पानी-पानी सरकार: अब मुख्यमंत्री को पीने के पानी पर करना पड़ रही बैठक; समय रहते जाग जाते तो नहीं बनते जलसंकट के ये हालात
KHULASA FIRST
संवाददाता

समस्या जब विकराल हुई, तब जागा सरकारी अमला, शुरुआती समस्या को लिया हलके में
क्लीन सिटी, वाटर प्लस सिटी की ‘बैठे ठाले’ हो गई जगहंसाई, पीने के पानी की कमी बड़ा मुद्दा बनी
जनता के विरोध को सिर्फ निगम का विरोध मानकर विधायकों ने मेयर को अकेला छोड़ दिया
सत्तारूढ़ दल के जनप्रतिनिधियों की सुस्ती गुटबाजी से पानी की आंच मोहन सरकार तक पहुंची
अब पूरे प्रदेश के मुख्यमंत्री को संभालना पड़ रही एक शहर के जलसंकट से मुक्ति की कमान
बरस-ओ-बरस बाद शहर में बने जलसंकट के हालात, कांग्रेस ही नहीं, भाजपा विधायकों ने भी जताया विरोध
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
आखिरकार इंदौर भाजपा नेतृत्व के बीच पसरी गुटबाजी, अबोलेपन व अनमनेपन ने पानी के मुद्दे पर पूरी मोहन सरकार को पानी-पानी कर दिया। नतीजे में अब एक राज्य के मुख्यमंत्री को एक शहर के जलसंकट के समाधान की कमान संभालने मैदान में उतरना पड़ा।
मुख्यमंत्री को अफसरों व जनप्रतिनिधियों के साथ बैठक करना पड़ रही है। जल चोरी, लीकेज, मोटर से पानी खींचने पर कड़ी कार्रवाई करने के दिशा-निर्देश देने पड़ रहे हैं।
सीएम को 24 घंटे सातों दिन खुला रहने वाला जल नियंत्रण कक्ष बनाने व नगर निगम, निजी टैंकरों की मिनट-टू-मिनट मॉनिटरिंग करने और लीकेज सुधारने के निर्देश देना पड़ रहे हैं।
ये काम क्या मुख्यमंत्री के स्तर का है? माना कि वे शहर के प्रभारी मंत्री की भूमिका में भी हैं। बावजूद इसके एक शहर का जल प्रबंधन प्रदेश सरकार का विषय होता है या स्थानीय तंत्र का?
एक शहर के जल वितरण से जुड़े सरकारी सिस्टम और वहां के जनता के नुमाइंदों के लिए इससे दुःखद और क्या हो सकता है कि पानी की सप्लाई जांचने भोपाल से बड़े अफसर आए।
अगर समय रहते जिम्मेदार जाग जाते, जनता द्वारा चुने हुए नेता ‘चेत’ जाते तो यूं ‘सरकार’ को पानी के मसले पर ‘पानी-पानी’ होना पड़ता? वाटर प्लस सिटी, नीट एंड क्लीन सिटी, स्मार्ट सिटी की यूं जगहंसाई होती?
जब शहर के किसी हिस्से में पहला मटका फूटा था, तब ही जाग जाना था। ये मटका वाकई संकट से जुड़ा था या मटके के जरिये नगर निगम को झटका देने की कोई कवायद? ये बाहर की लड़ाई थी या ‘घर’ की फूट?
आखिर इस शहर ने तो ‘पूरे घर’ की कमान एक ही दल के नेताओं को दी थी तो ये ‘मटका फुटाई’ का ठीकरा केवल एक मेयर तक ही क्यों सिमटकर रह गया? नगर निगम व मेयर की खिल्ली उड़ने में खुश होने वाला राजनीतिक नेतृत्व क्या केवल प्रतिपक्ष कांग्रेस का ही था?
क्या इसमें भाजपाई शामिल नहीं हैं? आखिर क्या मिला इस तरह की आपसी राजनीतिक रंजिश से, जब आपका दल ही दागदार हो जाए? निशाने पर निगम हो सकता है, लेकिन गुस्सा तो शहर का भाजपा के नेतृत्व पर ही था न? अब प्रबुद्धवर्ग की बैठकें ही रही हैं। जलसंकट से निजात पाने के सुझाव मांगे जा रहे हैं। क्या होना है इन सबसे, जब ‘चिड़िया चुग गई खेत’!
क्या शहर की ‘नगर सरकार’ कांग्रेस की है? क्या निगम की एमआईसी मिली-जुली सरकार का हिस्सा है? इस कमाई वाली जगह पर तो शहर के सभी विधायकों ने अपनी ‘किचन कैबिनेट’ को जगह देने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था।
आज भी ये ‘किचन कैबिनेट’ अपने-अपने विधायक के दरबार में प्रतिदिन ‘मुजरा’ पेश करती है। इलाके का हर ‘काला-पीला’ आपके संज्ञान में लाने की ड्यूटी तो ये मुस्तैदी से करते हैं।
तो फिर पीने के पानी का संकट सिर्फ मेयर का कैसे हो गया? क्या ये सामूहिक प्रयासों का हिस्सा नहीं था? इतने बड़े संकट पर भी भाजपा एक नहीं, जो ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का नारा बुलंद करती है।
जल महकमे से जुड़े एमआईसी सदस्य के गमगीन चेहरे को छोड़ शेष किस सदस्य का चेहरा जलसंकट पर मुरझाया नजर आया? बस, वो ही एक एमआईसी सदस्य है, जो मेयर के साथ दिन-रात एक कर रहा है।
शेष सब कहां, किस ‘दड़बे’ में दुबके थे और हैं? सांसद भी तो शहर में ही थे। कोई संसद का सत्र भी नहीं था। विधायक भी सभी इंदौर में ही थे। कोई विधानसभा का सत्र भी नहीं था। मंत्री भी अब शहर में ही ‘जमा’हैं।
फिर ये मटका फुटाई की ‘कुटाई’ सिर्फ एक नेता की कैसे हो गई? आपको मजा आ रहा था कि आपका विरोधी नेता जनता के निशाने पर है, तो फिर आप क्या जनता के नुमाइंदे नहीं? आपको भी तो इसी जनता ने झोलीभर वोटों से जिताया है, जो मटके लेकर सड़कों पर आ गई। आप गए इनके बीच?
ये आपकी, आपस की लड़ाई और घर के मतभेद ने प्रतिपक्ष को खुला मैदान दे दिया। वह सड़क पर उतरी तो आपने दो कदम आगे जाकर उसे हौसला ही नहीं भीड़ के रूप में ‘असलाह’ भी मुहैया करा दिया।
खुद ही अपनी ही निगम परिषद के खिलाफ खम ठोंकने लगे। ये जाने बिन कि आप भी तो दस-बीस-पच्चीस बरस से विधायक हैं, तो अभी तक क्या ‘घुइयां’ छील रहे थे, जो पीने के पानी जैसी प्राथमिक समस्या के लिए दूसरों को दोष दे रहे हैं।
विधायक अपनी परिषद को ही कटघरे में खड़ा कर दे, ऐसा इंदौर में तो आज तक नहीं हुआ। कम से कम कमलदल की तरफ से तो नहीं। अब आपकी आपस की इस लड़ाई का असर देख रहे हैं न, क्या हुआ?
इंदौर में पीने का पानी ही नहीं... ये शोर न सिर्फ प्रदेश, बल्कि राज्य की सरहद लांघ देशभर में गूंज गया। देशभर में इंदौर की थू-थू हो गई। एक तरफ यह शहर साफ-सफाई के मुद्दे पर देश के अन्य शहरों से एक बार फिर मुकाबला करने के लिए दिन-रात एक कर रहा है, वहां की जनता खाली मटके लेकर सड़कों पर मारी-मारी फिर रही है।
मुख्यमंत्री को स्वयं समस्या के समाधान के लिए जूझना पड़ रहा है। पहले वे राजधानी से एसीएस स्तर के बड़े अफसर भेजते हैं और अब स्वयं बैठके ले रहे हैं।
लीकेज जैसे सामान्य-से विषय पर सीएम को बोलना पड़ रहा है, पानी सप्लाय पर ज्ञान देना पड़ रहा है। इससे शर्मनाक क्या हो सकता है ‘ट्रिपल इंजिन सरकार’ के दौर में?
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