समझौते पर नौकरशाही रही हावी: प्रदेश के लिए संपूर्ण पुनर्वास खर्च जुटाना आसान नहीं
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
नर्मदा जल विवाद ट्रिब्यूनल और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद मप्र ने जो दावा किया था, उससे वह वंचित क्यों हुआ? इसे लेकर कई सवाल किए जा रहे हैं। कहा जा रहा है नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण और बोर्ड के साथ प्रदेश सरकार के आर्बिट्रेटर सेवानिवृत आईएएस अधिकारी यूपीएससी की पूर्व अध्यक्ष अलका सिरोही और गुजरात के आर्बिट्रेटर पूर्व मुख्य सचिव लाहरी थे उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही होगी। ट्रिब्यूनल 45 साल के लिए था, अब उसका अस्तित्व नहीं रहा।
सरदार सरोवर परियोजना का मुख्य देनदारी विवाद मप्र व गुजरात के बीच रहा है। मामला सुप्रीम कोर्ट में भी गया था, जहां से पुनर्वास का सारा खर्च गुजरात को वहन करने का आदेश दिया था। गुजरात 50 साल से ज्यादा पुराने नर्मदा जल विवाद एड ट्रिब्यूनल के नियम के आधार पर खर्च न देने अड़ा रहा। इस कारण मप्र को वास्तविक दावेदारी, जो 7 हजार छह सौ करोड़ से ज्यादा है, पर समझौता करना पड़ा। परियोजना से जुड़े राज्यों के बीच जो वन टाइम सेटलमेंट में मप्र की दावेदारी को कम आंका आ गया? मध्यस्थता करने वाले आर्बिट्रेटर मप्र के लिए उतने गंभीर नहीं रहे।
भाजपा सरकार का ही दावा नहीं माना
मप्र का 7,669 करोड़ रुपए का दावा नहीं मनाने का कोई स्पष्ट और तर्कसंगत करण पूरी तरह सामने नहीं आने से प्रशासनिक और राजनीतिक क्षेत्र में माना जा रहा है नर्मदा जल और बांध के मामले में प्रदेश के साथ फिर न्याय नहीं हुआ। परियोजना के बही-खातों का का नजदीकी से विश्लेषण करने वालों का कहना है पहले प्रदेश ने 2000 में केवल 281.46 करोड़ रुपए का दावा किया था, क्योंकि उस समय बांध की ऊंचाई 90 मीटर थी। बाद में बढ़कर 138.68 मीटर हो गई, जिससे मप्र में डूब क्षेत्र कई गुना बढ़ गया।
इस पर राज्य सरकार ने पुनर्मूल्यांकन कराया और 7,669 करोड़ रुपये का संशोधित दावा गुजरात सरकार को भेजा। किसी आंदोलन या किसी भी विपक्षी दल नहीं, मप्र की भाजपा सरकार का था और गुजरात में भी भाजपा की ही सरकार उस समय भी थी। और केंद्र में भी, जैसे अभी है।
इस परियोजना से सबसे ज्यादा फायदे में रहने वाले, मप्र से कई गुना समृद्ध और धनाढ्य गुजरात की नौकरशाही ने मप्र का दवा नहीं माना। जबकि ऐसा करने का कोई कारण नहीं था। गुजरात और मप्र के अधिकारियों के बीच इस विषय को लेकर कई बार बातचीत हुई लेकिन गुजरात के अधिकारी नहीं माने और सुप्रीम कोर्ट तथा नर्मदा जल विवाद ट्रिब्यूनल के फैसलों की व्याख्या अपने तरीके से करते रहे।
गुजरात की नौकरशाही ने उलझाया!
हो सकता है उस समय राजनीतिक स्तर पर प्रयास होते तो मप्र के दावे को मान लिया जाता। दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री और केंद्रीय नेतृत्व परियोजना से जुड़े राज्यों के साथ पूरा न्याय करना चाहते थे लेकिन हो सकता है नौकरशाही में मामला उलझ गया।
नतीजा यह रहा गुजरात ने इस संशोधित दावे को आखिर तक स्वीकार नहीं किया। मप्र ने तथ्यों के साथ दावा किया था और आखिर तक उस पर डटा रहा लेकिन आर्बिट्रेटर ने क्या फार्मूला अपनाया और क्या समझौते में इस पर विचार किया कि नहीं यह स्पष्ट नहीं है।
मप्र को जो पुनर्वास करना पड़ा और अभी भी करना पड़ रहा है, उसका अनुमानित खर्च लगभग 2,900 करोड़ रुपए है। इस पुनर्वास खर्च की मांग भी लगता है गुजरात ने स्वीकार नहीं की। इस कारण मप्र के शेष विस्थापित परिवारों के पुनर्वास के लिए आर्थिक संसाधनों का अभाव बना रह सकता है।
उनके लिए वैकल्पिक कृषि भूमि, आवासीय भूखंड, भूखंडों का पंजीयन, आवास निर्माण अनुदान, पुनर्वास स्थलों पर सड़क, पानी, बिजली, स्कूल, स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं जुटाना आसान नहीं होगा।कई विस्थापित आज भी संपूर्ण पुनर्वास से वंचित बताए जाते हैं क्योंकि कई परिवार 2023 में संशोधित बैकवाटर सर्वे के बाद अपात्र घोषित कर दिए गए। इन परिवारों के अधिकार कौन सुनिश्चित करने का मामला अभी भी अधर में बताया जाता है।
समझौते का खुलासा हो: एनबीए
समझौते में मप्र को लाभ हुआ या नुकसान यह प्रश्न उठाते हुए इधर नर्मदा बचाओ आंदोलन(एनबीए) ने कहा शुरुआत में खबर आई थी गुजरात मध्यप्रदेश को लगभग 10,000 करोड़ रुपये देगा। बाद में पता चला 7,388 करोड़ रुपये देने पर सहमति बनी।
लेकिन अंतिम समझौते में समाचारों के अनुसार मप्र को ही गुजरात को 550 करोड़ रुपये देना होगे। इसका पूरा वित्तीय आधार सार्वजनिक करने से जो आशंका है बनी हुई है, उनका समाधान हो सकता है। मप्र का दावा इसलिए भी मजबूत था कि परियोजना की लागत समय-समय पर बढ़ती गई।
पहले लगभग 4,200, फिर 6,400 और अंत में 75,000 करोड़ पहुंच गई। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार 90,000 करोड़ रुपये से अधिक हो गया। नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण तथा सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के अनुसार डूब क्षेत्र की भरपाई, वनभूमि प्रतिकर, सरकारी भूमि का मुआवजा, पुनर्वास का पूरा खर्च परियोजना से लाभान्वित राज्य द्वारा वहन किया जाना था। महाराष्ट्र ने भी मांग की थी उसे भी डूबी वनभूमि के बदले लगभग 1,313 व पुनर्वास के लिए 300 करोड़ रुपए दिए जाएं।
बिजली हिस्से के नुकसान की भरपाई का विवाद भी था। ऐसे में मप्र के हित में यह सवाल कि उसे नुकसान क्यों उठाना पड़ा स्पष्ट है।
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