बद्री विशाल का ‘तप्त कुंड’- शून्य डिग्री तापमान के बीच उबलते जल का स्रोत: विज्ञान की सीमाओं और आस्था की पराकाष्ठा के मिलन का है केंद्र
KHULASA FIRST
संवाददाता

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
हिमालय की गोद में स्थित बद्रीनाथ धाम, जहां एक ओर अलकनंदा की लहरें बर्फ जैसी ठंडी और मूक संवेदना पैदा करती हैं, वहीं मंदिर के ठीक नीचे प्रकृति का एक ऐसा विरोधाभास मौजूद है जिसे देख आधुनिक विज्ञान की सूइयां भी ठिठक जाती हैं।
यह है ‘तप्त कुंड’- एक ऐसा जल स्रोत जहां हाड़ कंपा देने वाली ठंड के बीच पानी हमेशा उबलता रहता है। यह कुंड केवल एक जल स्रोत नहीं, बल्कि विज्ञान की सीमाओं और आस्था की पराकाष्ठा के मिलन का वो केंद्र है, जहां तर्क और विश्वास एक साथ स्नान करते हैं।
पौराणिक आख्यान- अग्नि देव का वरदान और साक्षात उपस्थिति... स्कंद पुराण और ‘बद्रीकाश्रम माहात्म्य’ के अनुसार, तप्त कुंड के अस्तित्व के पीछे एक अत्यंत रोचक कथा है। कहा जाता है कि एक समय अग्नि देव ने भगवान विष्णु की घोर तपस्या की थी।
भगवान ने प्रसन्न होकर अग्नि देव को वरदान दिया और उन्हें हमेशा के लिए इस कुंड में जल के रूप में निवास करने का आदेश दिया। मान्यता है कि भगवान बद्री विशाल के दर्शन से पहले इस कुंड में स्नान करना अनिवार्य है।
पुराण कहते हैं कि इस जल में स्नान मात्र से मनुष्य के कायिक, वाचिक और मानसिक पाप धुल जाते हैं। भक्त इसे भगवान की कृपा मानते हैं कि इतनी भीषण ठंड में भी उनके आराध्य ने भक्तों की सुविधा के लिए स्वयं ‘अग्नि’ को जल में समाहित कर दिया।
विज्ञान की उलझन- सल्फर की चट्टानें या कोई और रहस्य?...भूगर्भ वैज्ञानिकों के लिए तप्त कुंड हमेशा से शोध का विषय रहा है। विज्ञान के पास इसका एक सीधा तर्क है-जियोथर्मल एनर्जी। विशेषज्ञों का मानना है कि बद्रीनाथ क्षेत्र के नीचे सल्फर (गंधक) की चट्टानें हैं।
जब भूमिगत जल इन गर्म चट्टानों के संपर्क में आता है, तो वह गर्म होकर बाहर निकलने लगता है। जल का तापमान लगभग 45°C से 55°C के बीच बना रहता है, जो बाहर के जमा देने वाले तापमान के मुकाबले ‘उबलता’ हुआ प्रतीत होता है।
हालांकि, विज्ञान यह तो समझा देता है कि पानी गर्म क्यों है, लेकिन यह आज भी एक अनसुलझा सवाल है कि अलकनंदा नदी की बर्फीली धारा के ठीक बगल में होने के बावजूद, सदियों से इस कुंड के तापमान और जल स्तर में कभी कोई कमी क्यों नहीं आई? आखिर यह अक्षय स्रोत इतनी ऊर्जा कहां से प्राप्त कर रहा है?
स्वास्थ्य का ‘दिव्य’ संगम- औषधीय गुणों की खान... अध्यात्म और विज्ञान यहां एक बिंदु पर सहमत होते हैं। इस जल की औषधीय शक्ति। तप्त कुंड का जल औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है।
सल्फर युक्त होने के कारण इस जल में स्नान करने से चर्म रोग और गठिया जैसी बीमारियों में आश्चर्यजनक लाभ मिलता है।
हजारों मील की दुर्गम यात्रा कर जब भक्त यहां पहुंचते हैं, तो इस गर्म जल में एक डुबकी लगाते ही उनकी सारी थकान और मांसपेशियों का दर्द छू-मंतर हो जाता है। यह जल यात्रियों के लिए किसी प्राकृतिक ‘स्पा’ और संजीवनी से कम नहीं है।
एक अद्भुत अहसास- जहां बर्फ और आग साथ रहते हैं... तप्त कुंड के पास खड़े होकर आप प्रकृति के दो चरम रूपों को एक साथ देख सकते हैं। दाहिनी ओर अलकनंदा की वो धारा है जिसे छूते ही हाथ सुन्न हो जाएं, और बाईं ओर तप्त कुंड का वो जल है जो निरंतर भाप छोड़ रहा है।
यह दृश्य हमें याद दिलाता है कि सृष्टि के सृजनहार ने कितनी बारीकी से संतुलन बनाया है। बद्रीनाथ का तप्त कुंड यह सिद्ध करता है कि भारत का आध्यात्मिक गौरव केवल कल्पनाओं पर नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभवों पर टिका है।
चाहे आप इसे ‘अग्नि देव का ताप’ कहें या ‘जियोथर्मल स्प्रिंग’, यह कुंड सदियों से मानवता को एक ही संदेश दे रहा है कि प्रकृति की सत्ता मनुष्य के ज्ञान से कहीं अधिक विशाल और रहस्यमयी है। बद्रीनाथ की मुख्य पूजा और अभिषेक के लिए इसी पवित्र जल का उपयोग होता है।
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