अमरनाथ मार्ग की सांस्कृतिक विरासत: पत्थरों पर की गई नक्काशी से अमरनाथ तक कश्मीर का वो ऐतिहासिक मार्ग; जहां पत्थरों में बसती थी आस्था
KHULASA FIRST
संवाददाता

बर्फीली गुफा से पहले प्रस्तर-धाम, कश्मीरी स्थापत्य का भूला-बिसरा परिपथ
जब मार्तंड और अवंतीपुर बनते थे यात्रा के अहम पड़ाव
अनंतनाग से पहलगाम तक फैले मध्यकालीन वैभव और अमरनाथ का संबंध
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
पवित्र अमरनाथ गुफा की ओर बढ़ते श्रद्धालुओं के कदम जब अनंतनाग और पहलगाम के रास्तों को नापते हैं, तो उनका ध्यान अमूमन सामने दिखती बर्फीली चोटियों और दुर्गम चढ़ाई पर केंद्रित होता है। हालांकि, जिस धरातल पर यह यात्रा आकार लेती है, वह केवल एक प्राकृतिक या भौगोलिक मार्ग भर नहीं है।
श्रीनगर से पहलगाम के बीच फैला लिडर घाटी का यह अंचल वास्तव में प्राचीन भारत के उस भव्य वास्तुकला गलियारे का जीवंत साक्ष्य है, जो 8वीं से 9वीं शताब्दी ईस्वी में स्थापत्य कला और अभियांत्रिकीय श्रेष्ठता का शिखर माना जाता था।
इतिहास के पन्नों को पलटें तो अमरनाथ यात्रा केवल गुफा में प्राकृतिक रूप से बनने वाले हिमलिंग के दर्शन तक सीमित नहीं थी। मध्यकालीन कश्मीर में यह यात्रा सांस्कृतिक और स्थापत्य वैभव के पड़ावों से होकर गुजरती थी।
कारकोट और उत्पल राजवंशों के काल में निर्मित विशाल प्रस्तर-मंदिर यानी पत्थरों पर की गई नक्काशी न केवल आस्था के केंद्र थे, बल्कि अमरनाथ तीर्थयात्रा के मुख्य आधार बिंदु भी हुआ करते थे।
कारकोट राजवंश का स्थापत्य वैभव और मार्तंड सूर्य मंदिर... श्रीनगर से लगभग 64 किलोमीटर दूर अनंतनाग के समीप मत्तण नामक स्थान पर एक ऊंचे पठार (करेवा) पर स्थित मार्तंड सूर्य मंदिर के अवशेष आज भी मध्यकालीन भारतीय प्रस्तर-कला की श्रेष्ठता का लोहा मनवाते हैं। 8वीं शताब्दी ईस्वी (लगभग 725–761 ईस्वी) में कारकोट वंश के सबसे प्रतापी सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड़ ने इस विशाल मंदिर का निर्माण करवाया था।
बिना गारे की इंटरलॉकिंग तकनीक और खगोलीय गणित... पुरातात्विक अध्ययन बताते हैं कि मार्तंड सूर्य मंदिर का निर्माण चूना पत्थर के विशालकाय शिलाखंडों से किया गया था। इस संरचना की सबसे बड़ी अभियांत्रिकीय विशेषता यह थी कि इसमें पत्थरों को जोड़ने के लिए किसी प्रकार के चूने या गारे का प्रयोग नहीं हुआ था।
इसके बजाय पत्थरों को ‘इंटरलॉकिंग’ तकनीक और लोहे की क्लिपों के माध्यम से इस तरह जोड़ा गया था कि यह सदियों तक प्राकृतिक आपदाओं को झेल सके। इस मंदिर के वास्तुकला में यूनानी , गंधार और पारंपरिक कश्मीरी शैली का अनूठा मिश्रण देखने को मिलता है-
84 स्तंभों की परिक्रमा शृंखला...मुख्य मंदिर के चारों ओर 84 अलंकृत स्तंभों से घिरा एक विशाल प्रांगण था। पुरातात्विक विशेषज्ञों के अनुसार, ये 84 स्तंभ वर्ष के 84 सौर-मासों और तत्कालीन खगोलीय व ज्योतिषीय गणित का प्रतिनिधित्व करते थे।
प्रकाश अभियांत्रिकी... मंदिर का वास्तु-विन्यास इस प्रकार किया गया था कि प्रात:काल सूर्योदय की प्रथम किरण सीधे मुख्य गर्भगृह में स्थापित भगवान सूर्य की प्रतिमा पर पड़ती थी।
उत्पल राजवंश और अवंतीपुर का नगरीय स्थापत्य... 855 ईस्वी में जब कश्मीर में उत्पल राजवंश का उदय हुआ, तो राजा अवंतीवर्मन (855–883 ईस्वी) ने झेलम नदी के तट पर अपनी नई राजधानी ‘अवंतीपुर’ (वर्तमान अवंतीपोरा) की स्थापना की। यहां उन्होंने पत्थरों के दो अत्यंत विशाल और कलात्मक मंदिर परिसरों का निर्माण कराया, जो अमरनाथ जाने वाले श्रद्धालुओं के प्रमुख पड़ाव बने।
अवंतीस्वामी और अवंतीश्वर मंदिर, अवंतीस्वामी मंदिर (भगवान विष्णु)... यह मंदिर अपनी सूक्ष्म नक्काशी और मूर्तिकला के लिए प्रसिद्ध था। इसकी चूना व बलुआ पत्थर की दीवारों और स्तंभों पर उकेरी गई गरुड़, नाग, अप्सराओं तथा तत्कालीन राजसी वेशभूषा में सजे पात्रों की आकृतियाँ कश्मीरी मूर्तिकला के सर्वोत्कृष्ट काल को दर्शाती हैं।
अवंतीश्वर मंदिर (भगवान शिव)... यह विशाल शिव धाम आकार में अवंतीस्वामी मंदिर से भी बड़ा था। इसके गर्भगृह के चारों ओर निर्मित परिक्रमा पथ और पत्थरों को काटकर बनाई गई जल-निकासी प्रणालियां उस दौर के उन्नत नगर-आयोजन को सिद्ध करती हैं।
अमरनाथ यात्रा मार्ग से ऐतिहासिक व धार्मिक संबंध...अनंतनाग-पहलगाम का यह स्थापत्य गलियारा केवल साम्राज्य की शक्ति का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि अमरनाथ तीर्थयात्रा की मुख्य जीवनरेखा था।
संकल्प और विश्राम का पारंपरिक पड़ाव... प्राचीन काल में जब देश के विभिन्न हिस्सों से साधु-संत, संन्यासी और गृहस्थ श्रद्धालु यात्रा पर निकलते थे, तो श्रीनगर के बाद उनका पहला मुख्य पड़ाव अवंतीपुर और तत्पश्चात मत्तण (मार्तंड) होता था।
स्थानीय कश्मीरी संस्कृत ग्रंथों और भृगु संहिता के संदर्भों के अनुसार, श्रद्धालु इन विशाल प्रस्तर परिसरों के पवित्र कुंडों में स्नान कर, विद्वानों की उपस्थिति में दुर्गम यात्रा को निर्विघ्न पूरा करने का धार्मिक संकल्प (विष्णु व शिव पूजन) लेते थे।
‘छड़ी मुबारक’ की सदियों पुरानी परंपरा... दशनामी अखाड़े के साधुओं द्वारा श्रीनगर से पवित्र अमरनाथ गुफा तक ले जाई जाने वाली ‘छड़ी मुबारक’ की पारंपरिक पदयात्रा आज भी इसी ऐतिहासिक मार्ग की निरंतरता को बनाए हुए है। श्रीनगर से प्रस्थान कर छड़ी मुबारक सबसे पहले अवंतीपुर और फिर मत्तण के मार्तंड तीर्थ पहुंचती है, जहां प्राचीन विधि-विधान से इसका पूजन किया जाता है।
लिडर घाटी का प्रवेश द्वार: ममलेश्वर मंदिर... मार्तंड से आगे जब यात्री लिडर नदी के किनारे-किनारे पहलगाम पहुंचते हैं, तो वहां स्थित ममलेश्वर मंदिर (मम्मल मंदिर) इस वास्तुकला गलियारे की अंतिम कड़ी के रूप में सामने आता है।
12वीं शताब्दी से पूर्व निर्मित यह शुद्ध प्रस्तर शिव मंदिर इस बात का प्रमाण है कि मैदानी भागों से लेकर उच्च हिमालय की तलहटी (पहलगाम) तक एक ही स्थापत्य शैली और धार्मिक परिपथ विद्यमान था।
विरासत की वर्तमान स्थिति और पुरातात्विक महत्व... 14वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में राजनीतिक परिवर्तनों, प्राकृतिक आपदाओं और विनाशकारी भूकंपों के कारण ये भव्य स्थापत्य संरचनाएँ भग्नावशेषों में तब्दील हो गईं। हालांकि, आज भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित ये अवशेष अपनी विशालता, बिना गारे के जुड़े शिलाखंडों और नक्काशीदार स्तंभों के बल पर यह स्पष्ट करते हैं कि 8वीं और 9वीं शताब्दी में कश्मीर अध्यात्म, उच्च अभियांत्रिकी और वास्तुकला का एक वैश्विक केंद्र था।
अमरनाथ यात्रा पर निकलने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह वास्तुकला गलियारा केवल पत्थरों के खंडहर नहीं हैं, बल्कि उस महान सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर के साक्ष्य हैं, जो भारत के मैदानी भागों को हिमालय की पवित्र अमरनाथ गुफा से जोड़ती हैं।
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