95% दुर्घटनाएं नियमों के पालन से टाल सकते हैं: 480 मानवों के रक्त से प्रतिदिन स्नान करती हैं हमारी सड़कें
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
भारत की सड़कों पर बहता खून अब केवल एक सांख्यिकीय आंकड़ा नहीं रह गया है, बल्कि यह हमारे राष्ट्रीय चरित्र की एक गहरी पहचान बन चुका है। हम अक्सर ‘संक्रमण' शब्द का प्रयोग बीमारियों के लिए करते हैं, लेकिन सड़क सुरक्षा नियमों की यह वैश्विक अनदेखी एक ऐसी मानसिक व्याधि है, जिसने अपने कालपाश में हमें बुरी तरह जकड़ लिया है।
जब सरकारी आंकड़े यह गवाही देते हैं कि 95% दुर्घटनाएं केवल नियमों के पालन से टाली जा सकती हैं, तब यह प्रश्न प्रशासन पर नहीं, बल्कि हमारे नागरिक बोध पर भी खड़ा होता है।
स्वतंत्रता के 78 वर्षों का इतिहास गवाह है कि हमने हर विफलता का ठीकरा पुलिस प्रशासन के सिर फोड़ने की एक सुविधाजनक आदत पाल ली है। हम भूल जाते हैं कि पुलिस व्यवस्था समाज की नियामक हो सकती है, उसका संस्कार नहीं।
जब भारत में सड़क दुर्घटना की मृत्यु दर 20 मौत प्रति घंटा के भयावह स्तर पर पहुंच जाए, तो इसे ‘हादसा' कहना शब्द का अपमान होगा। यह सामूहिक हत्या है। दोषी कौन ‘मासूम' चालक या हमारी परवरिश और परिवेश। इस त्रासदी का सबसे कारुणिक पक्ष वह ‘मासूमियत' है, जिसका जिक्र अक्सर हम करते हैं।
वे वाहन चालक जो सड़कों पर बेमौत मारे जा रहे हैं, वे जन्मजात अपराधी नहीं थे। उन्हें कभी यह बोध ही नहीं कराया गया कि लाल बत्ती पर रुकना पुलिस के प्रति डर नहीं, बल्कि जीवन के प्रति सम्मान है।
"बच्चा वही भाषा बोलता है जो वह घर में सुनता है, और वही आचरण करता है जो वह अपने बड़ों में देखता है।’ विडंबना देखिए, जिस बालक ने अपने बचपन के धुंधलके में अपने पिता को ट्रैफिक पुलिसकर्मी से बहस करते या ‘लेन-देन' कर कानून की आंखों में धूल झोंकते देखा हो, वह नियमों के प्रति श्रद्धा लेकर कैसे बड़ा होगा।
उसके अवचेतन में नियम सुरक्षा का कवच नहीं, बल्कि उसकी गति में एक बाधा बन जाते हैं। पुलिस उसके लिए रक्षक नहीं, बल्कि एक ऐसा शत्रु बन जाती है जिससे बचकर निकलना ही उसकी ‘मदांध बहादुरी' बन जाती है।
सामूहिक प्रायश्चित की आवश्यकता
यह केवल सरकार या विभाग की विफलता नहीं है, यह हमारी सामूहिक गलती है। हमने अपनी आने वाली पीढ़ी को विरासत में तकनीक तो दी, लेकिन उसे बरतने का विवेक नहीं दिया। जब तक सड़क सुरक्षा हमारे ड्राइंग रूम की चर्चा और प्राथमिक शिक्षा के संस्कारों का हिस्सा नहीं बनेगी, तब तक ये सड़कें ऐसे ही मासूमों का तर्पण मांगती रहेंगी।
वक्त आ गया है कि हम पुलिस प्रशासन को उनकी गलतियों के लिए कोसना जारी रखें लेकिन उसके साथ ही अपने भीतर के उस ‘नियम-भंजक' नागरिक का भी अंत करें। वरना, 480 मौत प्रति दिन का यह आंकड़ा बढ़ते-बढ़ते किसी का भी दरवाजा खटखटा सकता है।
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