कम वर्षा से सूखे जैसे हालात: इंदौर सहित मालवा-निमाड़ के
KHULASA FIRST
संवाददाता

मानसून की बदली तासीर
दक्षिण-पश्चिम और उत्तर-पूर्व का मानसूनी विरोधाभास
डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मानसून पर पूरी तरह निर्भर इस देश की अर्थव्यवस्था के लिए मानसून अब आंकड़ों की बाजीगरी से कहीं आगे निकल चुका है। इंदौर सहित पश्चिमी मध्य प्रदेश में बारिश की तीव्रता आंकड़ों से बहुत कम रहने लगी है। अल्पवर्षा का पैटर्न बढ़ता जा रहा है। इस बार भी हालत चिंताजनक है।
आने वाले समय में इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट और सनातन के विपरीत सनातन की सरकारों द्वारा किया जा रहा आधुनिक विकास मानसून के पैटर्न को बदल रहा है। यह विकास कार्बन उत्सर्जन को वायुमंडल में तेजी से बढ़ा रहा है। शहर के साथ मालवा-निमाड़ के जंगल खेती-किसानी, गांव और हरियाली जितनी तेजी से काटी जा रही है, उतनी ही तेजी से सूखे का खतरा बढ़ता जा रहा है।
जलवायु परिवर्तन का असर अब मालवा और निमाड़ अंचल पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। वैश्विक जलवायु चक्र में बदलाव, हिंद महासागर के तापमान में उतार-चढ़ाव और अलनीनो जैसी परिघटनाओं के कारण मानसूनी प्रणालियों के ट्रैक बदल गए हैं।
पहले जहां मानसूनी सिस्टम नियमित रूप से पश्चिमी मध्य प्रदेश तक मजबूत स्थिति में पहुंचते थे, वहीं अब जलवायु असंतुलन के कारण ये सिस्टम बीच रास्ते में ही कमजोर हो जाते हैं या पूर्वी मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की ओर डायवर्ट हो जाते हैं, जिससे इंदौर सहित पूरे क्षेत्र में खंड वर्षा या लंबी सूखा अवधि देखने को मिलती है।
यह बताता है कि मानसून की गतिविधियां लगातार प्रभावित हो रही हैं। इस वर्ष मानसून सीजन में मालवा-निमाड़ कम बारिश का शिकार बना है। ऐसा पहले भी हुआ, लेकिन यह पैटर्न अब लगातार बनता जा रहा है। इस कारण इंदौर सहित पश्चिमी मध्य प्रदेश में जुलाई लगभग सूखा बीता।
जून में भी यही हालत थी तो अगस्त भी बहुत कम वर्षा का रहा। सितंबर का पहला पखवाड़ा बीतने के साथ ही मानसून की विदाई का वक्त आ जाएगा। यानी इस बार इंदौर और मालवा-निमाड़ में वर्षा का पानी बहुत कम रहने वाला है और इसका गंभीर प्रभाव अगले वर्ष की गर्मी में पसीने छुड़ा देगा।
उत्तर-पूर्व में जब होती है अच्छी बारिश तब दक्षिण-पश्चिम में आता है कम पानी, वायु पैटर्न में स्थिरता और अधिकांश सिस्टम्स के पूर्वी मध्य प्रदेश की ओर मुड़ने के कारण समझाने पर स्पष्ट होता है कि पश्चिम मध्य प्रदेश में कम बारिश होती है।
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार इस मानसून सीजन में हवा का रुख मुख्य रूप से पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी दिशा से बना रहा, जिसके कारण मानसूनी सिस्टम को अपेक्षित नमी और गति नहीं मिल पाई।
आमतौर पर बंगाल की खाड़ी या अरब सागर से उठने वाले कम दबाव के क्षेत्र एक निश्चित मानसूनी ट्रफ (द्रोणिका) के सहारे आगे बढ़ते हैं। इस बार यह मानसूनी ट्रफ अपनी सामान्य स्थिति से उत्तर या दक्षिण की ओर खिसकने के बजाय कुछ इस प्रकार सक्रिय रही कि अधिकांश मौसम प्रणालियां छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और पूर्वी मध्य प्रदेश के रास्ते आगे बढ़ गईं।
पश्चिमी मध्य प्रदेश के ऊपर इन प्रणालियों के लिए अनुकूल वायुमंडलीय दबाव और ‘साइक्लोनिक सर्कुलेशन’ (चक्रवाती परिसंचरण) का अभाव रहा, जिस वजह से हवा का पैटर्न बदला नहीं और सिस्टम पश्चिम के बजाय पूर्व की तरफ अधिक बरसे।
इंदौर समेत मालवा-निमाड़ पर इसका तीव्र प्रभाव क्यों?
भौगोलिक और वायुमंडलीय स्थिति के कारण इंदौर, उज्जैन, खरगोन आदि जैसे पश्चिमी जिलों में मानसूनी हवा का प्रभाव कमजोर पड़ जाता है। जब तक बंगाल की खाड़ी के सिस्टम्स मजबूत स्थिति में होते हैं, वे पश्चिमी छोर तक पहुंचते-पहुंचते अपनी ऊर्जा खो चुके होते हैं। इसके अलावा स्थानीय स्तर पर बादलों के घनत्व को रोकने और संघनन के लिए आवश्यक भौगोलिक अवरोध तथा नमी युक्त दक्षिणी-पश्चिमी हवा की निरंतरता का मेल इस बार मालवा-निमाड़ में नहीं बैठ पाया।
पूर्व में अधिक और पश्चिम में कम वर्षा का विरोधाभास
यह एक स्थापित मौसमी परिघटना है कि जब मध्य भारत में ट्रफ लाइन उत्तर की ओर झुकती है या पूर्वी राज्यों की तरफ सक्रिय होती है, तब पूर्वी मध्य प्रदेश (जैसे महाकौशल और विंध्य क्षेत्र) में भारी मानसूनी गतिविधियां होती हैं।
इसके विपरीत पश्चिमी मध्य प्रदेश (मालवा-निमाड़) ‘रेनवशैडो’ जैसी प्रभाव स्थितियों या मुख्य ट्रफ लाइन से दूरी के कारण सूखे या अल्पवर्षा के दौर में चला जाता है। जब एक ही राज्य में पूर्वी हिस्से को सिस्टम की सीधी नुमाइंदगी मिलती है, तो पश्चिमी हिस्सा मानसूनी हवा की शुष्कता का शिकार हो जाता है।
ट्रफ का मूवमेंट और बारिश पर इसका असर
यह ट्रफ स्थिर नहीं रहती, बल्कि भौगोलिक परिस्थितियों और वेदर सिस्टम्स के आधार पर उत्तर (तराई क्षेत्रों) या दक्षिण की ओर खिसकती है। जब यह ट्रफ तराई के इलाकों में होती है तो हवा की दिशा बदल जाती है।
ट्रफ के ऊपरी हिस्से (उत्तर) में पूर्वी दिशा से नमी वाली हवा चलती है, जिससे वहां भारी बारिश होती है, जबकि इसके नीचे के हिस्से में पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी दिशा से आने वाली हवा पूरी तरह शुष्क (सूखी) होती है। हवा की इस उलटी दिशा और नमी के अभाव के कारण निचले हिस्सों में बादल नहीं बन पाते और बारिश रुक जाती है।
इस मानसून सीजन में पश्चिमी मध्य प्रदेश में सूखे जैसे हालात क्यों बने? इस सवाल का कुछ हद तक जवाब ट्रफ और विंड पैटर्न की स्थिति से मिलता है। इस सीजन में अधिकांश समय मानसूनी ट्रफ उत्तर में तराई के पास सक्रिय रही और जो नए वेदर सिस्टम बने, उनका ट्रैक पूर्वी भारत (पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़) और पूर्वी मध्य प्रदेश की तरफ ही केंद्रित रहा।
मानसून ट्रफ से बने सूखे जैसे हालात
ट्रफ एक ऐसा शब्द है, जो मानसून का मुख्य केंद्र है और इसको नियंत्रित करता है। मानसून ट्रफ क्या है और यह कैसे बनती है? मौसम विज्ञान के अनुसार मानसूनी ट्रफ कम दबाव के क्षेत्रों को आपस में जोड़ने वाली एक मौसमी रेखा या द्रोणिका होती है। यह सामान्यतः उत्तर-पश्चिम भारत से लेकर बंगाल की खाड़ी तक फैली होती है। इसके बनने की मुख्य वजह वायुमंडलीय दाब में अंतर और मानसूनी हवा का संगम है।
पश्चिमी हवा का प्रभाव
पश्चिमी मध्य प्रदेश (जैसे इंदौर, उज्जैन, मालवा-निमाड़ क्षेत्र) और राजस्थान की तरफ लगातार शुष्क पश्चिमी हवा हावी रहने से विंड पैटर्न में सकारात्मक बदलाव नहीं हुआ और मानसूनी सिस्टम पश्चिम तक मजबूत स्थिति में नहीं पहुंच सके।
अलनीनो का प्रभाव
इस वर्ष अलनीनो का प्रभाव अधिक प्रभावी रहने के कारण भारतीय उपमहाद्वीप में मानसूनी गतिविधियां कमजोर बनी रहीं, जिससे बड़े पैमाने पर कृषि सूखे जैसे हालात पैदा हो गए और पश्चिमी मध्य प्रदेश के कई जिले पानी की कमी से जूझ रहे हैं।
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