डोनाल्ड ट्रंप को योग और ध्यान की जरूरत: युद्ध और वैश्विक तनाव से बचने के लिए योग शासन अपनाएं
KHULASA FIRST
संवाददाता

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
आज की दुनिया के विचारों में ही हिंसा है, इसलिए आक्रामकता, अहंकार, निजी स्वार्थ और प्रभुत्व की भावना सिर पर चढ़कर बोल रही है। वैश्विक शांति के लिए योग के महत्व से कोई भी इनकार नहीं कर सकता।
‘विश्व शांति के लिए योग’ बन सकता है नया अभियान... मध्यप्रदेश योग आयोग के अध्यक्ष डॉ. राघवेंद्र शर्मा सोचते हैं कि आने वाले समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव योग को केवल स्वास्थ्य अभियान तक सीमित नहीं रखना चािहए, बल्कि इसे ‘विश्व शांति और वैचारिक अहिंसा एवं असुरक्षा के साथ मानसिक तनाव व वैचारिक द्वंद्व’ से बाहर निकालने के लिए बड़े संदेश से जोड़ने की दिशा में भी विचार कर सकते हैं।
डॉ. शर्मा का मानना है कि यदि वैश्विक नेतृत्व तनावमुक्त और वैचारिक रूप से संतुलित शांत और अहिंसक होगा तो दुनिया संभावित बड़े संघर्षों और युद्धों से भी बच सकती है।
भारत की प्राचीन परंपरा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ पूरी दुनिया को एक परिवार मानने की शिक्षा देती है और योग उसी दर्शन का व्यावहारिक स्वरूप है। आज जब पूरी दुनिया भय, असुरक्षा और संघर्ष के माहौल से गुजर रही है, तब योग भारत की ओर से दिया गया ऐसा संदेश बनकर उभर रहा है, जो केवल शरीर नहीं बल्कि मानवता को भी स्वस्थ बनाने की बात करता है।
डॉ. शर्मा का मानना है कि दुनिया इस समय युद्ध, तनाव, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और राजनीतिक अस्थिरता के कठिन दौर से गुजर रही है। अमेरिका, चीन, रूस, ईरान और अन्य शक्तिशाली देशों के निर्णय केवल उनके राष्ट्रों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि पूरी मानवता को प्रभावित करते हैं।
ऐसे समय में यह प्रश्न भी उठ रहा है कि क्या विश्व नेतृत्व को केवल सैन्य और आर्थिक शक्ति ही नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन और आध्यात्मिक स्थिरता की भी आवश्यकता है? उनका मानना है कि योग केवल आम लोगों के स्वास्थ्य का विषय नहीं है, बल्कि यह वैश्विक नेतृत्व को भी संतुलित और सकारात्मक सोच देने वाला माध्यम बन सकता है।
उनका कहना है कि यदि दुनिया के शक्तिशाली राष्ट्राध्यक्ष योग, ध्यान और प्राणायाम जैसी भारतीय पद्धतियों को अपनाएं, तो निर्णय प्रक्रिया अधिक शांत, मानवीय और दूरदर्शी हो सकती है। उन्होंने कहा कि आज विश्व में जिस तरह तनाव और संघर्ष बढ़ रहे हैं, उसमें मानसिक शांति सबसे बड़ी आवश्यकता बन गई है।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हों, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग हों या ईरान का शीर्ष नेतृत्व, यदि विश्व नेतृत्व योग और ध्यान को जीवन का हिस्सा बनाए, तो वे अधिक संतुलित मानसिक स्थिति में मानवता के हित में निर्णय ले सकते हैं।
बदलती जलवायु और बढ़ती बीमारियों की दवा योग... डा. शर्मा ने कहा कि ‘योग केवल व्यायाम नहीं, बल्कि मानवता की सुरक्षा का माध्यम’ भी है। पूरी धरती को अपनी चपेट में ले चुका प्रदूषण, इससे हो रही ग्लोबल वार्मिंग, क्लाईमेट चेंज और बदलती जीवनशैली ने पूरी दुनिया के सामने स्वास्थ्य का गंभीर संकट खड़ा कर दिया है।
कोरोना जैसी वैश्विक महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि केवल आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था ही नहीं, बल्कि मजबूत प्रतिरोधक क्षमता और संतुलित जीवनशैली भी मानव जीवन की रक्षा के लिए उतनी ही आवश्यक है।
ऐसे दौर में भारतीय परंपरा की अमूल्य धरोहर ‘योग’ एक प्रभावी समाधान के रूप में दुनिया के सामने उभरकर आया है।
मध्यप्रदेश योग आयोग के नवनियुक्त अध्यक्ष शर्मा ने मीडिया से चर्चा में कहा कि ‘प्रिवेंशन इज बेटर देन केयर’ यानी उपचार से अधिक महत्वपूर्ण बचाव है, और योग इसी सिद्धांत पर आधारित जीवन पद्धति है।
उनका मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण नई-नई बीमारियां, वायरस और मानसिक तनाव तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे समय में योग शरीर को शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत बनाकर रोगों से लड़ने की क्षमता देता है।
उन्होंने कहा कि कोरोना महामारी के दौरान यह अनुभव सामने आया कि नियमित योग और प्राणायाम करने वाले लोगों की प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षाकृत अधिक मजबूत रही।
योग ने न केवल शरीर को बल्कि मानसिक संतुलन और आत्मविश्वास को भी बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही कारण है कि आज पूरी दुनिया योग की ओर उम्मीद से देख रही है।
‘लोकल से ग्लोबल’ तक योग की यात्रा... भारत की प्राचीन ऋषि परंपरा से निकला योग आज वैश्विक आंदोलन बन चुका है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा 21 जून को ‘अंतरराष्ट्रीय योग दिवस’ घोषित किए जाने के बाद योग को दुनिया के लगभग हर देश में नई पहचान मिली।
अमेरिका, यूरोप, रूस, जापान और खाड़ी देशों तक में योग केंद्र तेजी से बढ़े हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी अब योग को तनाव नियंत्रण, मानसिक स्वास्थ्य, डायबिटीज, हृदय रोग और जीवनशैली जनित बीमारियों के नियंत्रण में उपयोगी मान रहा है।
डा. शर्मा का कहना है कि भारत को योग की इस वैश्विक स्वीकार्यता को केवल सांस्कृतिक गौरव तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इसे मानव कल्याण के बड़े अभियान में बदलना होगा।
उन्होंने संकेत दिए कि मध्यप्रदेश योग आयोग आने वाले समय में योग को जन-जन तक पहुंचाने के लिए कई नवाचार करेगा। स्कूलों, युवाओं, महिलाओं और ग्रामीण क्षेत्रों को विशेष रूप से योग से जोड़ने की योजना पर काम किया जाएगा।
अध्यात्म, अनुशासन और भारतीयता का समन्वय... डा. शर्मा का व्यक्तित्व भारतीय संस्कृति, अनुशासन और आध्यात्मिक चेतना से जुड़ा है। वे योग को केवल आसन तक सीमित नहीं मानते, बल्कि उसे संपूर्ण जीवन प्रबंधन की कला बताते हैं।
उनका विश्वास है कि योग मनुष्य को भीतर से मजबूत बनाता है और समाज में सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण करता है। वे मानते हैं कि आज की भागदौड़, तनाव, अवसाद और प्रदूषण भरी जिंदगी में योग केवल स्वास्थ्य का विषय नहीं, बल्कि मानव सभ्यता को संतुलित रखने का माध्यम बन चुका है। इसलिए योग को चिकित्सा के वैकल्पिक आयाम, रिसर्च और आधुनिक विज्ञान से जोड़ने की दिशा में भी काम होना चाहिए।
विज्ञान और योग से शतायु ... डा. राघवेंद्र शर्मा का मानना है कि विज्ञान और योग के संयोग से इंसान फिर से शतायु यानी 100 साल से अधिक की उम्र का सकता है।
कहीं राष्ट्रों के प्रमुख इस जोड़-तोड़ में लगे हैं कि वह 100 वर्ष से अधिक समय तक जीवित रहे इनके लिए योग, ध्यान, प्राणायाम संजीवनी बूटी है, इन्हें योग को अपनाना चाहिए।
नई सदी में योग स्वास्थ्य ही नहीं, मानवता की आवश्यकता....
आज जब पूरी दुनिया जलवायु संकट, मानसिक तनाव और नई महामारियों की चुनौती से जूझ रही है, तब योग भारत की ओर से विश्व को दिया गया ऐसा संदेश बनकर उभरा है, जो शरीर, मन और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित करने की बात करता है।
भारत ने दुनिया को केवल योग सिखाया नहीं, बल्कि यह भी बताया कि स्वस्थ जीवन केवल दवाओं से नहीं, बल्कि अनुशासित दिनचर्या, संतुलित विचार और प्रकृति के साथ सामंजस्य से संभव है।
ऐसे समय में मध्य प्रदेश योग आयोग की नई पहलें यदि समाज तक प्रभावी रूप में पहुंचती हैं, तो योग आने वाले वर्षों में स्वास्थ्य सुरक्षा का सबसे बड़ा जनआंदोलन बन सकता है।
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