फागुन के दिन चार सखी री: मुहाने पर आया रंगपर्व; रंग रसिया हुआ माहौल
KHULASA FIRST
संवाददाता

काशी में निकला शिव डोला, वृंदावन में एकादशी परिक्रमा में उमड़ा जनसैलाब
ब्रज मंडल की 40 दिवसीय होली अब ‘विजय' की तरफ बढ़ी, ‘लट्ठमार' की विदाई, गोकुल में अब ‘छड़ीमार' की तैयारी
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
फागुन लाग्यौ सखी जब तें तब तें ब्रजमंडल में धूम मच्यौ है। नारी नवेली बचै नाहिं एक बिसेख मरै सब प्रेम अच्यौ है।।
सांझ सकारे वही ‘रसखानि' सुरंग गुलालन खेल मच्यौ है। को सजनी निलजी न भयी अरु कौन भटु जिहिं मान बच्यौ है।।
गोपियों और राधारानी के साथ कृष्ण होली खेल रहे हैं। राधारानी के साथ फाग खेलने की प्रक्रिया में परस्पर अनुराग बढ़ रहा है। दोनों आनंद की अठखेलियां कर रहे हैं। कमल समान सुंदर मुख वाली राधाजी कृष्ण के मुख पर कुंकुम लगाने की घात में है। गुलाल फेंकने का अवसर ताक रही हैं।
चारों ओर गुलाल ही गुलाल उड़ रहा है। उसमें ब्रजबालाओं की देहयष्टि इस तरह चमक रही है मानों सावन की सांझ में लोहित गगन में चारों ओर बिजली चमकती हो। गुलाल की चारों ओर उड़ रही धूल के बीच रसखान ने गोपियों के सौंदर्य को रूपायित करने के लिए सावन के महीने में सूर्यास्त के बाद छाई लालिमा और चारों दिशा में दामिनी की चमक के रूपक का प्रयोग किया है, क्योंकि गोपियां उस लाल गुलाल के उड़ने में स्थिर नहीं, चपल हैं, तो उनका गोरा शरीर चमकती-तड़कती बिजली के समान दिखाई दे रहा है।
वह भी सावन माह के सूर्यास्त से रक्ताभ आकाश में। रसखान राधा-कृष्ण के होली खेलने पर बलिहारी हैं। इतना सुंदर दृश्य है इस होली का कि क्या कहें। फाग खेलती हुई प्रिया को देखने के सुख को किसकी उपमा दें? देखते ही बनता है वह दृश्य कि उस पर सब वार देने का मन चाहता है।
जैसे-जैसे छबीली राधा पिचकारी भर-भर हाथ में ले यह कहते हुए कृष्ण को सराबोर करती जाती हैं कि यह लो एक और, अब यह दूसरी, वैसे-वैसे छबीले कृष्ण राधा की इस रसमय छवि को छककर नैनों से पी, मदमस्त होते हुए वहां से हटे बिना खड़े-खड़े हंसते हुए भीग रहे हैं।
खेलतु फाग लख्यौ पिय प्यारी कों ता सुख की उपमा किहीं दीजै। देखत ही बनी आवै भलै ‘रसखान' कहा है जो वारि न कीजै।।
ज्यौं-ज्यौं छबीली कहै पिचकारी लै एक लई, यह दूजी लीजे। त्यौं-त्यौं छबीलो छकै छाक सौं हेरै हंसे न टरै खरौ भीजे।
गोपियां एक-दूसरे से कृष्ण की बुराई करती हैं कि कृष्ण बड़े ही रसिक हैं, सूने मार्ग में उन्हें एक अनजानी नई-नवेली स्त्री मिली। फाग के बहाने उसे गुलाल लगाने के चक्कर में मनमानी कर रहे हैं। उस सुकुमारी की साड़ी फट गई है और रंग में भीग चोली खिसक गई है। उसे गालों पर लाल गुलाल लगाकर आलिंगित कर रिझाकर अपने आकर्षण के अधीन कर विदा कर दिया है।
आवत लाल गुपाल लिए सूने मग मिली इक नार नवीनी। त्यौं ‘रसखानि' लगाई हिय भट् मौज कियौ मनमांहि अधीनी।।
सारी फटी सुकुमारी हटी अंगिया दरकी सरकी रंगभीनी। गाल गुलाल लगाई कै अंक रिझाई विदा कर दीनी।।
गोपियां आपस में चर्चा करती हैं, फाग के फगुनाए मौसम में नंदगांव का एक सांवला ग्वाल गोरी, सुंदर ग्वालिनों से होली का हुड़दंग कर धूम मचा गया। फाग और रसिया की एक बांकी तान गाकर मन हर्षा गया। अपने सहज स्वभाव से सारे गांव का मन ललचा गया है।
पिचकारी चलाकर युवतियों को नेह से भिगो गया और मेरे अंग तो भीगने से बच गए, पर अपने नैन नचाकर मेरा मन भिगो गया। मेरी भोली सास और कुटिल ननद तक को नचाकर बैर का बदला लेकर मुझे सकुचा गया। ऐसा है वह सांवला ग्वाल।
गोकुल को ग्वाल काल्हि चौमुंह की ग्वालिन सौं
चांचर रचाई एक धूमहिं मचाईगो।
हियो हुलसाय ‘रसखानि' तान गाई बांकी
सहज सुभाई सब गांव ललचाइगो।
पिचका चलाई और जुबति भिजाई नेह
लोचन नचाई मेरे अंग ही बचाइगो।
सासहि नचाई भोरी नन्दहि नचाई खोरी
बैरिन सचाई गोरी मोहि सकुचाइगो।।
रसखान कहते हैं चंद्रमुखी-सी ब्रजवनिता कृष्ण से कहती है, निशंक होकर आज इस फाग को खेलो, तुम्हारे साथ फाग खेलकर हमारे भाग जाग गए हैं। गुलाल लेकर मुझे रंग लो, हाथ में पिचकारी लेकर मेरा मन रंग डालो, वह सब करो, जिसमें तुम्हारा सुख निहित हो, लेकिन तुम्हारे पैर पड़ती हूं, यह घूंघट तो मत हटाओ।
तुम्हें कसम है ये अबीर तो आंख बचाकर डालो! अन्यथा तुम्हारी सुंदर छवि देखने से मैं वंचित रह जाऊंगी। तो इस तरह समूचे ब्रजमंडल में फाग रस की मंदाकिनी निरंतर 40 दिन तक बहती है, बह रही भी है। अब बस चार दिन शेष हैं।
फिर रंग और रंगरसिया विदा हो जाएंगे। सोचो, क्या हाल होंगे ब्रजवनिताओं के? श्यामा प्यारी के? रंगीलीजी के? रंगीली गली के? नंदमहर के? गोकुल-बरसाना-वृंदावन के?
गौरा संग गौना कराकर लौटे काशी विश्वनाथ, होली की हुई शुरुआत
अपनी प्रिय काशी की संकरी गलियों में ब्याह के बाद गौना कराकर गौरा संग भोला जब लौटे तो समूची काशी उत्सव में डूब गई। खूब अबीर-गुलाल के गुबार उड़े। शुक्रवार को काल के कपाल पर पुनः एक बार ये दृश्य उभरकर वाराणसी में उपस्थित हुआ। रंगभरी एकादशी जो थी। काशी पर होली का रंग कल से ही चढ़ा।
जहां सबसे पहले रंग चढ़ा, उस ब्रजमंडल में अब रंग ‘विजय' की तरफ बढ़ा है। बरसाना-नंदगांव में लट्ठमार होली हो गई और अब गोकुल की छड़ीमार की खुमारी चढ़ गई है। एकादशी पर कान्हा की प्रिय नगरी वृंदावन में परिक्रमा को लाखों लोग उमड़े। इधर, प्रदेश के वनांचल में भगोरिया का शबाब पूरे उफान पर है।
अंचल की ‘राजनीति' भी वन-सुंदरियों के साथ घुंघरू बांध नृत्य कर रही है, कदमताल कर रही है। अहिल्या नगरी में भी होली के रंग उड़ रहे हैं। श्री गोवर्धननाथ मंदिर के गुलाल कुंड से खूब पिचकारी बरस रही हैं। आज शाम परदेशीपुरा के शिवधाम में फाग उत्सव मनेगा।
सुन री सखी... अब फागुन के दिन चार ही बचे हैं। अब मोसों कैसे रहो जाय। या रंग विदा भये तो फिर चेन न आय। वसंत जब आय, सब बन फूले और फूली थी वनराय। मादक मलयांचित बयार से मन बौराने लाग्यो री सखी। ब्रज की हर गोपी नवल-नवल नार होई गई। नवनागर जो ठाड़यो होई गयो।
हाथन में अबीर-गुलाल की फेटन लिए। रसिया नी माने री सखी। वसंत की खुमारी उतरी भी नी कि फागन आय रय। या फागन तो जैसे बड़े भागन से आयो री सखी। श्यामसुंदर संग होरी को खेल बड़े भागन से मिल्यो। कृष्ण का फाग क्या कोई साधारण फाग होता था? वह तो गुलाल और अबीर की लालिमा को द्विगुणित करते हुए जीवन, रसानंद और उल्लास का अद्भुत सामंजस्य है।
फागुन की एक लहर उठी है, जिसमें यह नहीं पता चलता कौन ज्यादा लाल हुआ? श्रीकृष्ण राधा के गुलाल से लाल हो गए या श्रीकृष्ण के प्रेम में राधा के कपोल रक्ताभ हो उठे। होरी भयी के हरि भये लाल, कै लाल के लागि पगी ब्रजबाला।
फागुन लगते ही पूरे ब्रजमंडल में धूम मचा रखी है कृष्ण ने। कोई ऐसी युवती नहीं बची, जो कृष्ण के आकर्षण से अछूती रह गई हो। सब लोक-लाज त्याग कृष्ण के साथ फाग खेलने में सुबह से शाम तक तल्लीन हैं।
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