प्राधिकरण अध्यक्ष, होल्ड पर नहीं इंदौर: गोपी-सुदर्शन को मिले जिले के प्रभार; दावेदारी से हो गए बाहर
KHULASA FIRST
संवाददाता

इंदौर ही नहीं, भोपाल, जबलपुर, कटनी, देवास व रतलाम में भी हो रहा इंतजार
सत्ता-संगठन की समन्वय बैठक में इंदौर-भोपाल विकास प्राधिकरण को लेकर विशेष चर्चा-मंथन
राजधानी में हुई बैठक में इंदौर-भोपाल में सरकार के शेष बचे ढाई साल में कुछ कर दिखाने वाले अध्यक्ष पर जोर
प्राधिकरण नियुक्ति में आरएसएस का भी जबरदस्त दखल, इंदौर में मुख्यमंत्री की पसंद को तरजीह, समन्वय की कोशिशें
अभी तक उन्हीं दावेदारों का खुलासा जिनके चल रहे हैं नाम, चौंकाने वाले नाम के भी कयास
उज्जैन-ग्वालियर में सत्ता ने साधा समन्वय समीकरण, क्षत्रपों की पसंद के नामों को दी तरजीह
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
इंदौर विकास प्राधिकरण का अध्यक्ष पद फिलहाल होल्ड पर... ये जुमला बीते कई दिन से इंदौर के सियासी व प्रशासनिक हलकों में हर तरफ गूंज रहा है, जबकि हकीकत ऐसी नहीं है। प्राधिकरण अध्यक्ष के मामले में इंदौर का अध्यक्ष पद तब तकनीकी रूप से होल्ड पर आता, जब प्रदेश के तमाम प्राधिकरणों में अध्यक्ष पद के नामों की घोषणा हो जाती।
फिलहाल ऐसा कुछ नहीं। अभी सिर्फ इंदौर ही नहीं, राजधानी भोपाल में भी प्राधिकरण अध्यक्ष का मनोनयन नहीं हुआ है। इसके अलावा मालवा अंचल में देवास व रतलाम की भी घोषणा नहीं हुई है। महाकौशल अंचल के जबलपुर व कटनी जैसे शहर भी अपने अपने प्राधिकरण अध्यक्ष की राह देख रहे हैं।
लिहाजा ये तय है कि इंदौर का अध्यक्ष होल्ड पर नहीं है। न सत्ता व संगठन की ऐसी कोई मंशा है। ग्वालियर व उज्जैन में हुई नियुक्तियां इशारा कर रही हैं कि सरकार और संगठन ने क्षत्रपों के नामों को डस्टबीन की राह नहीं दिखाई है।
सरकार की चाल-ढाल व संगठन के तेवर बता रहे हैं कि अब निगम, मंडल व प्राधिकरणों की नियुक्तियों में कोई ढील नहीं दी जाएगी। कारण है मोहन सरकार का कम होता कार्यकाल। अब सिर्फ ढाई साल से भी कम का समय शेष रह गया है।
ऐसे में अब भी शहरों के डेवलपमेंट से जुड़ी एजेंसियों में नियुक्तियां नहीं होंगी तो सरकार किस परफार्मेंस के दम पर चुनाव मैदान में उतरेगी। यही कारण है कि प्रदेश में इन दिनों निगम मंडल आयोग व प्राधिकरण में नियुक्तियों की बाढ़-सी आई है।
ऐसे में इंदौर जैसे शहर का नाम नहीं होना ही बार-बार ‘होल्ड’ का शोर गुंजा रहा है, लेकिन सूत्र बताते हैं कि इंतजार की घड़ियां अब खत्म होने वाली हैं और ज्यादा ‘घंटे’ इंदौर को प्राधिकरण अध्यक्ष के नाम का इंतजार नहीं करना होगा।
इंदौर को लेकर ज्यादा शोर मचा हुआ है। कारण भी साफ है। इंदौर जमीन के मामलों में प्रदेशभर में अव्वल है। यहां जिस तरह से बिल्डर लॉबी व लैंड माफिया सक्रिय और हावी हैं, उस लिहाज से सबकी नजरें इसी बात पर हैं कि इंदौर जैसे उभरते-बढ़ते-पनपते शहर की बेशकीमती जमीन की कमान वाले प्राधिकरण पर कौन काबिज होता है। इंदौर की फिक्र का दूसरा कारण राजनीतिक है। खासकर इंदौर भाजपा की गुटीय राजनीति।
सरकार के मुखिया की इंदौर में ‘मौजूदगी’ भी प्राधिकरण की नियुक्ति को खास बना रही है। मुख्यमंत्री स्वयं इंदौर के प्रभारी मंत्री हैं। ऐसे में इंदौर के मामले में खूब ठोका-बजाया जा रहा है। इंदौर से ही जुड़े सरकार के एक अन्य कद्दावर मंत्री की राजी-नाराजी ने भी रेसकोर्स रोड की बिल्डिंग को चर्चा में लाया हुआ है। इस बीच मातृसंस्था की भी प्राधिकरण अध्यक्ष की रुचि ने पूरे मामले को रहस्यमय कर दिया है। लिहाजा हर दूसरे दिन इंदौर में दावेदार बदलते जा रहे हैं।
सूत्र बताते हैं कि इंदौर और भोपाल के लिए अब सरकार व संगठन ऐसे नाम की तरफ बढ़ रहा है, जो इन दोनों शहरों में महज ढाई साल में कुछ रिजल्ट दे सके। कम समय में ज्यादा से ज्यादा काम को अंजाम देने वाले ‘चतुर-सुजान’ व जमीन की ‘लीला’ को समझने वाले नेता पर अब नजरें हैं। जमीन के धंधे में यूं ही इंदौर विकास प्राधिकरण को ‘सबसे बड़े बिल्डर’ की उपाधि नहीं मिली हुई है। इसलिए इंदौर को लेकर घमासान-सा मचा हुआ है।
भोपाल में हुई सत्ता व संगठन की समन्वय बैठक में इस बिंदु पर गहन चिंतन-मनन किया गया है कि कमान किसी जानकार को मिले। चर्चा में ये बात भी प्रमुखता से सामने आई है कि सरकार के शेष बचे अल्प कार्यकाल के मद्देनजर प्रदेश के इन दो सिरमौर शहरों को ‘राजनीति की प्रयोगशाला’ फिलहाल न बनाया जाए। कम समय के मद्देनजर परिणाममूलक नेता का चयन ही सरकार के लिए श्रेयस्कर रहना है।
अगर ऐसा वाकई में हुआ तो इंदौर विकास प्राधिकरण की कुर्सी पर किसी अनुभवी नेता की संभावनाएं अब ज्यादा हो चली हैं। अभी तक अध्यक्ष पद की दौड़ में आगे-आगे छलांग लगा रहे ‘उस्ताद-चेले’ पूर्व विधायक गोपीकृष्ण नेमा व सुदर्शन गुप्ता के नाम अनुभव के आधार पर अव्वल थे, लेकिन सूत्र बता रहे कि इन दोनों नेताओं को जिलों का प्रभार देकर दौड़ से बाहर कर दिया गया है। एक ग्वालियर तो दूजे बैतूल के प्रभारी हो गए हैं।
बाकी हरिनारायण यादव, मुकेश राजावत, कमलेश शर्मा जैसे वे ही नाम चर्चा में हैं। इनमें से किसी का चयन हो तो ठीक है, अन्यथा कोई एकदम नया नाम भी सामने आ सकता है। शेष तो इन दिनों वाली भाजपा का भगवान ही मालिक है।
शिवराज सिंह ने तो इंदौर में देवास के नेता को प्राधिकरण को कमान दे दी थी और स्थानीय नेतृत्व चूं तक नहीं कर पाया था। लिहाजा कमलदल में क्या हो जाए, कोई दावे से नहीं कह सकता।
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