करोड़ों खर्च हुए, परंतु वाटर प्लांट कहां गए: कई जगह वाटर यूनिट्स बंद; कई जगह से गायब, ऐसा क्यों? हाई कोर्ट ने पूछा
KHULASA FIRST
संवाददाता

मुख्य सचिव नगरीय प्रशासन व निगम कमिश्नर सहित अन्य को नोटिस जारी
चार सप्ताह के भीतर देना होगा जवाब
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
स्मार्ट सिटी मिशन के तहत आम लोगों को राहत देने के लिए लगाए गए करोड़ों रुपए के पेयजल वाटर प्लांट अब खुद सवालों के घेरे में आ गए हैं। शहर के चौराहों और सार्वजनिक स्थानों पर लगाए गए ये वाटर यूनिट्स पहले बंद मिले और अब कई जगह से पूरी तरह गायब बताए जा रहे हैं।
एक याचिका पर इस मामले को गंभीर मानते हुए हाई कोर्ट ने नगर निगम प्रशासन और स्मार्ट सिटी प्रबंधन से जवाब तलब किया है। कल जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और आलोक अवस्थी की डबल बेंच में सुनवाई हुई।
कोर्ट ने पूछा कि जनता की सुविधा के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च कर लगाए गए वाटर प्लांट आखिर कहां चले गए और उनकी जवाबदेही किसकी है?
यह मामला पूर्व पार्षद महेश गर्ग की ओर से दायर याचिका के माध्यम से हाई कोर्ट पहुंचा। याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट मनीष यादव और शोभित गुप्ता ने कोर्ट को बताया कि स्मार्ट सिटी मिशन के तहत पूर्व परिषद ने करीब साढ़े तीन करोड़ रुपए खर्च कर शहर के विभिन्न इलाकों और प्रमुख चौराहों पर पेयजल वाटर प्लांट स्थापित किए थे।
इनका उद्देश्य राहगीरों और आम नागरिकों को गर्मी में मुफ्त स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना था। याचिका में कहा गया कि इन वाटर यूनिट्स के रखरखाव और नियमित निगरानी की जिम्मेदारी भी तय की गई थी।
शुरुआती दौर में ये मशीनें शहर में दिखाई भी दीं, लेकिन धीरे-धीरे इनका संचालन बंद हो गया और अब कई स्थानों पर या तो मशीनें गायब हैं या पूरी तरह अनुपयोगी हालत में पड़ी हैं।
कोर्ट को यह भी बताया गया कि इंदौर में भीषण गर्मी के बीच लोग पीने के पानी के लिए परेशान हैं। सार्वजनिक स्थलों पर मुफ्त पानी की सुविधा लगभग खत्म हो चुकी है और नागरिकों को बोतलबंद पानी खरीदने पर मजबूर होना पड़ रहा है।
ऐसे समय में करोड़ों रुपए की परियोजना का गायब हो जाना गंभीर प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाता है। मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट ने मुख्य सचिव नगरीय प्रशासन विभाग, इंदौर नगर निगम कमिश्नर, कार्यपालन यंत्री नर्मदा जल वितरण विभाग और स्मार्ट सिटी के सुपरिंटेंडेंट इंजीनियर को नोटिस जारी किए हैं। इन सभी को चार सप्ताह के भीतर जवाब पेश करना होगा।
हाई कोर्ट ने यह संकेत भी दिए कि यदि परियोजना में अनियमितता या लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जा सकती है। अगली सुनवाई 15 जून को होगी।
स्मार्ट सिटी के नाम पर शुरू की गई यह योजना कभी शहर की आधुनिक सुविधाओं का प्रतीक बताई गई थी, लेकिन अब प्रशासनिक जवाबदेही और सरकारी खर्चों की पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े कर रही है।
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