जिला प्रशासन को 1500 करोड़ का बड़ा झटका: हाईकोर्ट ने खारिज किया सीलिंग आदेश
KHULASA FIRST
संवाददाता

सोनगिर की जमीन पर विकास मंजूरी
रोकने की कार्रवाई को कोर्ट ने बताया मनमाना, कॉलोनाइजरों के पक्ष में सुनाया फैसला
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने हातोद तहसील के सोनगिर क्षेत्र स्थित सीलिंग जमीन मामले में जिला प्रशासन के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताते हुए विकास मंजूरी निरस्त करने के आदेश को खारिज कर दिया है। उच्च न्यायालय ने इस पूरी प्रशासनिक कार्रवाई को मनमाना, गैर-कानूनी और अनुचित ठहराते हुए याचिककर्ताओं की रिट ऑफ मैंडेमस (परमादेश) याचिका स्वीकार कर ली है।
जिला प्रशासन ने 2006 से 2010 तक के राजस्व रिकॉर्ड और 8 दिसंबर 2010 के एक गायब आदेश को आधार बनाकर स्वास्तिक ग्रांड और ल्युमिनयस कॉरिडोर की विकास मंजूरियों पर रोक लगाई थी, जिससे लगभग 1500 करोड़ रुपए का झटका लगा है।
मामले की शुरुआत जून 2026 में हुई, जब ल्युमिनयस कॉरिडोर के आवेदक मेहुल मेहता पिता नवीन मेहता ने विकास मंजूरी के लिए आवेदन जमा किया। जांच के दौरान प्रशासनिक रिकॉर्ड में सामने आया कि संबंधित सर्वे नंबर 2006 से 2010 तक सीलिंग मद में सरकारी दर्ज थे।
8 दिसंबर 2010 के एक आदेश से इन्हें सीलिंग मुक्त करके निजी दर्ज किया गया था, लेकिन जिला प्रशासन की जांच में यह आदेश रजिस्टर से नदारद मिला। इसी गायब आदेश का हवाला देकर प्रशासन ने जुलाई 2026 में ल्युमिनयस कॉरिडोर का आवेदन निरस्त कर दिया। साथ ही इसी सर्वे नंबर के आधार पर भाजपा नेता निलेश चौधरी और उनके परिवार की स्वास्तिक ग्रांड कॉलोनी को पूर्व में दी जा चुकी विकास मंजूरी भी रद्द कर दी।
इस प्रशासनिक कार्रवाई के खिलाफ ल्युमिनयस कॉरिडोर ने इंदौर उच्च न्यायालय में याचिका दायर की, जिसमें मध्य प्रदेश सरकार, अपर कलेक्टर (कॉलोनी सेल) और संयुक्त कलेक्टर (कॉलोनी सेल) को पक्षकार बनाया गया।
कॉलोनाइजरों की ओर से पक्ष रखते हुए तर्क दिया गया कि बोर्ड ऑफ रेवेन्यू जून 2004 में ही सीलिंग की कार्रवाई रद्द कर चुका था। इसके बाद प्रशासन ने न तो कोई अपील दायर की और न ही सीलिंग की नई प्रक्रिया शुरू की।
जमीन की खरीद-बिक्री, नामांतरण, डायवर्शन और नगर तथा ग्राम निवेश (टीएंडसीपी) से अनुमति लेते समय किसी स्तर पर आपत्ति दर्ज नहीं की गई थी। खुद तहसीलदार ने सितंबर 2025 के नामांतरण आदेश में स्पष्ट लिखा था कि रिकॉर्ड में जमीन सरकारी नहीं पाई गई है। कॉलोनाइजरों ने भारी निवेश के बाद 2010 के गायब आदेश को आधार बनाकर मंजूरी रोकने को पूरी तरह गलत बताया।
जिला प्रशासन की ओर से तर्क दिया गया कि सीलिंग एक्ट 1976 के तहत जब कार्रवाई हुई थी, तब भू-स्वामी हिंदू सिंह थे। उन्हें केवल 81 एकड़ जमीन रखने की पात्रता थी और शेष 151 एकड़ जमीन सीलिंग घोषित की गई थी।
1982, 1984 और 1988 में भी आदेश जारी हुए थे। बोर्ड ऑफ रेवेन्यू ने 2003 में हिंदू सिंह की याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद जून 2004 में बोर्ड ने उत्तराधिकारियों की याचिका मंजूर करते हुए सीलिंग कार्रवाई रद्द की, लेकिन प्रशासन का दावा था कि इसमें 151 एकड़ जमीन को राहत देने का स्पष्ट उल्लेख नहीं था, इसलिए जुलाई 2026 की निरस्तीकरण कार्रवाई नियमानुसार सही थी।
उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जिला प्रशासन के तर्कों को पूरी तरह नकार दिया। न्यायालय ने परमादेश जारी करते हुए कहा कि 2004 के बाद जब प्रशासन ने बोर्ड के फैसले के खिलाफ कोई अपील नहीं की और न ही सीलिंग प्रक्रिया आगे बढ़ाई, तब केवल एक पुराने रिकॉर्ड के आधार पर विकास मंजूरी रोकना पूरी तरह अनुचित है।
जब कॉलोनाइजरों ने वैध तरीके से जमीन खरीदकर सभी आवश्यक अनुमतियां प्राप्त कर ली थीं और भारी पूंजी का निवेश कर दिया था, तब इतने वर्षों बाद गायब आदेश का हवाला देकर कार्रवाई करना अधिकारियों की मनमानी को दर्शाता है। कोर्ट ने जुलाई 2026 के विकास मंजूरी निरस्त करने वाले आदेश को गैर-कानूनी करार देते हुए याचिककर्ताओं की मांग के अनुसार मंजूरी देने का निर्देश दिया।
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