बफीर्ली वादियों से हुबली की धूप तक: जज्बे की आंच में तपी जम्मू-कश्मीर की ऐतिहासिक जीत; पहली बार चूमा रणजी ट्रॉफी का आसमान
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, हेमंत उपाध्याय।
जब कर्नाटक के शहर हुबली के केएससीए राजनगर स्टेडियम में मेजबान कर्नाटक के कप्तान देवदत्त पड़िक्कल और जम्मू-कश्मीर टीम के कप्तान पारस डोगरा ने अंतिम बार हाथ मिलाए तो पारस की आंखों में अलग तरह की संतुष्टि की चमक साफ देखी जा सकती थी। इसकी वजह भी थी यह केवल जम्मू-कश्मीर टीम की केवल रणजी ट्रॉफी क्रिकेट प्रतियोगिता में चैंपियन बनने की बात नहीं थी, यह इस खेल की दुनिया में एक नई टीम के खिलाड़ियों की मेहनत, लगन, समर्पण और लक्ष्य के लिए शत-प्रतिशत झोंकने का उदाहरण भी थी।
67 साल के लंबे अंतराल बाद के बाद पहला खिताब
इस विजय के साथ जम्मू-कश्मीर टीम ने इस घरेलू टूर्नामेंट में इतिहास भी अपने नाम किया। 1959 से इस टूर्नामेंट में हिस्सा ले रही इस टीम ने 67 साल के लंबे अंतराल बाद के बाद पहला खिताब जीतने में सफलता हासिल की है। पहली पारी की बढ़त के आधार पर जम्मू-कश्मीर ने यह कमाल किया और 8 मर्तबा रणजी ट्रॉफी को अपने हाथों में थामने वाली कर्नाटक टीम को मन मसोसकर रह जाना पड़ा।
जम्मू और कश्मीर के उन हजारों युवाओं के सपनों की जीत
जीत के बाद कप्तान पारस का कहना था- "जब मैं इस टीम से जुड़ा था, तो लोग कहते थे कि यहाँ प्रतिभा तो है, पर दिशा नहीं। आज इस ट्रॉफी को हाथ में थामकर मैं गर्व से कह सकता हूँ कि दिशा भी है और जज्बा भी। यह जीत मेरे लिए सिर्फ एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि जम्मू और कश्मीर के उन हजारों युवाओं के सपनों की जीत है, जिन्होंने मुश्किल हालातों में भी क्रिकेट के प्रति अपना प्यार कम नहीं होने दिया। आकिब नबी के 60 विकेट(इस सीजन में सर्वाधिक 60 विकेट ) के साथ कामरान इकबाल और साहिल लूथरा के बेखौफ शतक इस बात का प्रमाण हैं कि जब हम एक परिवार की तरह लड़ते हैं, तो बड़ी से बड़ी टीम भी हमारे सामने घुटने टेक देती है। यह जीत हमारी रातों की मेहनत और उस भरोसे का नतीजा है जो हमने एक-दूसरे पर दिखाया।"
गेंदबाज आकिब नबी के करियर का सबसे भावुक लम्हा
और वहीं गेंदबाज आकिब नबी के लिए यह खिताबी जीत केवल एक ट्रॉफी नहीं, बल्कि उनके करियर का सबसे भावुक लम्हा था। जब उन्हें साथियों ने कंधे पर उठाकर मैदान का चक्कर लगवाया, तो उनकी आँखों में जो चमक थी, वह उनके संघर्ष की गवाही दे रही थी। 'प्लेयर ऑफ द सीजन' आकिब नबी ने बाद में कहा भी- "यह गेंद सिर्फ मेरी नहीं, उन सबकी है जिन्होंने मुझ पर भरोसा किया।"
मैदान के बाहर खड़े दर्शकों को अपनी गेंद दिखाते हुए आकिब नबी ने भावुक होकर कहा- "एक वक्त था जब हमें अभ्यास के लिए ढंग की पिचें भी मयस्सर नहीं थीं। कई बार बर्फबारी और हालात की वजह से हम हफ्तों तक मैदान से दूर रहे, लेकिन जब भी मैं हाथ में गेंद थामता था, तो बस यही सोचता था कि मुझे अपनी टीम-अपने राज्य के लिए कुछ ऐसा करना है जिसे दुनिया याद रखे।
लोग मुझसे पूछ रहे हैं कि 60 विकेट कैसे लिए? मेरा जवाब है—ज़िद से। मैंने ठान लिया था कि इस बार हमें सिर्फ खेलना नहीं है, बल्कि अपना वर्चस्व स्थापित करना है। कर्नाटक जैसी बड़ी टीम के खिलाफ 5 विकेट लेना मेरे लिए किसी सपने जैसा था। हम एक टीम नहीं, एक 'ज़ज्बा' बनकर खेले हैं।"
आज मेरी आँखों में खुशी के आँसू -इरफान पठान
जम्मू-कश्मीर टीम के पूर्व मेंटर इरफान पठान ने भी स्पष्ट कहा- "आज मेरी आँखों में खुशी के आँसू हैं। मैंने इन लड़कों को उन रातों में देखा है जब अभ्यास के लिए बिजली नहीं थी, जब हालात की वजह से हमें कैंप शिफ्ट करने पड़ते थे। पारस डोगरा ने जिस तरह इस युवा ब्रिगेड को संभाला और आकिब नबी ने जो आग उगलती गेंदबाजी की, वह अद्भुत है। यह सिर्फ एक ट्रॉफी नहीं, उन तमाम बंदिशों पर क्रिकेट की जीत है। आज जम्मू-कश्मीर ने खुद को भारतीय क्रिकेट के नक्शे पर हमेशा के लिए गाड़ दिया है।"
अभावों से संघर्ष करते हुए खिताबी मंजिल तक
अब क्रिकेट के जानकार कह रहे हैं कि पहाड़ की हवाओं में एक अलग तरह की जिद होती है, और जब वह जिद बल्ला और गेंद थाम ले, तो इतिहास के पन्ने खुद-ब-खुद पलटने लगते हैं। निश्चित रूप से एक ऐसी टीम जिसे अभ्यास के लिए मैदान नहीं मिलते थे, हालात अनुकूल नहीं होते थे उसने अभावों से संघर्ष करते हुए अपने बुलंद इरादों और मेहनत के दम पर विजय गाथा लिखकर अनुकरणीय उदाहरण पेश किया है। जब भी रणजी ट्रॉफी का जिक्र होगा, तो उन 11 युवाओं की कहानी पहले सुनाई जाएगी, जिन्होंने बर्फीली वादियों से निकलकर तपते मैदानों पर इतिहास रच दिया।
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