हिमशिखरों के बीच जागता अदृश्य पहरेदार: केदारघाटी के क्षेत्रपाल भैरव की अनकही महिमा
KHULASA FIRST
संवाददाता

शीतकाल में केदारघाटी का मौन प्रहरी, जानें कौन है वो जो निर्जन हिमालय में जागता है?
बिना अनुमति नहीं मिलते महादेव, भैरव गढ़ी की वह शिला जहां थमती है भक्तों की कतार
प्रलय भी जिसे न डिगा सका, द्वारपाल के दर्शन बिना अधूरी है केदारनाथ यात्रा
12 हजार फीट की ऊंचाई पर बाबा का ‘अजेय’ पहरा, बर्फ की चादर और बंद कपाट
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
जब हिमालय की उत्तुंग चोटियों पर बर्फ की सफेद चादर बिछ जाती है, केदारनाथ मंदिर के भारी कपाट विशाल तालों में जकड़ दिए जाते हैं और मुख्य पुजारी ‘रावल’ समेत सभी शीतकाल के लिए नीचे की ओर पलायन कर जाती है, तब उस निर्जन सन्नाटे और हड्डियों को गला देने वाली ठंड में केदारघाटी की रखवाली कौन करता है?
करोड़ों हिंदुओं की आस्था और पौराणिक मान्यताओं के पास इसका एक ही उत्तर है- भगवान भैरवनाथ। केदारनाथ मुख्य मंदिर से लगभग आधा किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई पर स्थित ‘भैरव गढ़ी’ वह स्थान है, जहां बाबा केदार के ‘क्षेत्रपाल’ विराजमान हैं।
बिना इनके दर्शन के केदारनाथ की यात्रा न केवल अधूरी मानी जाती है, बल्कि शास्त्रों में इसे विधि-सम्मत भी नहीं कहा गया है।
भैरवनाथ- घाटी के प्रथम और अंतिम रक्षक; सनातन परंपरा में क्षेत्रपाल उस दिव्य शक्ति को कहा जाता है जो किसी विशेष तीर्थ या क्षेत्र की बाहरी बाधाओं से रक्षा करती है। भैरवनाथ को केदारनाथ का सेनापति और रक्षक माना गया है।
शीतकाल का सुरक्षा कवच; मान्यता है कि छह महीनों के प्रवास के दौरान जब मनुष्य वहां से हट जाते हैं, तब पूरे मंदिर परिसर और केदार क्षेत्र की सुरक्षा की जिम्मेदारी स्वयं भैरवनाथ संभालते हैं।
हाजिरी का विधान; केदारनाथ धाम की परंपरा के अनुसार, कपाट खुलने के बाद सबसे पहली पूजा भैरवनाथ की होती है (अक्सर मंगलवार या शनिवार को)। इसी तरह, कपाट बंद होने के दिन भी अंतिम विशेष पूजा इन्हीं के दरबार में संपन्न की जाती है।
उल्लेख मुख्य रूप से स्कंद पुराण में; भगवान भैरवनाथ का केदारनाथ के क्षेत्रपाल के रूप में उल्लेख मुख्य रूप से स्कंद पुराण में मिलता है। स्कंद पुराण के केदार खंड में हिमालय के तीर्थों और विशेषकर केदारनाथ की महिमा का विस्तार से वर्णन है।
स्कंद पुराण में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि भगवान शिव ने केदार क्षेत्र की रक्षा का भार भैरवनाथ को सौंपा है। पुराण के अनुसार, जब भगवान शिव केदारनाथ में ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रतिष्ठित हुए तो उन्होंने अपने एक अंश भैरव को उस क्षेत्र की सीमाओं की रक्षा और भक्तों के अनुशासन की निगरानी के लिए नियुक्त किया। इसीलिए उन्हें क्षेत्रपाल (भूमि का रक्षक) कहा जाता है।
‘भैरव’ शब्द की उत्पत्ति और भूमिका
पौराणिक संदर्भों में ‘भैरव’ शब्द का अर्थ है- ‘भी’ (भय का हरण करने वाला) और ‘रव’ (ध्वनि या शक्ति)। केदार खंड के अनुसार- हिमालय के इस दुर्गम क्षेत्र में नकारात्मक शक्तियों, तामसी ऊर्जाओं और आसुरी प्रवृत्तियों को रोकने के लिए महादेव ने भैरव को ‘आज्ञापाल’ बनाया।
शिव पुराण में भी उल्लेख मिलता है कि जहां-जहां शिव के ज्योतिर्लिंग या शक्तिपीठ स्थापित हैं, वहां उनकी सुरक्षा के लिए भैरव अनिवार्य रूप से उपस्थित रहते हैं। काशी (वाराणसी) की तरह केदारनाथ में भी भैरव को ‘नगर कोतवाल’ या ‘क्षेत्रपाल’ माना जाता है।
भैरव गढ़ी- जहां मूर्तियां नहीं, जीवंत ऊर्जा का वास है
समुद्र तल से करीब 12,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर किसी भव्य नक्काशीदार ढांचे जैसा नहीं है। खुले आसमान के नीचे एक छोटा सा स्थान है, जहां एक विशाल शिलाखंड है जिसे सिंदूर से रंगा गया है।
क्रोध और करुणा का संगम- भक्तों का विश्वास है कि भैरवनाथ का रूप भले ही उग्र है, लेकिन वे केदार की पवित्रता भंग करने वालों के लिए ‘काल’ और सच्चे भक्तों के लिए दयालु ‘रक्षक’ हैं।
अदृश्य पदचाप का अनुभव- स्थानीय निवासियों और वहां रुकने वाले साधुओं का दावा है कि सर्दियों के निर्जन सन्नाटे में अक्सर घाटी में किसी के चलने की भारी आवाजें सुनाई देती हैं।
माना जाता है कि यह भैरवनाथ का पहरा है, जो नकारात्मक ऊर्जाओं और वन्य जीवों को मंदिर परिसर से दूर रखता है।
क्यों अनिवार्य है भैरव दर्शन...अध्यात्म की दृष्टि से महादेव ‘स्वामी’ हैं और भैरव उनके ‘द्वारपाल’। प्राचीन काल से यह नियम चला आ रहा है कि किसी भी राजा या स्वामी से मिलने से पहले उसके रक्षक या सेनापति की अनुमति लेना आवश्यक है।
कहा जाता है कि यदि कोई श्रद्धालु केदारनाथ के दर्शन तो कर ले, लेकिन भैरव गढ़ी में शीश न नवाए तो उसे यात्रा का पूर्ण पुण्य प्राप्त नहीं होता। आध्यात्मिक रूप से भैरव दर्शन को केदारनाथ यात्रा की ‘मुहर’ माना जाता है।
प्रलय में भी अडिग रही आस्था
वर्ष 2013 की भीषण आपदा के समय, जब पूरी केदारघाटी में तबाही का मंजर था, भैरव मंदिर और वह क्षेत्र पूरी तरह सुरक्षित रहा। यह घटना श्रद्धालुओं के उस दावे को और मजबूत करती है कि वे वास्तव में इस क्षेत्र के रक्षक हैं।
भैरव गढ़ी से केदारनाथ मंदिर का जो विहंगम दृश्य दिखाई देता है, वह किसी भी आत्मा को परमात्मा के निकट होने का अहसास कराने के लिए पर्याप्त है।
ऐसे पहुंच सकते हैं... यहां पहुंचने के लिए मुख्य मंदिर के दाहिनी ओर से लगभग 800 मीटर की सीधी चढ़ाई है। यहां जाने के लिए कोई घोड़ा-खच्चर उपलब्ध नहीं है।
भक्तों को पैदल ही पथरीली डगर नापनी होती है। सुरक्षा की दृष्टि से दिन के उजाले में ही दर्शन करना उचित है। प्रत्येक मंगलवार और शनिवार को यहां विशेष श्रृंगार और भोग का आयोजन होता है।
केदारनाथ की यात्रा केवल शारीरिक श्रम नहीं, बल्कि अनुशासन और समर्पण का मार्ग है। भैरवनाथ हमें सिखाते हैं कि महादेव (परम लक्ष्य) तक पहुंचने के लिए मर्यादा और अनुशासन का पालन अनिवार्य है।
अगली बार जब आप केदार के प्रांगण में खड़े हों, तो उस ऊंची चोटी की ओर भी जरूर देखिएगा, जहां केदार का रक्षक आज भी मौन पहरा दे रहा है।
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