हिमालय की गोद में महायात्रा: ऋषिकेश से बद्रीनाथ तक का सफर होता है अलौकिक
KHULASA FIRST
संवाददाता

सड़क मार्ग से स्वर्ग की डगर, गंगा की लहरों से पहाड़ों की पुकार तक हर मोड़ पर बसते हैं देवता
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
कल्पना कीजिए, खिड़की से आती बर्फीली हवाओं के झोंके, नीचे हजारों फीट गहरी खाई में दहाड़ती गंगा की धवल धारा और सामने बादलों के बीच लुका-छिपी करती हिमालय की गगनचुंबी चोटियां। ऋषिकेश की तपिश को पीछे छोड़ जब आप बद्रीनाथ की घुमावदार सड़कों पर कदम रखते हैं, तो वह सफर केवल एक यात्रा नहीं रह जाता, बल्कि प्रकृति के विराट रूप से सीधा साक्षात्कार बन जाता है। ऋषिकेश से बद्रीनाथ की यह यात्रा केवल एक भौगोलिक दूरी तय करना नहीं, बल्कि स्वयं को प्रकृति के विराट स्वरूप के प्रति समर्पित कर देने का नाम है।
बहती दूधिया गंगा मन में एक अजीब-सी शांति और उत्साह भर देती है
जैसे ही आप ऋषिकेश की सीमाओं को पार कर बद्रीनाथ राजमार्ग पर कदम रखते हैं, शहरी कोलाहल पूरी तरह पीछे छूट जाता है और नदी की अविरल धारा आपके साथ चलने लगती है। शुरुआती सफर में कौड़ियाला और व्यासी के आसपास के रास्ते आपको पहाड़ों की ऊंचाई और नदी की गहराई के बीच के रोमांच से परिचित कराते हैं।
यहां सड़क के एक ओर खड़े विशाल पहाड़ और दूसरी ओर बहती दूधिया गंगा मुसाफिरों के मन में एक अजीब सी शांति और उत्साह भर देते हैं। देवप्रयाग के संगम से अलकनंदा का दामन थामे जब आपकी गाड़ी ऊंचे पहाड़ों को चीरती हुई आगे बढ़ती है, तो हर मोड़ एक नई कहानी सुनाता है।
भीतर जमी धूल को झाड़ने की एक आध्यात्मिक प्रक्रिया
बद्रीनाथ धाम की दहलीज पर खड़े होकर जब आप पीछे मुड़कर उन घुमावदार रास्तों के बारे में सोचते हैं, तो अहसास होता है कि यह केवल ऋषिकेश से शुरू हुआ 300 किलोमीटर का सफर नहीं था, बल्कि भीतर जमी धूल को झाड़ने की एक आध्यात्मिक प्रक्रिया थी।
नदी की अनंत गर्जना और नीलकंठ की धवल चोटियों के सानिध्य में पहुंचते ही भौतिक जगत के सारे तर्क और अहंकार मौन हो जाते हैं। हिमालय की ये उत्तुंग चोटियां और नदियों के ये पवित्र संगम हमें सिखाते हैं कि जीवन भी इन्हीं रास्तों की तरह दुर्गम है, लेकिन यदि धैर्य और श्रद्धा साथ हो, तो अंततः बद्री विशाल जैसी परम शांति निश्चित है।
इस यात्रा को एकाधिक बार सफलतापूर्वक पूर्ण कर चुके श्रद्धालुओं का कहना है कि यह महायात्रा किसी डायरी के पन्नों में दर्ज होने वाली केवल एक तारीख नहीं, बल्कि ताउम्र रूह में बसी रहने वाली एक ऐसी अनुभूति है, जो शहर की भीड़भाड़ में भी आपको हिमालय के एकांत और ईश्वर की निकटता का अहसास कराती रहेगी।
संगमों की साक्षी, जहां नदियां बनती हैं पावन धारा... इस यात्रा का सबसे हृदयस्पर्शी हिस्सा ‹पंच प्रयागों› का दर्शन है। देवप्रयाग पहुंचते ही श्रद्धालु ठहरने को मजबूर हो जाते हैं, क्योंकि यहां भागीरथी और अलकनंदा का मिलन स्थल किसी दैवीय चित्रकारी जैसा प्रतीत होता है।
यहां से आगे का रास्ता अलकनंदा के किनारे-किनारे चलता है, जो पूरे सफर में आपकी हमसफर बनी रहती है। यह रास्ता उन मुसाफिरों के लिए है जिनकी रूह पहाड़ों के मौन को सुनने की प्यास रखती है। जहां देवदार के घने जंगलों के बीच से गुजरते हुए आपको यकीन होने लगता है कि स्वर्ग की डगर यहीं से होकर जाती है।
श्रीनगर से रुद्रप्रयाग, पहाड़ों की गंभीरता और जल का कलरव... श्रीनगर की चौड़ी घाटी से होते हुए जब आप रुद्रप्रयाग पहुंचते हैं, तो वहां मंदाकिनी और अलकनंदा का संगम पहाड़ों की गंभीरता को और बढ़ा देता है।
इन रास्तों पर चलते हुए हर कुछ किलोमीटर पर दिखने वाले छोटे झरने और पहाड़ों से रिसता पानी यात्रा को और भी जीवंत बना देता है। जैसे-जैसे गाड़ी रुद्रप्रयाग से कर्णप्रयाग और फिर नंदप्रयाग की ओर बढ़ती है, वनस्पतियों का रंग बदलने लगता है।
बढ़ती ऊंचाई और बदलता परिदृश्य... जोशीमठ पहुंचते-पहुंचते हवा की तासीर पूरी तरह बदल जाती है और ठंडक आपके शरीर को छूने लगती है। जोशीमठ को बद्रीनाथ का प्रवेश द्वार कहा जाता है, जहां से पहाड़ों की चोटियां और भी तीखी और बर्फीली नजर आने लगती हैं।
यहां के रास्ते थोड़े संकरे और चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन आस-पास के नजारे इतने मंत्रमुग्ध करने वाले होते हैं कि डर की जगह श्रद्धा ले लेती है। वनस्पतियों का कम होना और बर्फीली चोटियों का करीब आना इस बात का संकेत है कि आप ईश्वर के करीब पहुंच रहे हैं।
अंतिम पड़ाव, बद्री विशाल की शरण में आत्मिक सुकून... जोशीमठ से बद्रीनाथ तक का अंतिम खंड इस सफर का सबसे रोमांचक और आध्यात्मिक हिस्सा है। हनुमान चट्टी को पार करते ही पहाड़ों का स्वरूप पूरी तरह बदल जाता है। यहां हरियाली कम और विशाल चट्टानी पहाड़ अधिक दिखने लगते हैं।
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