12 हजार फीट की ऊंचाई पर अनूठा मंदिर: साल में सिर्फ एक दिन गूंजती है बांसुरी की तान
KHULASA FIRST
संवाददाता

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
देवभूमि उत्तराखंड की गोद में वैसे तो कण-कण में देवी-देवताओं का वास है, लेकिन चमोली जिले की खूबसूरत वादियों में एक ऐसा रहस्यमयी मंदिर भी है, जिसके कपाट साल के 365 दिनों में से सिर्फ एक दिन के लिए खुलते हैं।
चार धाम यात्रा पर निकलने वाले श्रद्धालुओं और एडवेंचर के शौकीनों के लिए आस्था और कौतुहल का यह अद्भुत केंद्र है- बंसी नारायण मंदिर। समुद्र तल से करीब 12,000 फीट की ऊंचाई पर उर्गम घाटी के मखमली बुग्यालों (घास के मैदानों) के बीच स्थित यह मंदिर अपनी अनूठी परंपरा, पौराणिक कथा और वास्तुकला के लिए दुनिया भर में बेजोड़ है।
रक्षाबंधन पर खुलते हैं कपाट- कलाई पर सजती है राखी... इस मंदिर की सबसे बड़ी और अनोखी खासियत यह है कि इसके कपाट साल में सिर्फ एक ही दिन, यानी रक्षाबंधन के पावन पर्व पर सुबह खुलते हैं और सूर्यास्त होते ही अगले एक साल के लिए फिर से बंद कर दिए जाते हैं।
रक्षाबंधन के दिन यहां का नजारा बेहद भावुक और आध्यात्मिक होता है। उर्गम घाटी के स्थानीय गांवों (विशेषकर कलगोट गांव) के लोग और दूर-दूर से आए श्रद्धालु कपाट खुलने पर भगवान विष्णु का शृंगार करते हैं।
इस दिन घाटी की महिलाएं भगवान बंसी नारायण को पहली राखी बांधती हैं और अपनी रक्षा का वचन मांगती हैं। पूरे दिन यहां भजन-कीर्तन का दौर चलता है और शाम को कपाट बंद होने के बाद यह ऊंचे पहाड़ों का यह शांत इलाका फिर से एक साल के लिए मौन की चादर ओढ़ लेता है।
पौराणिक कथा-जब पाताल लोक से लौटे भगवान विष्णु...बंसी नारायण मंदिर के अस्तित्व के पीछे एक बेहद दिलचस्प और मर्मस्पर्शी पौराणिक कथा छिपी है।
मान्यताओं के अनुसार, जब दानवीर राजा बलि ने अपनी भक्ति से भगवान विष्णु को पाताल लोक में अपना द्वारपाल बनने पर विवश कर दिया था, तब माता लक्ष्मी अपने पति को मुक्त कराने के लिए व्याकुल हो उठीं।
माता लक्ष्मी ने श्रावण मास की पूर्णिमा (रक्षाबंधन) के दिन पाताल लोक जाकर राजा बलि की कलाई पर रक्षासूत्र बांधा और उपहार स्वरूप भगवान विष्णु को मांग लिया।
कहा जाता है कि जब भगवान विष्णु पाताल लोक के बंधन से मुक्त होकर वापस धरती पर लौटे, तो उन्होंने इसी स्थान पर आकर विश्राम किया था। चूंकि वे लंबे समय बाद पाताल से आए थे, तो उन्होंने खुशी में यहां बांसुरी बजाई थी।
यही कारण है कि मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु की एक अत्यंत दुर्लभ चतुर्भुज मूर्ति विराजमान है, जिसमें वे बांसुरी बजाते हुए दिखाई देते हैं।
कठिन डगर पर प्रकृति का अद्भुत उपहार... छठी से आठवीं शताब्दी के बीच कत्यूरी शैली में पत्थरों को तराश कर बनाए गए इस मंदिर तक पहुंचना किसी चुनौती से कम नहीं है।
ऋषिकेश-बद्रीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित हेलंग से उर्गम घाटी होते हुए कलगोट गांव तक गाड़ी से पहुंचा जा सकता है, लेकिन इसके आगे का सफर करीब 10 से 12 किलोमीटर की कठिन खड़ी चढ़ाई और घने जंगलों को पार करके पैदल ही तय करना पड़ता है।
रास्ते की थकान तब पूरी तरह मिट जाती है जब ट्रैकर और श्रद्धालु 12 हजार फीट की ऊंचाई पर पहुंचते हैं। चारों ओर फैली हिमालय की बर्फीली चोटियां, मखमली घास के मैदान और बीच में खड़ा यह ऐतिहासिक पाषाण मंदिर किसी अलौकिक दुनिया का अहसास कराता है।
इस यात्रा सीजन में यदि आप भीड़भाड़ वाले पारंपरिक रास्तों से अलग देवभूमि के असली आध्यात्मिक रहस्यों को करीब से देखना चाहते हैं, तो बंसी नारायण की यह खामोश तपस्थली आपका इंतजार कर रही है।
देवभूमि का अनूठा रहस्य जहां भगवान विष्णु को सबसे पहले बांधी जाती है राखी
उर्गम घाटी का वह पाषाण मंदिर, जिसके कपाट खोलने के लिए साल भर इंतजार करते हैं श्रद्धालु
बलि के पाताल लोक से लौटने की गवाह है यह घाटी, जहां चतुर्भुज रूप में बांसुरी बजाते हैं नारायण
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