मुख्य गर्भगृह से परे: केदारघाटी का आदि रक्षक
KHULASA FIRST
संवाददाता

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
‘ईशानेश्वर’ महादेव की वह अनदेखी चौखट, जहां से शुरू होती है शिव की आज्ञा, 2013 की प्रलयंकारी आपदा के मलबे से उभरा था सदियों पुराना सच, कपाट बंदी से पहले होती है गुप्त तांत्रिक पूजा, आम श्रद्धालुओं के लिए आज भी रहस्य समुद्र तल से 11,755 फीट की ऊंचाई पर जब केदारनाथ मंदिर के कपाट खुलते हैं, तो पूरी दुनिया की नजरें बाबा के स्वयंभू लिंग और मंदिर के ठीक पीछे पहरेदार बनकर बैठी विशाल ‘भीम शिला’ पर टिक जाती हैं।
लाखों की भीड़ मत्था टेकती है, जयकारे लगाती है और लौट आती है। लेकिन इस भव्यता और कोलाहल के बीच, मुख्य मंदिर की पीठ से सटे उत्तर-पूर्वी कोने (ईशान कोण) पर एक ऐसा रहस्य ओझल रह जाता है, जिसके बिना केदारनाथ की पूरी यात्रा अधूरी मानी जाती है। यह चौखट है ‘ईशानेश्वर महादेव’ की।
बहुत कम तीर्थयात्री यह जानते हैं कि केदारघाटी के इस पूरे तांत्रिक और आध्यात्मिक भूगोल में ईशानेश्वर को ‘प्रथम पुरुष’ या ‘क्षेत्रपाल’ का दर्जा हासिल है।
पुरानी पांडुलिपियों और केदारखंड के गुप्त अध्यायों के मुताबिक, बाबा केदार के दर्शन की अनुमति स्वयं ईशानेश्वर ही तय करते हैं।
मलबे से उभरा सदियों पुराना सच... साल 2013 की उस प्रलयंकारी जल-प्रलय को कौन भूल सकता है, जिसने केदारनाथ के आसपास की पूरी बसाहट को लील लिया था।
उस आपदा के बाद जब मलबे और चट्टानों को हटाने का काम शुरू हुआ, तो मुख्य मंदिर के पीछे सदियों से उपेक्षित और पत्थरों के नीचे दबा एक छोटा सा प्राचीन देवालय पूरी तरह सामने आ गया।
स्थानीय बुजुर्ग और तीर्थ पुरोहित बताते हैं कि यह कोई नया निर्माण नहीं, बल्कि आदि काल से स्थापित ईशानेश्वर की मूल कंदरा का अवशेष है।
आश्चर्य की बात यह है कि जिस आपदा में भारी-भरकम कंक्रीट की इमारतें ताश के पत्तों की तरह ढह गईं, वहां सदियों पुराने पत्थरों से बना यह छोटा सा देवालय बिना किसी खरोंच के सुरक्षित खड़ा रहा।
भूवैज्ञानिक इसे भले ही एक ‘संयोग’ या जलधारा के मार्ग का तकनीकी मोड़ कहें, लेकिन घाटी के पुरोहित इसे ईशानेश्वर की तांत्रिक सत्ता का साक्षात प्रमाण मानते हैं।
जहां रक्षक ही बनता है अनुमति प्रदाता... स्कंद पुराण के केदारखंड के प्राचीन शश्लोकों और स्थानीय रावल (मुख्य पुजारी) परंपरा के बही-खातों में दर्ज है कि जब पांडव स्वर्गारोहण के मार्ग पर महादेव को खोजते हुए इस घाटी में आए थे, तो उन्हें सीधे शिव के दर्शन नहीं हुए थे।
उन्होंने इसी ईशान कोण पर बैठकर महादेव के आदि रूप की स्तुति की थी, जिसे बाद में ‘ईशानेश्वर’ कहा गया। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जैसे किसी राजा के दरबार में जाने से पहले उसके द्वारपाल या सेनापति से अनुमति लेनी होती है, ठीक वैसे ही केदारनाथ के मुख्य गर्भगृह में प्रवेश करने और अपनी पूजा को सफल बनाने के लिए ईशानेश्वर महादेव के समक्ष मानसिक हाजिरी लगाना अनिवार्य है।
कपाट बंदी की वह ‘गुप्त तांत्रिक पूजा’...ईशानेश्वर महादेव का सबसे बड़ा रहस्य जुड़ा है शरद ऋतु में होने वाली कपाट बंदी से। जब भाईदूज के दिन केदारनाथ मंदिर के कपाट छह महीने के लिए बंद किए जाते हैं, तो देश-दुनिया के सामने मुख्य मंदिर की पूजा-अर्चना होती है, लेकिन उसके ठीक एक दिन पहले की रात को ईशानेश्वर के छोटे से देवालय में एक ‘गुप्त तांत्रिक अनुष्ठान’ होता है।
इस पूजा में मुख्य रावल के अलावा किसी भी बाहरी व्यक्ति, यहां तक कि आम पुजारियों को भी बैठने की अनुमति नहीं होती। बंद दरवाजों के पीछे, मशालों की रोशनी में ईशानेश्वर को जागृत किया जाता है।
माना जाता है कि जब छह महीने के लिए इंसान इस घाटी को छोड़कर नीचे ऊखीमठ चले जाते हैं, तब अगले छह महीने तक पूरी केदारघाटी की सुरक्षा, वहां के सूक्ष्म जीवों और स्वयं मुख्य मंदिर की सुरक्षा का जिम्मा ईशानेश्वर महादेव को सौंप दिया जाता है। यह एक तरह का ‘आध्यात्मिक हैंडओवर’ है।
इंजीनियरों के लिए आज भी पहेली...केदारनाथ मुख्य मंदिर कत्यूरी शैली की वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है, जिसमें इंटरलॉकिंग पत्थरों का इस्तेमाल हुआ है।
वहीं, ईशानेश्वर का देवालय बेहद साधारण, छोटे चौकोर पत्थरों से बना है, जो यह दर्शाता है कि इसका निर्माण मुख्य मंदिर के वर्तमान स्वरूप से भी प्राचीन काल का हो सकता है।
मंदिर के पीछे भीम शिला को तो हर कोई पूजता है क्योंकि उसने पानी के बहाव को रोका, लेकिन ईशानेश्वर का वह हिस्सा जो सीधे तौर पर ग्लेशियर से आने वाले मलबे की जद में था, उसका बाल भी बांका न होना आज भी इंजीनियरों को सोचने पर मजबूर करता है।
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