बियाबानी टू छावनी मनमानी: बिना मुआवजे के इंदौर जैसी तोड़फोड़ देश में और कहीं देखी-सुनी
KHULASA FIRST
संवाददाता

विकास के नाम पर पुरखों की जड़ों से उखड़ने को मजबूर अहिल्या नगरी के नागरिक
छावनी के पीड़ितों ने बैनर-पोस्टर टांगकर शहर को फिर चेताया- आज हमारी तो कल आपकी बारी है
महू नाका-बियाबानीटोरी कॉर्नर के वक्त अगर शहर जाग जाता तो आज नहीं बनते ये हालात
‘टीडीआर पॉलिसी’ के नाम पर बिना मुआवजा उजाड़ी जा रही गृहस्थी, खत्म किया जा रहा कारोबार
छावनी भी लोग ‘निहारने’ आ रहे, जैसे 100 बरस से ज्यादा पुराने बड़ा गणपति एरिया के विध्वंस को देखने आए थे
नियम-कायदों से बरसों से बसे आशियाने अतिक्रमण कहकर पुकारे और तोड़े जा रहे
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
जागना था तो तब, जब बुलडोजर महू नाका से बियाबानी तक गरज रहे थे। उठ खड़ा होना था तब, जब गौराकुंड से सीतलामाता बाजार, नृसिंह बाजार, दरगाह चौराहा से जयरामपुर कॉलोनी तक भारी तोड़फोड़ हो रही थी।
गरजना था तो तब, जब कनाड़िया रोड के बाशिंदों की गृहस्थी सड़क पर लाकर उनकी दीपावली अंधेरे में कर दी गई थी। एकजुटता तब दिखाना थी, जब 100 बरस से भी पुरानी शहर की बसाहट गणेशगंज में लोग रो-बिलख रहे थे, लेकिन कहीं कोई सुनने वाला नहीं था।
जनता कॉलोनी से जिंसी गोल मंदिर तक जो घटा, उस वक्त भी कौन अड़ा? अब छावनी व जिंसी में भी वो ही सब हुआ, जो इन इलाकों में हुआ था। वही अतिक्रमण के नाम पर। वही विकास के नाम पर। वही चौड़ीकरण के नाम पर।
बढ़ते व बदलते शहर के लिए ये सब अगर जरूरी भी है तो क्या इस तरह से लोग जमीन से, जड़ों से उखाड़े-बेदखल किए जाते हैं, जैसे इंदौर में हुए, हो रहे हैं और आगे भी होंगे? क्या बिना मुआवजे के इंदौर जैसी तोड़फोड़ देश में और कहीं देखी-सुनी?
आखिर ये सब इंदौर में ही क्यों हो रहा है? इस स्मार्ट शहर में ही क्यों विकास के नाम पर पुरखों की जड़ों से उखड़ने को मजबूर हैं अहिल्या नगरी के नागरिक?
सवाल एक नहीं, अनेक हैं। हर सवाल इंदौर में सड़क चौड़ीकरण के नाम पर शुरू हुई सरकारी कार्रवाई से जुड़ा है। ताजा मसला शहर की पुरानी बसाहट जिंसी व छावनी का है। पुराने मुद्दे भी पुराने शहर से ही जुड़े थे।
तब महू नाका, बालदा कॉलोनी, बियाबानी, मालगंज, इतवारिया बाजार, टोरी कॉर्नर, बड़ा गणपति, सीतलामाता बाजार, नृसिंह बाजार, छत्रीबाग, जयरामपुर कॉलोनी जैसे शहर के ‘हेरिटेज हिस्से’ निशाने पर लिए गए थे।
नए इंदौर के मामले में कनाड़िया रोड भी बेदर्दी से की गई तोड़फोड़ का उदाहरण है। ये सब जगह अलग-अलग हैं, पर रहवासियों का दर्द एक है- आखिर हमारा दोष क्या? न हमने एक फीट का अतिक्रमण किया, न कोई अवैध निर्माण किया।
पुरखों की जगह पर तब से रह रहे हैं, जब से इंदौर का अस्तित्व है। अब अगर शहरहित में जगह चाहिए तो कुछ तो हर्जाना दीजिए न?
ये ही साझा दर्द है उन सभी का, जो अतिक्रमण के नाम पर उजाड़ दिए गए, उजाड़े जा रहे और उजाड़े जाने वाले हैं। प्रभावित तबके का एक ही सवाल है कि आखिर चवन्नी मुआवजा भी नहीं देने का ये कौन-सा सरकारी नियम है, जो आम आदमी को सड़क पर लाकर खड़ा कर दे।
सरकार की जमीन अधिग्रहण नीतियां तो दो से चार गुना ज्यादा मुआवजा देने की घोषणा करती हैं, लेकिन ये ही नियम शहर के अंदर क्यों नहीं लागू? किसानों से जमीन लेने पर सरकार हर तरह की एहतियात बरत रही है।
शहरी तबके के लिए क्यों नहीं? क्या इसलिए कि शहर के लोग किसानों जैसे एकजुट नहीं। न वे आंदोलित हैं।
आखिर बीच शहर में रहने वालों का क्या दोष? मुआवजे के नाम पर महज ‘टीडीआर पॉलिसी’ का सब्जबाग। ये सब्जबाग भी ऐसा, जो आज से करीब 10 बरस पहले जिन प्रभावित इलाकों को दिखाया गया था, वे अब तक अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं।
ऐसे ही सब्जबाग के जरिये एक बार फिर शहर के अलग-अलग हिस्सों में तोड़फोड़ शुरू हो गई। छावनी में भी 60-80 फीट के नाम पर जो ताजा तोड़फोड़ हुई, वह एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। यहां के प्रभावित प्रभावी रूप से इस अन्याय के विरुद्ध मुखर भी हैं।
वे अपना रोष व पीड़ा पोस्टर-बैनर के जरिये जाहिर भी कर रहे हैं, लेकिन ये भी तय है कि ये विरोध की आवाजें भी अंत में ‘नक्कारखाने में तूती’ ही साबित होंगी। 10 बरस पहले जो हिस्से तोड़फोड़ का शिकार हुए, आज तक उन मकानों की मरम्मत भी नहीं कर पा रहे पीड़ित।
कारण, निगम की नक्शा पॉलिसी। सरकार अपने हिस्से का एक धेला भी प्रभावित पक्ष के लिए बख्श नहीं रही, लेकिन लोगों की करोड़ों की मिल्कियत विकास के नाम पर छीन रही है। आखिर ऐसा देश के किस हिस्से में होता है।
बगल के ही उज्जैन में तोड़फोड़ पर मुआवजा दिया जा रहा है, तो फिर इंदौर में बिना मुआवजा 10 से 20 फीट तक के मकान, दुकान क्यों तोड़े जा रहे हैं? विडंबना तो ये है कि लोग इन आपदाग्रस्त इलाकों को ऐसे देखने जा रहे हैं, जैसे कोई अजूबा हो गया। शायद इसलिए ही छावनी में पोस्टर लगाए गए हैं कि आज हमारी तो कल आपकी बारी है।
उज्जैन जैसा मुआवजा इंदौर में क्यों नहीं?...ना कि उज्जैन में मुआवजा सिंहस्थ के नियम-कायदों के तहत दिया जा रहा है, तो इंदौर के लिए कोई नए नियम-कायदे नहीं बनाए जा सकते थे या अब भी नहीं बनाए जा सकते?
शहर विस्तार पा रहा है, कस्बे से मेट्रो सिटी बन रहा है, सिटी से स्मार्ट सिटी बन रहा है तो फिर इंदौर के प्रभावित परिवारों के प्रति सरकार का रवैया इतना निर्मम क्यों? टीडीआर के नाम पर आखिर कब तक पीड़ितों को बहलाया जाएगा?
जिनसे इस पॉलिसी का वादा किया था, क्या उनका वादा अब तक पूरा हो पाया है? क्या लोग इस पॉलिसी का लाभ ले पाए? क्या कोई खरीददार पॉलिसी लेने आगे आया अब तक?
इन सब सवालों के जवाब के पहले एक बार फिर तोड़फोड़ मनमानी नहीं तो क्या, जो बियाबानी से होते हुए छावनी तक आ गई?
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