सरकारी लापरवाही के आगे ‘चाणक्य’ भी हुए मजबूर: बजरबट्टू सम्मेलन निरस्त; विजयवर्गीय की ‘असहमति’ ने खामोश किए ठहाके
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
सियासत और संस्कृति का सबसे बड़ा ‘हास्य कवि सम्मेलन’ इस बार तंत्र की विफलताओं की भेंट चढ़ गया है। पिछले 27 वर्षों से रंगपंचमी की पूर्व संध्या पर शहर को गुदगुदाने वाला बजरबट्टू सम्मेलन इस वर्ष अचानक निरस्त कर दिया गया। आयोजन समिति की अंतिम समय तक की गई घेराबंदी और कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को राजी करने की तमाम कवायदें धरी की धरी रह गईं।
मंत्री की असहमति ने उस परंपरा पर ताला जड़ दिया, जिसकी तैयारी के लिए शहर की दीवारों पर पोस्टर चस्पा हो चुके थे और कवियों को पेशगी बांटी जा चुकी थी।
भागीरथपुरा की ‘काली होली’... बजरबट्टू सम्मेलन के निरस्त होने की असली पटकथा भागीरथपुरा की उन तंग गलियों में लिखी गई, जहां नगर निगम की लापरवाही ने घरों के चूल्हे बुझा दिए। स्वच्छता के आठवें आसमान का दावा करने वाले तंत्र की लापरवाही के कारण नलों पानी की जगह जहर निकला।
एक तरफ शहर के रसूखदार रंगपंचमी के जश्न की तैयारी में डूबे थे, दूसरी तरफ भागीरथपुरा में आंसुओं का सैलाब था। महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने पहले ही अपनी होली और रंगपंचमी के आयोजनों से किनारा कर लिया था। ऐसे में यदि राजवाड़ा पर ठहाकों की महफिल सजती, तो यह उन बिलखते परिवारों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा होता। शायद यही वजह रही कि ‘बड़े साहब’ की एक ‘ना’ ने पूरे आयोजन का रंग उतार दिया।
चाचा चौधरी से साधु तक, अब मौन ही सबसे बड़ा किरदार...इस आयोजन की पहचान ही कैलाश विजयवर्गीय के विचित्र और चौंकाने वाले गेटअप रहे हैं। इंदौरियों ने उन्हें इसी मंच पर कभी चाचा चौधरी के रूप में देखा, तो कभी साधु के चोंगे में। वे चाणक्य, सुभाष चंद्र बोस, स्वामी विवेकानंद और यहां तक कि सचिन तेंदुलकर बनकर भी निकले।
लेकिन इस बार, जब शहर के भागीरथपुरा इलाके में सरकारी महकमे की लापरवाही ने नलों से जहर उगलवा दिया और कई बेगुनाहों की जान ले ली, तब सत्ता के गलियारों में ठहाकों का रिस्क लेना घाटे का सौदा लगा। जब चेहरा दूषित तंत्र की कालिख से पुता हो, तो बजरबट्टू बनकर गुलाल उड़ाना शायद सियासी रूप से मुफीद नहीं लगा।
सत्ता की ‘ना’ और आयोजकों की मजबूरी... आयोजन समिति के अशोक चौहान ‘चांदू’ और अजय लाहोटी ने स्पष्ट किया कि कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार थी, प्रचार चरम पर था और कवियों की टोली अपना व्यंग्य-पिटारा खोलने को तैयार थी, लेकिन उत्सव मूर्ति विजयवर्गीय ने इस बार मंच साझा करने से हाथ खींच लिए।
वजह साफ है शहर में फैले आक्रोश और भागीरथपुरा कांड के बाद महापौर पुष्यमित्र भार्गव सहित पूरी नगर निगम टीम बैकफुट पर है। ऐसे में राजवाड़ा के समीप मल्हारगंज थाना के पास टोरी कॉर्नर पर पर जश्न का माहौल सरकार की छवि को और अधिक नुकसान कर सकता था। 27 साल की अटूट कड़ी को महज दो दिन पहले तोड़ना यह बताता है कि जब प्रशासनिक विफलताएं भारी पड़ती हैं, तो उत्सवों की बलि चढ़ना तय है।
27 साल का इतिहास, दो दिन में स्वाहा... यह महज एक कवि सम्मेलन नहीं, बल्कि इंदौर का एक पॉलिटिकल सटायर था। लेकिन इस बार न कोई साबू दिखेगा और न ही चाचा चौधरी का जलवा होगा। भागीरथपुरा के जहरीले सच ने इस आयोजन के उल्लास को निगल लिया है। आयोजकों ने स्वीकार किया कि मंत्री की रजामंदी के बिना यह आयोजन संभव नहीं था, और जब बड़े साहब ने ही इनकार कर दिया, तो समिति के पास झोला समेटने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। अब इंदौर की रंगपंचमी में वह बजरबट्टू वाला बेबाकपन गायब रहेगा, जिसकी जगह सिस्टम की नाकामी का सन्नाटा पसरा होगा।
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