भागीरथपुरा दूषित जलकांड: फाइलें दबाने वाले अफसरों पर कार्रवाई की उलटी गिनती शुरू
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
भागीरथपुरा के बहुचर्चित दूषित जल हादसे की जांच रिपोर्ट उच्च न्यायालय में पेश होने के बाद प्रशासनिक और निगम के गलियारों में हड़कंप मच गया है। करीब 10 साल के रिकॉर्ड खंगालने के बाद तैयार 600 पन्नों की रिपोर्ट ने साफ कर दिया कि अफसर टेंडर की फाइलें न अटकाते तो 36 बेकसूरों की जान बच सकती थी।
इस पूरे प्रकरण में अब इंदौर पीठ के न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की युगल पीठ के अगले रुख पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। अदालत 8 तारीख को होने वाली सुनवाई में मध्य प्रदेश शासन को दोषी अफसरों पर दंडात्मक कदम उठाने और रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई करने का निर्देश जारी कर सकती है।
सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति सुशील कुमार गुप्ता के एक सदस्यीय आयोग ने साल 2015 से 2025 तक के 10 वर्षों के प्रशासनिक चक्रव्यूह का बारीक विश्लेषण किया है। जांच के निष्कर्षों में साफ लिखा गया है कि भागीरथपुरा क्षेत्र में जर्जर और सड़ चुकी पेयजल पाइपलाइन को बदलने के प्रशासनिक प्रस्ताव 3 महीने से ज्यादा समय तक अफसरों की टेबल पर धूल फांकते रहे।
वर्षों से दूषित सप्लाई की शिकायतें मिलने के बावजूद जिम्मेदार अफसरों ने लापरवाही बरती, जिसके कारण सड़ी पाइपलाइन में सीवर का पानी घुल गया और जहरीला पानी नलों के जरिए घरों तक पहुंच गया। आयोग ने 36 में से 24 मौतों का सीधा कारण इसी दूषित पानी के सेवन को माना है, जबकि शेष 12 मौतों के तकनीकी और मेडिकल कारणों की समीक्षा की जा रही है।
इस बहुचर्चित कांड की जांच के दौरान 2015 से 2025 तक पदस्थ रहे आधा दर्जनों से अधिक नगर निगम आयुक्तों, अपर आयुक्तों, जल-सीवरेज विभाग के प्रभारियों तथा कार्यपालन इंजीनियरों के बयान दर्ज किए गए।
आयोग के समक्ष पूर्व नगर निगम आयुक्त मनीष सिंह, आशीष सिंह, प्रतिभा पाल, हर्षिका सिंह, शिवम वर्मा और दिलीप यादव के बयान दर्ज हुए। वहीं अपर आयुक्त स्तर पर संदीप सोनी, सिद्धार्थ जैन, संतोष टैगोर, भव्या मित्तल, ए. गहलोत, अभिलाष मिश्रा तथा रोहित सिसोनिया सहित अन्य वरिष्ठ प्रशासनिक अमले से गहन पूछताछ की गई।
रिपोर्ट के महत्वपूर्ण अंशों से स्पष्ट हुआ है कि 10 वर्षों के दौरान पदस्थ रहे अफसरों के कामकाज का तरीका पूरी तरह विरोधाभासी रहा। आयोग ने दो पूर्व निगम आयुक्तों (एक महिला और एक पुरुष अधिकारी) के कार्यकाल में कार्यों में हुई देरी और प्रशासनिक शिथिलता को चिह्नित किया है, जिनमें से एक अधिकारी घटना से 6 साल पहले तथा दूसरी महिला अधिकारी घटना से 2 साल पहले पदस्थ थीं।
हैरानी की बात यह है कि इनके पहले और बाद के कार्यकाल में रहे कई अन्य आयुक्तों पर कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की गई है, जिससे उन्हें एक तरह से क्लीन चिट मिल गई है। वहीं, दिसंबर 2025 में घटना के वक्त पदस्थ अपर आयुक्त द्वारा टेंडर प्रक्रिया की फाइल को बेवजह दबाकर रखने को गंभीर प्रशासनिक अपराध माना गया है।
निचले और मध्यम तकनीकी अमले की भूमिका पर आयोग का रुख बेहद सख्त रहा है। लंबे समय से जल और सीवरेज विभाग का जिम्मा संभाल रहे कार्यपालन यंत्री संजीव श्रीवास्तव के कामकाज पर रिपोर्ट में बार-बार गंभीर प्रतिकूल टिप्पणियां की गई हैं। इसके अलावा सहायक इंजीनियर साई सरोज प्रजापति और प्रज्ञा तिवारी को भी सीधे तौर पर इस त्रासदी का दोषी और जिम्मेदार ठहराया गया है।
आयोग का मानना है कि यदि कागजी लिखापढ़ी और टेंडर अटकाने के बजाय पाइपलाइन बदलने का जमीनी काम समय पर पूरा कर लिया जाता तो इतना बड़ा हादसा घटित ही नहीं होता।
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट पूर्व में ही जल गुणवत्ता और एसओपी को लेकर कड़े दिशा-निर्देश दे चुका है, जिसकी अनुपालना में तत्कालीन मुख्य सचिव अनुराग जैन भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होकर अपना पक्ष रख चुके हैं।
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