केदारनाथ का गुमनाम पड़ाव बसुकेदार
KHULASA FIRST
संवाददाता

जहां शिव ने ली थी शरण, कत्यूरी स्थापत्य की धरोहर उपेक्षा के आंसुओं में डूबी, मुख्य हाईवे की चकाचौंध से दूर देवभूमि का एक अछूता संसार, कत्यूरी राजवंश के पत्थरों में कैद है पौराणिक स्थापत्य, केदारघाटी का वो पड़ाव, जिसके दर्शन के बिना अधूरी मानी जाती है उत्तराखंड की तीर्थयात्रा, गढ़वाल के पहाड़ों में गूंजती इतिहास की एक अनजान दस्तक
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
चारधाम यात्रा के दौरान हर साल लाखों श्रद्धालु केदारघाटी की मुख्य सड़कों से होकर बाबा के दरबार तक दौड़ लगाते हैं। आस्था की इस आपाधापी और राष्ट्रीय राजमार्ग की चकाचौंध में अक्सर इतिहास और पौराणिक महत्व के कई ऐसे पन्ने पीछे छूट जाते हैं, जो वास्तव में इस पूरी यात्रा का मूल आधार हैं।
रुद्रप्रयाग जिले में अगस्त्यमुनि से आगे मुख्य हाईवे को छोड़ जैसे ही एक छोटा सा गुप्त मार्ग पहाड़ों की शांत वादियों की ओर मुड़ता है।
सफर सीधे अतीत के एक अद्भुत संसार में दाखिल हो जाता है। यह रास्ता जाता है बसुकेदार की ओर। मुख्य केदारनाथ मार्ग की भारी भीड़भाड़, शोर और कंक्रीट के होटलों से कोसों दूर, यह ऐतिहासिक धरोहर आज भी एक विहंगम शांत वातावरण को खुद में समेटे हुए है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के संरक्षण में होने के बावजूद, मुख्यधारा के पर्यटन और सरकारी प्रचार-प्रसार की फाइलों में इस जगह को जो स्थान मिलना चाहिए था, वह आज तक नहीं मिल पाया है।
बासा से बना बसुकेदार- जब पांडवों को छकाने के लिए महादेव ने यहां गुजारी थी रात... शिवमहापुराण और उत्तराखंड की प्राचीन लोककथाओं के पन्नों को पलटें, तो इस स्थान का पौराणिक महत्व सीधे महाभारत काल से जुड़ता है।
मान्यता है कि कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद जब पांडव अपने ही भाइयों के वध (गोत्र वध) के पाप से मुक्ति के लिए भगवान शिव को खोज रहे थे, तब महादेव उनसे रुष्ट होकर गुप्त रूप से हिमालय की ओर चल दिए थे।
इसी गुप्त यात्रा के दौरान, जब शिव पांडवों से छिपते-छिपाते गुप्तकाशी की ओर बढ़ रहे थे, तब उन्होंने एक रात इसी तपोभूमि पर विश्राम किया था। स्थानीय गढ़वाली बोली में रात बिताने या ठहरने को बासा कहा जाता है।
इसी बासा और केदार (शिव) के मेल से इस क्षेत्र का नाम अपभ्रंश होकर बसुकेदार पड़ा। इसका सीधा पौराणिक अर्थ ही यही है-वह केदारनाथ, जहां महादेव ने साक्षात वास किया था। सदियों से यह मान्यता चली आ रही है कि मुख्य धाम जाने से पहले शिव के इस विश्राम स्थल की मिट्टी को माथे से लगाना यात्रा की पूर्णता के लिए आवश्यक है।
भीड़ के दबाव को कम करने और स्थानीय आर्थिकी को बदलने का फॉर्मूला...आज के दौर में जब केदारनाथ धाम में क्षमता से अधिक भीड़ और इंफ्रास्ट्रक्चर का संकट एक बड़ी चुनौती बन चुका है, तब बसुकेदार जैसे शांत और विस्मृत पौराणिक स्थल एक बेहतरीन वैकल्पिक तीर्थ के रूप में उभर सकते हैं।
इस ऐतिहासिक धरोहर की सबसे बड़ी खूबी इसका अछूता और ध्यान-साधना के अनुकूल वातावरण है। यदि पर्यटन विभाग चारधाम यात्रा के मुख्य रूट मैप में बसुकेदार को एक विशेष उप-पड़ाव के रूप में शामिल करे और यहां तक पहुंचने वाले मार्ग को सुगम बनाए, तो न सिर्फ मुख्य मार्ग की भीड़भाड़ को संतुलित किया जा सकता है, बल्कि इस पूरे पिछड़े इलाके की आर्थिकी भी बदल सकती है।
देवभूमि के इस अनमोल और गुमनाम रत्न को आज एक मजबूत प्रशासनिक इच्छाशक्ति की दरकार है, ताकि पत्थरों पर लिखा यह गौरवशाली इतिहास गुमनामी के अंधेरे में कहीं खो न जाए।
पत्थरों पर उकेरा गया वैभव- बेजोड़ वास्तुकला पर वक्त की मार...बसुकेदार सिर्फ एक पौराणिक कथा भर नहीं है, बल्कि यह स्थापत्य कला का एक ऐसा जीवित संग्रहालय है जिसे देखकर आंखें फटी की फटी रह जाती हैं।
यहां पत्थरों को तराशकर बनाए गए प्राचीन मंदिरों का एक पूरा समूह है, जो नवीं से ग्यारहवीं शताब्दी के बीच के कत्यूरी राजवंश के स्वर्णिम काल की गवाही देता है।
विशालकाय धूसर पत्थरों को बिना किसी गारे या सीमेंट के, सिर्फ इंटरलॉकिंग (नागर शैली) के जरिये एक के ऊपर एक रखकर इन गगनचुंबी शिखरों को खड़ा किया गया है।
मंदिर की दीवारों पर की गई बारीक नक्काशी और प्राचीन लिपियों के धुंधले पड़ते अवशेष आज भी इतिहासकारों के लिए एक बड़ा शोध विषय हैं।
हालांकि, पुरातत्व विभाग ने इसे अपने संरक्षण में तो ले रखा है, लेकिन मुख्य यात्रा सर्किट से पूरी तरह कटे होने के कारण इस अद्भुत कत्यूरी वैभव को निहारने वाले कद्रदान सालभर में उंगलियों पर गिनने लायक ही यहां पहुंचते हैं।
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