डिजिटल अभियान की परतें खुली जांच के घेरे में आया पूरा नेटवर्क: वॉइस ऑफ डीसी केस में हुआ खुलासा
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शहर के प्रतिष्ठित डेली कॉलेज को लेकर संचालित किए गए कथित डिजिटल प्लेटफॉर्म वॉइस ऑफ डीसी मामले में जांच अब निर्णायक और संवेदनशील चरण में पहुंच गई है।
क्राइम ब्रांच की विस्तृत पड़ताल के बाद मामले में शामिल चार आरोपियों पर अतिरिक्त गंभीर धाराएं जोड़ दी गई हैं, जबकि उनके मोबाइल फोन और अन्य डिजिटल उपकरण जब्त कर लिए गए हैं।
जांच एजेंसियों का मानना है कि अब तक सामने आए तथ्यों से यह मामला केवल सोशल मीडिया पर असहमति या टिप्पणी व्यक्त करने तक सीमित नहीं दिख रहा, बल्कि संस्था की छवि को व्यवस्थित रूप से प्रभावित करने के लिए चलाए गए सुनियोजित डिजिटल अभियान की आशंकाएं मजबूत हुई हैं।
एक से अधिक लोगों की भूमिका- सूत्रों के अनुसार प्रारंभिक डिजिटल विश्लेषण में कई ऐसे चैट रिकॉर्ड, ऑनलाइन गतिविधियां और इलेक्ट्रॉनिक संचार सामने आए हैं, जिन्होंने जांच एजेंसियों का ध्यान आकर्षित किया है।
जांचकर्ताओं का मानना है कि कुछ गतिविधियां योजनाबद्ध तरीके से संचालित की गईं और सामग्री के निर्माण, संपादन तथा प्रसारण में एक से अधिक लोगों की भूमिका हो सकती है।
इसी कारण अब मामले की जांच व्यक्तिगत स्तर से आगे बढ़कर संभावित नेटवर्क और समन्वय की दिशा में भी की जा रही है।
कई अतिरिक्त धाराएं जोड़ी- क्राइम ब्रांच ने जांच के दौरान प्राप्त सामग्री के आधार पर भारतीय दंड संहिता तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की कई अतिरिक्त धाराएं जोड़ी हैं।
इनमें डिजिटल प्रतिरूपण, इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से धोखाधड़ी, आपत्तिजनक सामग्री के प्रसारण तथा अन्य गंभीर अपराधों से जुड़े प्रावधान शामिल हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जांच में प्राप्त डिजिटल साक्ष्य अदालत में प्रमाणित हो जाते हैं और आरोप सिद्ध होते हैं, तो आरोपियों को कठोर दंड का सामना करना पड़ सकता है।
मोबाइल और चैट रिकॉर्ड बने जांच की धुरी
सूत्रों के मुताबिक जांच एजेंसियों ने जिन मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को जब्त किया है, उनमें मौजूद डेटा अब पूरे मामले की दिशा तय कर सकता है। फॉरेंसिक विशेषज्ञ यह पता लगाने में जुटे हैं कि सामग्री किस डिवाइस से तैयार की गई, किस समय अपलोड हुई, किसने उसे साझा किया और उसके प्रसार का दायरा कितना था।
साथ ही यह भी जांचा जा रहा है कि क्या सामग्री को व्यापक रूप से फैलाने के लिए किसी समन्वित रणनीति का उपयोग किया गया था। जांच से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि डिजिटल साक्ष्य पारंपरिक साक्ष्यों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं, क्योंकि सोशल मीडिया गतिविधियों, मैसेजिंग प्लेटफॉर्म और इलेक्ट्रॉनिक संचार का पूरा तकनीकी रिकॉर्ड उपलब्ध रहता है।
इसी कारण मामले में फॉरेंसिक रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है।
संस्था की छवि को नुकसान पहुंचाने की आशंका
डेली कॉलेज से जुड़े सूत्रों का दावा है कि ‘वॉइस ऑफ डीसी’ प्लेटफॉर्म के माध्यम से संस्था, उसकी प्राचार्या, शिक्षकों, प्रबंधन और बोर्ड सदस्यों को लेकर लगातार आपत्तिजनक, भ्रामक और मानहानिकारक सामग्री प्रसारित की गई। उनका कहना है कि सामग्री का स्वर सामान्य आलोचना या असहमति से आगे जाकर व्यक्तिगत और संस्थागत प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाला था।
अविश्वास और असंतोष का माहौल बनाना उद्देश्य
सूत्रों का यह भी दावा है कि कुछ पोस्ट और संदेशों का उद्देश्य कॉलेज समुदाय के भीतर अविश्वास और असंतोष का माहौल बनाना था। हालांकि इन सभी तथ्यों की पुष्टि अब डिजिटल फॉरेंसिक जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही हो सकेगी।
जांच का दायरा और बढ़ सकता है
क्राइम ब्रांच के सूत्रों का कहना है कि अभी तक की जांच केवल प्रारंभिक चरण मानी जा रही है। जब्त उपकरणों से प्राप्त डेटा का विश्लेषण पूरा होने के बाद कई नए नाम, नए डिजिटल लिंक और संभावित सहयोगियों की भूमिका भी सामने आ सकती है।
जांच एजेंसियां इस संभावना को भी खारिज नहीं कर रही हैं कि मामले में आगे और लोगों से पूछताछ की जाए। सूत्रों के अनुसार यदि डिजिटल साक्ष्यों से किसी बड़े समन्वित अभियान के संकेत मिलते हैं, तो जांच का दायरा वर्तमान आरोपियों से आगे भी बढ़ाया जा सकता है। यही कारण है कि मामले पर साइबर विशेषज्ञों और कानूनी जानकारों की भी नजर बनी हुई है।
155 वर्ष पुरानी संस्था से जुड़ा मामला
गौरतलब है कि डेली कॉलेज देश की सबसे पुरानी और प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थाओं में गिना जाता है। लगभग 155 वर्षों के इतिहास वाली इस संस्था की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान है। ऐसे में संस्था से जुड़ा यह मामला केवल एक साइबर अपराध जांच तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों के खिलाफ डिजिटल माध्यमों के संभावित दुरुपयोग के उदाहरण के रूप में भी देखा जा रहा है।
जांच एजेंसियों का कहना है कि आने वाले दिनों में फॉरेंसिक रिपोर्ट और तकनीकी विश्लेषण के आधार पर कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं। फिलहाल पूरे मामले की नजर अब उन डिजिटल साक्ष्यों पर टिकी है, जो यह तय करेंगे कि ‘वॉइस ऑफ डीसी’ केवल एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म था या फिर किसी बड़े और सुनियोजित डिजिटल अभियान का हिस्सा।
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