राघव का घातक वार और सात सांसदों की बगावत से डगमगाया ‘आप’ का ‘किला’
KHULASA FIRST
संवाददाता

अजय कुमार वरिष्ठ पत्रकार खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
पूरे घटनाक्रम की पटकथा उस दिन लिख दी गई थी, जब राघव चड्ढा को अचानक राज्यसभा में डिप्टी लीडर के पद से हाथ धोना पड़ा था। पार्टी ने अंदरूनी तौर पर उन पर निष्क्रियता और गतिविधियों से दूरी बनाने के आरोप मढ़े थे, लेकिन राघव के तेवर बता रहे थे कि वे किसी बड़े ‘ऑपरेशन’ की तैयारी में हैं। गौर करने वाली बात यह है कि इस बगावत में संदीप पाठक का नाम शामिल होना केजरीवाल के लिए सबसे बड़ा व्यक्तिगत झटका है।
भारतीय राजनीति के फलक पर 2 अप्रैल 2026 को जो चिंगारी सुलगनी शुरू हुई थी, उसने 22 दिनों के भीतर एक ऐसी सियासी आग का रूप ले लिया है जिसमें अरविंद केजरीवाल की ‘आम आदमी पार्टी’ का राज्यसभा वाला किला लगभग ढह चुका है। यह महज कुछ सांसदों का दल-बदल नहीं है, बल्कि उस भरोसे और विचारधारा की सामूहिक हत्या है, जिसके दम पर एक दशक पहले अन्ना आंदोलन की कोख से यह पार्टी जन्मी थी।
राज्यसभा में पार्टी के डिप्टी लीडर रहे राघव चड्ढा की अगुवाई में सात सांसदों का एक साथ पाला बदलना दिल्ली से लेकर पंजाब तक की सियासत में वो भूकंप है, जिसकी रिक्टर स्केल पर तीव्रता आने वाले कई सालों तक महसूस की जाएगी। मैं घायल हूं, इसलिए घातक हूं और मेरी खामोशी को मेरी हार मत समझना जैसे फिल्मी लगने वाले राघव के संवादों ने शुक्रवार को तब हकीकत का जामा पहन लिया, जब उन्होंने संदीप पाठक और अशोक मित्तल के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर भाजपा का दामन थामने का एलान किया। यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में किसी भी क्षेत्रीय दल के लिए संभवतः सबसे बड़ा और संगठित विद्रोह है।
इस पूरे घटनाक्रम की पटकथा उस दिन लिख दी गई थी जब राघव चड्ढा को अचानक राज्यसभा में डिप्टी लीडर के पद से हाथ धोना पड़ा था। पार्टी ने अंदरूनी तौर पर उन पर निष्क्रियता और गतिविधियों से दूरी बनाने के आरोप मढ़े थे, लेकिन राघव के तेवर बता रहे थे कि वे किसी बड़े ‘ऑपरेशन’ की तैयारी में हैं। गौर करने वाली बात यह है कि इस बगावत में संदीप पाठक का नाम शामिल होना केजरीवाल के लिए सबसे बड़ा व्यक्तिगत झटका है।
पाठक वही शख्स हैं जिन्हें ‘आप’ का चाणक्य कहा जाता था, जिन्होंने पंजाब की सत्ता की चाबी केजरीवाल के हाथ में सौंपी और पार्टी को राष्ट्रीय दल का दर्जा दिलाने के लिए पर्दे के पीछे से संगठन की मशीनरी तैयार की। जब संगठन का वास्तुकार ही इमारत ढहाने पर आमादा हो जाए, तो नेतृत्व की विफलता पर सवाल उठना लाजिमी है।
इसके साथ ही स्वाति मालीवाल की भूमिका ने इस आग में घी का काम किया है। बिभव कुमार मामले के बाद जिस तरह स्वाति को अपनी ही पार्टी में अपमान और अलगाव का सामना करना पड़ा, उन्होंने उसे अपनी निजी अदावत बना लिया। आज जब वे राघव के साथ सुर में सुर मिला रही हैं, तो यह साफ है कि ‘आप’ के भीतर महिलाओं के सम्मान और आंतरिक लोकतंत्र को लेकर जो दावे किए जाते थे, उनकी कलई खुल चुकी है।
तकनीकी तौर पर देखें तो यह बगावत बहुत ही सधे हुए कानूनी दांव-पेच के साथ की गई है। राज्यसभा में ‘आप’ के कुल 10 सांसद थे, जिनमें से 7 का एक साथ अलग होना दल-बदल विरोधी कानून (एन्टी डिफेक्शन लॉ) के तहत अयोग्यता की तलवार को कुंद कर देता है। दो-तिहाई की यह संख्या राघव चड्ढा की उस रणनीतिक कुशलता को दर्शाती है, जिसका लोहा कभी खुद केजरीवाल मानते थे।
राघव का यह कहना कि वे गलत पार्टी में सही व्यक्ति थे, न केवल केजरीवाल के नेतृत्व पर सीधा प्रहार है, बल्कि उन लाखों कार्यकर्ताओं के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है जो भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का सपना लेकर इस पार्टी से जुड़े थे। जिस पार्टी ने 15 साल तक संघर्ष किया, उसका इस तरह ताश के पत्तों की तरह बिखरना यह बताता है कि सत्ता के गलियारों में पहुंचते ही ‘आम’ और ‘खास’ की लकीर धुंधली पड़ गई। भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे नेतृत्व और जेल से सरकार चलाने की जिद ने शायद उन नेताओं को भी सोचने पर मजबूर कर दिया जो अब तक वफादारी का दम भर रहे थे।
पंजाब की सियासत के लिहाज से यह घटनाक्रम किसी सुनामी से कम नहीं है। बागी होने वाले सात में से छह सांसद पंजाब का प्रतिनिधित्व करते हैं। मुख्यमंत्री भगवंत मान के लिए यह स्थिति बेहद असहज है, क्योंकि राघव चड्ढा को कभी पंजाब सरकार का ‘रिमोट कंट्रोल’ कहा जाता था।
मान और चड्ढा के बीच का शीतयुद्ध जगजाहिर था, लेकिन अब यह आमने-सामने की जंग में बदल चुका है। भाजपा ने इन चेहरों को अपने पाले में कर न केवल राज्यसभा में अपनी ताकत 148 तक पहुंचा दी है, बल्कि 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए भी एक मजबूत बिसात बिछा दी है।
भाजपा, जो पंजाब में लंबे समय से एक मजबूत ‘सिख चेहरे’ और संगठन की तलाश में थी, उसे अब हरभजन सिंह, अशोक मित्तल और विक्रमजीत सिंह साहनी जैसे रसूखदार लोगों का साथ मिल गया है। यह ‘मिशन पंजाब’ की वो शुरुआत है जिसने अरविंद केजरीवाल के राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं को फिलहाल दिल्ली और पंजाब की सीमाओं में ही कैद कर दिया है।
संजय सिंह और अन्य ‘आप’ नेता इसे ‘ऑपरेशन लोटस’ और केंद्रीय एजेंसियों का डर बताकर जनता की सहानुभूति बटोरने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या केवल डर के दम पर इतने बड़े स्तर पर बगावत संभव है? अन्ना हजारे की उस टिप्पणी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता जिसमें उन्होंने कहा कि जब स्वार्थ समाज और देश से ऊपर हो जाता है, तो संगठन टूट जाते हैं।
यह केजरीवाल की उस कार्यशैली का भी परिणाम है जिसमें उन्होंने धीरे-धीरे उन सभी पुराने चेहरों को किनारे कर दिया, जिन्होंने उनके साथ धूल फांकी थी। योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, कुमार विश्वास और अब राघव-संदीप की यह फेहरिस्त बताती है कि पार्टी में असहमति के लिए कोई जगह नहीं बची है।
स्वाति मालीवाल का यह आरोप कि उन्हें मुख्यमंत्री के घर पर पीटा गया और फिर उन्हें ही बदनाम करने की कोशिश की गई, पार्टी की नैतिक साख पर वो धब्बा है जो शायद ही कभी धुल पाए। राज्यसभा सचिवालय में अब कानूनी लड़ाई शुरू होगी, सदस्यता रद्द करने की याचिकाएं डाली जाएंगी और मामला कोर्ट तक जाएगा।
लेकिन राजनीति में जो धारणा (परसेप्शन) एक बार बन जाती है, उसे बदलना मुश्किल होता है। जनता के बीच अब यह संदेश जा चुका है कि जो पार्टी दूसरों को ईमानदारी का सर्टिफिकेट बांटती थी, उसके अपने घर में ही भारी अविश्वास का माहौल है।
गुजरात निकाय चुनाव से ठीक पहले पार्टी के सोशल मीडिया पेजों का सस्पेंड होना और सांसदों का सामूहिक पलायन, ‘आप’ के लिए किसी ‘परफेक्ट स्टॉर्म’ जैसा है। केजरीवाल जो खुद को नरेंद्र मोदी के विकल्प के तौर पर पेश कर रहे थे, आज अपने सबसे भरोसेमंद सिपहसालारों को ही भाजपा के पाले में जाते हुए देखने को मजबूर हैं।
यह पतन की शुरुआत है या फिर कोई नया सबक, यह तो वक्त तय करेगा, लेकिन फिलहाल इतना तय है कि ‘झाड़ू’ की तीलियां बिखर चुकी हैं और उन्हें समेटना अब केजरीवाल के बस की बात नहीं लग रही। भारतीय राजनीति का यह शुक्रवार ‘आम आदमी पार्टी’ के इतिहास में हमेशा एक ऐसे मोड़ के रूप में याद किया जाएगा, जहां से वापसी का रास्ता बहुत धुंधला नजर आता है। (ये लेखक के निजी विचार हैं।)
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