भोजशाला प्राचीन जैन गुरुकुल व देवी अंबिका मंदिर: हाई कोर्ट में समाज ने दिया ऐतिहासिक दस्तावेज; एएसआई रिपोर्ट और ब्रिटिश म्यूजियम में रखी प्रतिमा का हवाला
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
भोजशाला लेकर हाई कोर्ट में चल रही सुनवाई में बुधवार को जैन समाज ने महत्वपूर्ण दावा किया। हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की याचिका के साथ संबद्ध एक अन्य याचिका पर सुनवाई में जैन पक्ष ने कहा वर्तमान भोजशाला परिसर मूल रूप से प्राचीन जैन गुरुकुल और देवी अंबिका का मंदिर था, जिसे बाद के कालखंड में नष्ट कर परिवर्तित किया गया।
याचिकाकर्ता सलेकचंद जैन की ओर से अधिवक्ता दिनेश राजभर ने विस्तृत रूप से दावा किया भोजशाला को केवल हिंदू या मुस्लिम धार्मिक स्थल के रूप में नहीं देखा जा सकता, क्योंकि इसके ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य जैन धर्म से भी गहरे संबंध दर्शाते हैं।
परिसर के कई स्थापत्य अवशेष, प्रतीक और आकृतियां जैन परंपरा से जुड़ी हैं। जिस प्रतिमा को लंबे समय से हिंदू समाज मां वागदेवी या सरस्वती के रूप में मानता रहा है, वह वास्तव में जैन धर्म की देवी अंबिका हैं। जैन धर्म में देवी अंबिका को विशेष स्थान प्राप्त है और भोजशाला से जुड़े कई ऐतिहासिक संदर्भ इसकी पुष्टि करते हैं।
1034 में राजा भोज के शासनकाल के दौरान यहां देवी अंबिका की प्रतिमा स्थापित की गई थी। बाद में ब्रिटिश शासन के दौरान 1875 में प्रतिमा यहां से प्राप्त हुई और उसे इंग्लैंड ले जाया गया।
वहां संरक्षित है। जैन पक्ष ने अदालत से मांग की प्रतिमा को भारत लाकर भोजशाला परिसर में स्थापित किया जाए।
एएसआई रिपोर्ट में जैन प्रतीकों का उल्लेख
सुनवाई के दौरान जैन पक्ष ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट का भी हवाला दिया। अधिवक्ता ने कहा एएसआई द्वारा सर्वे के दौरान जिन प्रतीकों, आकृतियों और चिह्नों का उल्लेख किया गया है, वे जैन तीर्थंकरों से संबंधित हैं।
जैन धर्म में 24 तीर्थंकर हैं और प्रत्येक के साथ विशिष्ट प्रतीक हैं। जैन पक्ष का तर्क था परिसर में मिले कई चिह्न जैन परंपरा की पुष्टि करते हैं। इसके अलावा, वर्तमान संरचना में जैन वास्तुकला शैली के स्तंभ, नक्काशी और क्षेत्रपाल यानी भैरव की आकृतियां भी दिखाई देती हैं, जो इस स्थान के जैन धर्म से संबंध को मजबूत करती हैं।
2003 के एएसआई आदेश को बताया असंवैधानिक
जैन पक्ष ने वर्ष 2003 में एएसआई द्वारा जारी उस व्यवस्था को भी चुनौती दी, जिसमें हिंदू समुदाय को मंगलवार को पूजा और मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार को नमाज की अनुमति दी गई है।
याचिकाकर्ता ने कहा इस व्यवस्था में जैन समुदाय के धार्मिक अधिकारों की अनदेखी की गई। यह आदेश भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25, 26 और 29 के तहत जैन समुदाय को मिले धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
यदि भोजशाला का ऐतिहासिक संबंध जैन धर्म से स्थापित होता है, तो वहां जैन समुदाय को भी पूजा और धार्मिक गतिविधियों का अधिकार मिले।
ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला
जैन पक्ष ने कई ऐतिहासिक दस्तावेज और शोध प्रस्तुत किए। इनमें 1881-82 की सरकारी रिपोर्टों सहित विभिन्न इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के अध्ययन शामिल थे। इनके आधार पर दावा किया भोजशाला परिसर में जैन संस्कृति और वास्तुकला के स्पष्ट प्रमाण हैं।
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कई शोधों में इस स्थान को जैन शिक्षा और साधना का प्रमुख केंद्र बताया गया है। प्राचीन काल में जैन गुरुकुल था, जहां धार्मिक और शैक्षणिक गतिविधियां होती थीं।
राज्य सरकार ने याचिका को माना सुनवाई योग्य
प्रदेश सरकार की ओर से महाधिवक्ता ने कहा संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत ‘राइट टू वर्शिप’ यानी पूजा के अधिकार के आधार पर यह याचिका सुनवाई योग्य है।
एएसआई की सर्वे रिपोर्ट का उल्लेख कर कहा खुदाई और सर्वेक्षण के दौरान मिले कई शिलालेख और संरचनात्मक साक्ष्य संकेत देते हैं यहां पहले मंदिर जैसी संरचना मौजूद थी, जिसे बाद में परिवर्तित किया गया।
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