद भी इस क्षेत्र में जमीनों की गाइड लाइन घटाई गई। यही कारण है वास्तविक बाजार मूल्य गाइड लाइन से कई गुना अधिक है। ऐसे में गाइड लाइन के आधार पर मिलने वाला ‘चार गुना मुआवजा’ भी घाटे का सौदा है।
खरगोन कलेक्टर भव्या मित्तल के साथ हुई चर्चा में किसानों को स्पष्ट रूप से बताया गया मुआवजा 2025 की गाइड लाइन से ही दिया जाएगा। गाइड लाइन बढ़ाकर मुआवजा देने का प्रावधान नहीं है।
इस पर किसानों ने भी दो टूक कह दिया यदि सरकार कम गाइड लाइन पर जमीन का मूल्य तय करेगी तो जमीन नहीं देंगे और आंदोलन जारी रहेगा।
किसानों ने इंदौर के पश्चिमी आउटर रिंग रोड प्रोजेक्ट का उदाहरण देते हुए कहा वहां विशेष प्रक्रिया अपनाकर राहत दी गई थी, तो यहां क्यों नहीं।
उलझ रही इंदौर-मनमाड़ रेल लाइन परियोजना भी
इस बीच इंदौर-मनमाड़ रेल लाइन परियोजना भी किसानों के विरोध में उलझती नजर आ रही है। करीब 18 हजार करोड़ की लागत वाली 309 किमी लंबी यह बहुप्रचारित रेल परियोजना इंदौर, धार, खरगोन और बड़वानी को महाराष्ट्र के नाशिक और धुले जिलों से जोड़ेगी।
धार और बड़वानी पहली बार रेलवे नेटवर्क से जुड़ेंगे लेकिन जमीन अधिग्रहण को लेकर किसानों की नाराजगी ने इसकी रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है। सूत्रों के मुताबिक इंदौर जिले के 200 से अधिक किसानों ने अपनी जमीन देने पर असहमति जताई है।
गजट नोटिफिकेशन के बाद 18 गांवों के किसानों ने एसडीएम न्यायालय में लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं। किसानों का आरोप है कि उनकी सुनवाई किए बिना सर्वे और अधिग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है। कई किसानों ने स्वयं तो कई ने वकीलों के माध्यम से आपत्तियां लगाईं, लेकिन स्पष्ट निराकरण नहीं हुआ।
इससे ग्रामीणों में असंतोष बढ़ता जा रहा है। रेल मंत्रालय की विशेष मॉनिटरिंग टीम भी इंदौर पहुंचकर परियोजना की समीक्षा कर चुकी है। बताया जा रहा है मनमाड़ क्षेत्र में करीब 50 किमी काम पूरा हो चुका है और वर्ष 2030 तक परियोजना पूर्ण करने का लक्ष्य है। इसके बावजूद प्रभावित गांवों में किसान ‘पहले सुनवाई, फिर सर्वे’ की मांग पर अड़े हैं।
आउटर रिंग रोड को लेकर विरोध... दूसरी ओर इंदौर की पश्चिम आउटर रिंग रोड परियोजना का विरोध भी थमने का नाम नहीं ले रहा। भारतीय किसान संघ ने रिंग रोड के दोनों ओर सर्विस रोड, जल निकासी, खेतों तक पाइप लाइन और किसानों की आवाजाही जैसी व्यावहारिक मांगों को लेकर ज्ञापन सौंपे हैं।
किसान नेताओं लक्ष्मी पटेल और अनिल व्यास सहित कई प्रतिनिधियों का आरोप है प्रशासन और नेशनल हाईवेज अथॉरिटी ने किसानों से संवाद की पहल नहीं की। ऐसे में आंदोलन और तेज होने की संभावना जताई जा रही है।
किसानों से ऐसे हुआ धोखा
इंदौर-बुधनी रेलवे लाइन से प्रभावित किसान भी लंबे समय से आंदोलनरत हैं। किसानों का आरोप है सरकार ने चार गुना मुआवजे की घोषणा तो की लेकिन नए कानून के लागू होने से पहले ही अवार्ड जारी कर दिया गया, जिससे प्रभावित किसानों को उसका लाभ नहीं मिल पाया।
किसान इसे सुनियोजित साजिश बता रहे हैं। प्रदेश में सिर्फ यही तीन परियोजनाएं विवादों में नहीं हैं। सिंगरौली, छतरपुर और अन्य इलाकों में भी विकास परियोजनाओं के लिए उपजाऊ भूमि अधिग्रहण, जंगल कटाई और गांवों के विस्थापन को लेकर व्यापक विरोध जारी हैं।
ग्रामीणों में यह धारणा तेजी से मजबूत हो रही है विकास की कीमत केवल उन्हें ही चुकाना पड़ रही है। पहले से ही गेहूं उपार्जन, स्लॉट बुकिंग और कृषि संकट से जूझ रहे किसान अब भूमि अधिग्रहण के डर से भी मानसिक दबाव में हैं। विकास परियोजनाओं के खिलाफ यह संघर्ष केवल मुआवजे का सवाल नहीं रह गया, बल्कि ‘जमीन और अस्तित्व की जंग’ बनता जा रहा है।
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