ये राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं या गुंडे..!
KHULASA FIRST
संवाददाता

जितेंद्र मेश्राम स्वतंत्र लेखक खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
स्वतंत्र लेखक यशवंत रोड स्थित कांग्रेस कार्यालय गांधी भवन पर जो घटनाक्रम घटा, उसने सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। राजनीतिक दलों की प्रतिद्वंद्विता गुंडागर्दी में तब्दील होती नजर आई।
मानो कोई गुंडा पार्टी हो, न कि राजनीतिक दल! दोनों ओर से पथराव हुआ। दोनों ओर से बोतलें फेंकी गईं। कुल मिलाकर कहीं भी ऐसा नहीं लगा यह किसी राजनीतिक दल का प्रदर्शन है। वैसे भी विरोध प्रदर्शन के लिए किसी भी पार्टी के कार्यालय पर जाना अनुचित ही कहा जाएगा।
पुलिस को ऐसे कार्यक्रम की अनुमति निरस्त कर देना चाहिए थी और कार्यकर्ताओं को दूसरी तरफ डायवर्ट करना चाहिए था,लेकिन उसने भी लापरवाही बरती। नतीजा हुआ दोनों दल आपस में भिड़ गए। जिस तरह पथराव हुआ, मारपीट, तनाव का माहौल बना उसकी आशंका पहले से थी। ऐसे में पुलिस की जिम्मेदारी बनती थी पहले से ही चाकचौबंद तैयारी करती।
प्रत्येक कार्यकर्ता की तलाशी लेती, जिससे वह किसी प्रकार का ऐसा साधन साथ में लेकर न जा पाता, जो हिंसा में सहायक होता।पुलिस की लापरवाही ही कही जाएगी, जिससे इस तरह की घटना घटी। यहां पुलिसकर्मी सहित एक पत्रकार और एक महिला कार्यकर्ता के घायल होने की बात सामने आई है जो प्रमाणित करती है कहीं न कहीं राजनीतिक दलों में कार्यकर्ता कम और गुंडे ज्यादा हो गए हैं और यह गुंडागर्दी शनिवार देखने को भी मिल गई।
कई बार राजनीतिक दलों पर आरोप लगता है वे गुंडों को प्रश्रय देते हैं और गुंडे भी ऐसे मौकों को अपने हाथ से जाने नहीं देते। समर्थकों के साथ खुद भी पहुंचते हैं और इस तरह की घटनाओं को अंजाम देते हैं। शनिवार को जो कुछ शहर में हुआ, वह राजनीति के नाम पर कलंक साबित हो गया है।
अब तक दोनों ही राजनीतिक दल अपने-अपने स्तर पर विरोध प्रदर्शन करते रहे हैं। राजनीति में किसी की बात समझ में न आने या विरोध होने पर विरोध व्यक्त करने के तरीके हैं। किसी के दफ्तर पर हमला करना उचित नहीं कहा जा सकता। राजनीतिक दल जनता से वोट लेते हैं और जनता ही तय करती है कौन सा दल क्या कार्य करेगा, लेकिन जिस तरह भाजपा और भाजयुमो कार्यकर्ताओं ने जो घटना कारित की है वह कहीं से भी उचित नहीं कही जा सकती।
कांग्रेस ने भी इसका पुरजोर विरोध करने के लिए बड़ी संख्या में अपने कार्यकर्ताओं को बुलाया, जो पूरी तरह गलत निर्णय था। उन्हें भाजपा को अपने कार्यालय का घेराव करने देना चाहिए था। इस कार्यालय खाली रहता तो कुछ नहीं बिगड़ता। घेराव करते और चले जाते। पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी थी वह इस प्रकार के घटनाक्रम को रोके लेकिन पुलिस ने जो भी प्रयास किए वे बहुत हल्के रहे।
ढंग से प्रयास करती और भाजपा तथा कांग्रेस कार्यकर्ताओं की जांच-पड़ताल कर लेती तो शायद पथराव को रोका जा सकता था, लेकिन पुलिस ने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए। बाद में जरूर वॉटर कैनन चलायी लेकिन तब तक देर हो चुकी थी और कार्यकर्ता, जो पत्थर और अन्य चीजें लेकर आए थे, अपने मकसद में सफल हो गए।
इसके लिए जिम्मेदार कौन है? यह प्रमुख नेताओं को तय करना होगा क्योंकि बेहद शर्मनाक घटना है जो शहर के शांतिप्रिय माहौल के लिए ठीक नहीं है। इसे प्रदेश की आर्थिक राजधानी कहा जाता है, जहां से राजनीति चलती है। यदि वहीं इस तरह की स्थिति बनेगी तो फिर पूरे प्रदेश में क्या हाल होगा, इसका अंदाज आसानी से लगा सकते हैं।
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