महादेव मंदिर की जमीन पर महाघोटाला: शासकीय रिकॉर्ड में मंदिर के नाम दर्ज जमीन पर फर्नीचर दुकान; टीन शेड और कॉलोनियां, फिर भी प्रशासन मौन
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
केसरबाग रोड स्थित प्राचीन महादेव मंदिर की शासकीय एवं देवस्थान भूमि को लेकर हुए खुलासे ने प्रशासनिक तंत्र, राजस्व रिकॉर्ड और धार्मिक संपत्तियों की सुरक्षा पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि मंदिर के नाम दर्ज लगभग 35 एकड़ इनामी भूमि को योजनाबद्ध तरीके से निजी नामों पर चढ़ाकर कॉलोनाइजरों के हाथों बेच दिया गया। यह सब बिना उच्च अधिकारियों की सहमति के संभव नहीं।
50 लाख रु. की रिश्वत और आकाश गृह निर्माण संस्था
आरोप है कि जब आकाश कृह निर्माण सहकारी संस्था का नाम भूमि पर चढ़ाया गया, तब 50 लाख रुपए की रिश्वत ली गई। 15 जुलाई 1987 के एक शपथ-पत्र के अनुसार चंद्रहास्य पिता गुरु सच्चिदानंद अवस्थी द्वारा विभिन्न सर्वे नंबरों की भूमि 3 जून 1980 को संस्था को बेचने का अनुबंध किया गया था। सवाल यह है कि यदि भूमि मंदिर की थी, तो व्यक्तिगत विक्रय कैसे संभव हुआ? क्या शपथ-पत्र फर्जी था? चंद्रहास्य सच्चिदानंद की आयु और ऐतिहासिक समय-सीमा को लेकर भी संदेह है।
खसरों में हेरफेर, निजी नाम चढ़े
बताए जा रहे खसरा नंबर 1458 से 1468 तक देवस्थान की इनामी भूमि थे। आरोप है कि नजूल विभाग और कॉलोनाइजर बॉबी छाबड़ा की साठगांठ से इन खसरों में हेरफेर कर निजी नाम चढ़ा दिए गए। गंभीर प्रश्न यह है कि देवस्थान की भूमि आवासीय कैसे बन गई? कानूनन ऐसी भूमि का हस्तांतरण प्रतिबंधित है।
शिकायतकर्ता का आरोप- 100 से अधिक शिकायतें दबाई गईं
सुदामा नगर निवासी मुन्ना उर्फ लीलाधर चौधरी ने रणवीर उर्फ बॉबी छाबड़ा, तहसीलदार, पटवारी और अन्य राजस्व अधिकारियों पर मिलीभगत का आरोप लगाया है। उन्होंने 2019 से 2025 तक कई बार एसडीएम, कलेक्टर, सीएम हेल्पलाइन तक शिकायतें दर्ज कराईं, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। उनका दावा है कि लगभग 35 एकड़ देवस्थान व शासकीय भूमि की वर्तमान कीमत 30-40 हजार रुपए प्रति वर्गफीट है और इसमें अरबों रुपए का खेल हुआ है।
पुलिस जांच और जब्ती
भंवरकुआं थाना पुलिस ने बॉबी छाबड़ा, सतबीर सिंह और संदीप रमानी के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया था। छापेमारी में 20 सहकारी हाउसिंग संस्थाओं के रिकॉर्ड जब्त किए गए। रावजी बाजार थाने में भी फर्जी दस्तावेज और धोखाधड़ी के मामले दर्ज हुए। बावजूद इसके भूमि पर अवैध कॉलोनियां और बहुमंजिला भवन खड़े हैं।
प्रशासनिक बयानों में विरोधाभास
कलेक्टर शिवम वर्मा ने जांच का आश्वासन दिया। एडीएम रोशन राय ने कहा कि अभी तक कार्रवाई नहीं हुई। एसडीएम राऊ गोपाल वर्मा ने एसआईआर पूर्ण होने के बाद कार्रवाई की बात कही। अधिकारियों के बयानों में यह विरोधाभास ही बताता है कि मामला सामान्य नहीं है।
675 साल पुरानी देवस्थान भूमि पर संकट
बताया जा रहा है कि यह देवस्थान लगभग 650-675 वर्ष पुराना है। पेशवाकाल में भी भूमि मंदिर के नाम दर्ज थी। यदि यह ऐतिहासिक और इनामी भूमि थी, तो इसका बटांकन, नामांतरण और निजी विक्रय किस वैधानिक प्रक्रिया से हुआ?
मुख्य सड़क से लगी बेशकीमती जमीन पर कब्जा
महू नाका चौराहा पर त्रिकोण आकार की इस भूमि का एक हिस्सा पुराने आरटीओ रोड से पेट्रोल पंप तक मुख्य सड़क से सटा हुआ है, जहां वर्तमान में एक फर्नीचर दुकान संचालित हो रही है। उक्त भूमि के बीच में चौकीदार के लिए टीन शेड लगाया गया है। राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार उक्त खसरा नंबर महादेव मंदिर के नाम दर्ज है, फिर भी फर्नीचर संचालक का दावा है कि जमीन बॉबी छाबड़ा की है और दुकान लगाने की अनुमति भी उसी ने दी है।
सवाल यह है कि आखिर किस आधार पर कब्जा हुआ? यदि भूमि देवस्थान के नाम दर्ज है, तो निजी स्वामित्व का दावा कैसे स्वीकार किया जा रहा है? प्रशासन से मांग है कि दस्तावेजों की जांच कर तत्काल जमीन को शासकीय कब्जे में लेकर स्वामित्व बोर्ड लगाया जाए। लेकिन जिम्मेदार अफसर न कार्रवाई कर रहे, न उपरोक्त सवालों के जवाब दे रहे हैं।
विधानसभा में उठा प्रश्न, फिर भी खुलासा अधूरा: मध्य प्रदेश विधानसभा सचिवालय में धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग से संबंधित अतारांकित प्रश्न क्रमांक 873 प्रस्तुत किया गया है। इसमें वर्ष 2023 से अब तक शासन संधारित मंदिरों की संख्या, जीर्णोद्धार के लिए स्वीकृत राशि और आदेशों की प्रति मांगी गई है। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या इस सूची में इंदौर कलेक्टर के अधीन महादेव मंदिर की देवस्थल भूमि का उल्लेख है? यदि नहीं, तो क्यों?
1948-49 का ऐतिहासिक दस्तावेज : मंदिर के नाम दर्ज थी भूमि: नकल खसरा, मौजा कस्बा इंदौर, रियासत इंदौर, सन् 1356 फसली (1948-49) का दस्तावेज का खुलासा हुआ है, जो होलकर स्टेट दरबार के स्टाम्प पर सत्यापित है। इसमें स्पष्ट रूप से भूमि श्री महादेव मंदिर चंद्रहास्य देवस्थल के नाम दर्ज है। 1915 के पूर्व यह भूमि तालाब और घुड़दौड़ के उपयोग में थी, जिसे बाद में पूजा-पाठ हेतु दान में दिया गया। मिसल बंदोबस्त रिकॉर्ड के अनुसार मंदिर के नाम करीब 35 एकड़ भूमि दर्ज थी। आज वही देवस्थान 10×20 फीट के छोटे-से हिस्से में सिमट गया है।
सवाल, जो जवाब मांगते हैं
यदि भूमि देवस्थान की थी, तो निजी रजिस्ट्री कैसे हुई? { राजस्व रिकॉर्ड में हेरफेर किसके निर्देश पर हुआ? { क्या संबंधित अधिकारियों की भूमिका की स्वतंत्र जांच होगी? { क्या पंचनामा और नपती कराकर अवैध कब्जे हटाए जाएंगे?
मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की मांग
देवी अहिल्या की नगरी इंदौर में शिव मंदिर की भूमि पर इस कथित घोटाले ने शासन की साख पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। शिकायतकर्ता ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, जो स्वयं शिव भक्त हैं, से मामले की निष्पक्ष जांच, दोषियों पर एफआईआर, भूमि की नपती और अवैध कब्जे हटाने की मांग की है। अब देखना यह है कि क्या जिला प्रशासन इस ऐतिहासिक देवस्थान की भूमि को मुक्त कराकर शासकीय स्वामित्व बहाल करेगा या फिर इस मामले को फाइलों में दबा दिया जाएगा, जैसा कि अब तक होता आया है।
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