10 बाय 10 के चबूतरे पर बैठकर पढ़ रहे नौनिहाल
KHULASA FIRST
संवाददाता

शरद गुप्ता 96177-77331, खुलासा फर्स्ट, सागर।
किसी देश के भविष्य की तस्वीर संसद के भाषणों में नहीं, उसकी पाठशालाओं में दिखाई देती है। और अगर उस पाठशाला में बच्चे 10 बाय 10 के चबूतरे पर बैठकर पढ़ रहे हों, तो समझें समस्या सिर्फ स्कूल भवन की नहीं व्यवस्था में गहरी दरार है।
महिदपुर विधानसभा क्षेत्र के गांव मोड़ी की यह तस्वीर किसी पिछड़े दौर की नहीं, 2026 की है। 2019 में जर्जर स्कूल भवन को तोड़ दिया गया। सात साल गुजर गए नया नहीं बना। बच्चे पहले किसी वैकल्पिक कमरे में पढ़े, वह भी सुरक्षित नहीं रहा तो आखिरकार व्यवस्था ने उन्हें एक चबूतरा दे दिया। यानी आसमान को ही छत मान लिया।
सात साल में सरकार नहीं बना पाई चार दीवार - सरकारी तंत्र का कहना है नए भवन के लिए 10 लाख रुपए स्वीकृत हो चुके हैं । जमीन सीमांकन बाकी है लेकिन सवाल है 2019 में जब पुराना भवन तोड़ा गया था, तब जमीन की स्थिति क्यों नहीं देखी गई...?
ग्रामीण जमीन देने को तैयार
इस कहानी का सबसे कड़वा पक्ष है जमीन के नाम पर भी व्यवस्था के पास अब कोई मजबूत बहाना नहीं। ग्रामीण दरबार सिंह का कहना है स्कूल के लिए जमीन दान कर रखी है। एक ग्रामीण कह रहा है बच्चों के लिए जमीन चाहिए तो और देंगे दूसरी तरफ सरकारी व्यवस्था कह रही है पहले जमीन सरकारी है या निजी, उसका सीमांकन होगा। सवाल है व्यवस्था बच्चों की जरूरत देख रही है या कागजों की सीमा?
सरकारी शिक्षा की परीक्षा
स्कूल भवन न होने का असर सिर्फ बच्चों के बैठने की जगह तक सीमित नहीं है। जब अभिभावक देखते हैं सरकारी स्कूल में उनके बच्चे खुले में बैठ रहे हैं तो वे उन्हें निजी स्कूल भेजना शुरू कर देते हैं।
यानी व्यवस्था पहले स्कूल का भवन नहीं बनाती तो बच्चे सरकारी स्कूल से निकल जाते हैं...धीरे-धीरे बच्चों की संख्या कम होती है...अंतत: आंकड़ा दिखाकर कहा जाता है यहां तो बच्चे ही कम हैं। क्या यह सरकारी शिक्षा व्यवस्था के कमजोर होने का सबसे आसान रास्ता नहीं है?
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