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सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बावजूद तिकोना बगीचे में अवैध निर्माण: प्रशासन पर भूमाफियाओं को संरक्षण देने का आरोप

KHULASA FIRST

संवाददाता

30 मई 2026, 2:45 pm
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सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बावजूद तिकोना बगीचे में अवैध निर्माण

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
देशभर में अवैध निर्माण, मास्टर प्लान उल्लंघन और आवासीय भवनों के व्यावसायिक उपयोग पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है।

जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने साफ कहा है कि यदि किसी भवन को एक उपयोग के लिए अनुमति मिली और बाद में उसका उपयोग बदल दिया गया, तो यह व्यवस्था के साथ धोखाधड़ी है। कोर्ट ने नगर निकायों और विकास प्राधिकरणों को केवल सर्वे नहीं, बल्कि वास्तविक कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।

छत्रीबाग स्थित ‘तिकोना बगीचा’ मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बावजूद प्रशासनिक उदासीनता और कथित मिलीभगत के आरोप लगातार गहराते जा रहे हैं।

रहवासियों का आरोप है कि सरकारी बगीचे की जमीन पर वर्षों से अवैध निर्माण जारी है और जिला प्रशासन व नगर निगम आंखें मूंदे बैठे हैं।

‘समस्या केवल एक राज्य तक सीमित नहीं...’ तमिलनाडु के एक अवैध निर्माण और भूमि उपयोग उल्लंघन मामले की 20 मई 2026 को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह समस्या केवल एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में रिहायशी इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियां, अतिरिक्त मंजिलें और स्वीकृत नक्शों से अलग निर्माण बड़े पैमाने पर हो रहे हैं।

कोर्ट ने कहा कि केवल सर्वे रिपोर्ट देना पर्याप्त नहीं होगा। अवैध निर्माणों पर सीलिंग और ध्वस्तीकरण जैसी कार्रवाई करनी होगी।

संबंधित प्राधिकरणों के चेयरमैन, सीईओ व आयुक्त स्वयं हलफनामा देंगे। भूमि उपयोग परिवर्तन और भवन नियम उल्लंघन से जुड़े मामलों का तीन महीने में निपटारा किया जाए।

सभी राज्यों को 50 हजार रुपए कोर्ट रजिस्ट्री में जमा करने के निर्देश दिए गए।

‘तिकोना बगीचा’ अब भूमि विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह सरकारी जमीनों पर कब्जा कराने वाले कथित फर्जी दस्तावेज गिरोह, भ्रष्ट प्रशासनिक तंत्र और राजनीतिक संरक्षण का बड़ा उदाहरण बनता जा रहा है।

जिस जमीन पर कभी ‘साईंनाथ उद्यान’ हुआ करता था, जहां बच्चे खेलते थे, धार्मिक आयोजन होते थे और आसपास के रहवासियों को पानी मिलता था, आज वहां अवैध दुकानें, ऑफिस और व्यावसायिक निर्माण खड़े हैं।

रहवासियों का आरोप है कि वर्षों से शिकायतों, नोटिसों और न्यायालयीन आदेशों के बावजूद प्रशासन ने कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की।

अधिकारियों की भूमिका पर उठे सवाल
पूरे मामले में एसडीएम, तहसीलदार, पटवारी, भवन अधिकारी, भवन निरीक्षक, अपर आयुक्त और नगर निगम अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि निर्माण अवैध था तो वर्षों तक दुकानें कैसे चलती रहीं? बिजली-पानी के कनेक्शन किस आधार पर दिए गए? न्यायालयीन विवाद और शिकायतों के बावजूद भवन अनुमति कैसे जारी हुई?

रहवासियों का आरोप है कि सरकारी पक्ष ने अदालत में भी प्रभावी जवाब प्रस्तुत नहीं किए, जिससे कब्जाधारियों को समय मिलता गया और कब्जा मजबूत होता गया।

नगर निगम ने हाल ही में भवन अनुमति निरस्त कर 15 दिन का नोटिस जारी किया था और अवैध निर्माण हटाने की चेतावनी दी थी। अब नोटिस की अवधि समाप्त होने जा रही है, लेकिन जमीन पर निर्माण कार्य जारी रहने के आरोप लग रहे हैं। शहर में यह चर्चा तेज है कि क्या यह कार्रवाई भी केवल कागजी साबित होगी या पहली बार वास्तव में अवैध निर्माणों पर बुलडोजर चलेगा।

फर्जी दस्तावेजों से सरकारी जमीन को बताया निजी

सबसे गंभीर आरोप यह है कि सरकारी उद्यान की जमीन हड़पने के लिए कथित रूप से फर्जी दस्तावेज बनाए गए। पुराने नक्शों, बदलते खसरों व संदिग्ध रिकॉर्ड पर शासकीय भूमि को निजी प्लॉट के रूप में प्रस्तुत किया गया और फिर भवन अनुमति तक जारी कर दी गई।

यह कोई साधारण फर्जीवाड़ा नहीं बल्कि संगठित नेटवर्क है, जो सरकारी जमीनों को निजी बताकर करोड़ों रुपए का कारोबार करता है।

2004 से शिकायतें, फिर भी जारी रही अनुमति: रहवासियों के अनुसार सर्वे नंबर 911 और 912 राजस्व रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से शासकीय भूमि दर्ज हैं। इसके बावजूद निगम ने 2025 में भवन अनुमति जारी कर दी।

क्या है गड़बड़झाला: 2004 से कब्जों की शिकायतें मौजूद थीं। वर्ष 2015 की जांच में अवैध निर्माण की पुष्टि हुई थी। तहसीलदार न्यायालय ने निर्माण रोकने के आदेश भी दिए थे।

इसके बावजूद निर्माण कार्य जारी रहा और कथित रूप से प्रशासनिक संरक्षण मिलता रहा। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, इंदौर में दायर याचिका क्रमांक 18376/2026 (परमजीत कौर लोंगिया बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य) में 22 मई 2026 को सुनवाई हुई।

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता वीर कुमार जैन और अधिवक्ता कौस्तुभ पाठक उपस्थित हुए। कोर्ट ने प्रतिवादियों को नोटिस जारी करते हुए विवादित आदेश पर अगली सुनवाई तक स्थगन आदेश दिया।

इसके बावजूद रहवासियों का आरोप है कि विवादित जमीन पर निर्माण कार्य लगातार जारी है और जिम्मेदार अधिकारी कार्रवाई करने के बजाय चुप्पी साधे हुए हैं।

रहवासियों की मांग
इस गंभीर मामले में भूमाफिया और अधिकारियों पर एफआईआर दर्ज की जाए। संघर्ष समिति और स्थानीय रहवासियों ने मांग की है कि पूरे मामले की एसआईटी या आर्थिक अपराध शाखा से जांच कराई जाए।

इसके अलावा फर्जी दस्तावेज तैयार करने वाले नेटवर्क पर एफआईआर दर्ज हो। मामले में जिम्मेदार अधिकारियों को तत्काल निलंबित कर विभागीय जांच शुरू की जाए।

इसके अलावा सरकारी जमीन को अतिक्रमण मुक्त कर पुनः सार्वजनिक उद्यान विकसित किया जाए। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि प्रशासन ईमानदारी से कार्रवाई करे तो आज भी तिकोना बगीचा जनता को वापस मिल सकता है।

जब 1982 से यह जमीन नगर निगम के अधिपत्य में है, जब राजस्व रिकॉर्ड इसे शासकीय भूमि बता रहे हैं, जब 2004 से शिकायतें दर्ज हैं, जब न्यायालय में मामला लंबित है और जब प्रशासन के पास सभी दस्तावेज मौजूद हैं, तब आखिर 22 वर्षों तक सरकारी बगीचे की जमीन पर कब्जा किसके संरक्षण में चलता रहा?

अब देखना यह होगा कि सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों और हाई कोर्ट के आदेशों के बाद प्रशासन वास्तविक कार्रवाई करता है या फिर यह मामला भी नोटिसों और फाइलों तक सीमित रह जाएगा।

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