151 लगाई: फिर थाने से ही कर दी विदाई; पुलिस की ‘मुंहदिखाई’
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शहर की कानून व्यवस्था संभालने वाली पुलिस की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। कार्रवाई का ऐसा दिखावटी चेहरा सामने आया, जिसमें पुलिस की ‘मुंहदिखाई’ तो दिखी, लेकिन सख्ती कहीं नजर नहीं आई। पत्रकारों के साथ खुलेआम मारपीट की घटना के बाद भी पुलिस का रवैया ऐसा रहा कि कार्रवाई शुरू होने से पहले ही पूरी कहानी खत्म होती नजर आई।
अक्सर देखा गया है कि जब पुलिस को अपनी उपलब्धियां जनता तक पहुंचानी होती हैं या कार्रवाई का प्रचार करना होता है, तब पत्रकारों की याद सबसे पहले आती है। प्रेस वार्ता हो या फोटो सेशन, मीडिया को आगे रखा जाता है, लेकिन जब उन्हीं पत्रकारों पर हमला होता है और अपराधियों पर सख्त कार्रवाई की मांग उठती है, तब पुलिस की कार्रवाई सिर्फ खानापूर्ति बनकर रह जाती है। इस मामले में भी कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला।
सोमवार दोपहर एमजी रोड थाना क्षेत्र में गाड़ी पार्किंग को लेकर विवाद इतना बढ़ गया कि एक मोबाइल व्यवसायी और उसके साथी ने दो पत्रकारों से मारपीट कर दी। घटना के बाद एमजी रोड थाना पुलिस के साथ कोतवाली पुलिस भी मौके पर पहुंची, लेकिन थाना सीमा का हवाला देते हुए कोतवाली पुलिस मौके से हट गई।
वहीं एमजी रोड थाने से पहुंचे पुलिसकर्मियों का रवैया भी शुरुआत से ही सवाल खड़े करने वाला रहा। जानकारी के अनुसार निजी चैनलों में कार्यरत वीडियो जर्नलिस्ट योगेश नरवरे और अरुण जेल रोड स्थित ‘सेल यू कॉम’ नामक मोबाइल दुकान पर मोबाइल सुधरवाने पहुंचे थे। जैसे ही दोनों वाहन से उतरे, दुकान संचालक और उसके साथी राजेश कपूर ने पार्किंग को लेकर विवाद शुरू कर दिया और देखते ही देखते मामला मारपीट में बदल गया। आरोप है कि दोनों पत्रकारों के साथ धक्का-मुक्की और हाथापाई की गई।
सूचना के बाद भी पुलिस पहुंचने को तैयार नहीं
घटना की सूचना मिलते ही बड़ी संख्या में पत्रकार मौके पर पहुंच गए। इसके बावजूद दुकान संचालक की दादागीरी कम नहीं हुई। मामला वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचा तब एमजी रोड थाना प्रभारी विजय सिसोदिया ने मौके पर पहुंचने के बजाय अधीनस्थ एसआई दीपक और आरक्षक पवन मिश्रा (3272) को भेजा।
आरोप है कि मौके पर पहुंचे पुलिसकर्मियों ने पहले पत्रकारों से तीखे लहजे में बात की और उलटा उन्हें समझाने व दबाव बनाने की कोशिश की। देख पीसीआर वाहन बुलाया गया, जिसके बाद मारपीट के आरोपी राजेश कपूर को पुलिस एमजी रोड थाने ले गई। यहां भी कार्रवाई को लेकर पुलिस का रुख ढीला ही नजर आया।
151 लगाई, लेकिन थाने से जमानत पर छोड़ दिया
मामले की जानकारी मिलने पर एसीपी विनोद दीक्षित भी एमजी रोड थाना पहुंचे। उन्होंने मौके पर मौजूद पत्रकारों को आश्वासन दिया कि आरोपी के खिलाफ प्रकरण दर्ज कर उसे जेल भेजा जाएगा। इससे माहौल कुछ शांत हुआ, लेकिन कुछ ही घंटों बाद कहानी ने नया मोड़ ले लिया।
सूत्रों के अनुसार आरोपी पर धारा 151 के तहत कार्रवाई तो की गई, लेकिन उसे जेल भेजने के बजाय थाने से ही जमानत पर छोड़ दिया गया। थाना स्टाफ का कहना रहा कि धारा 151 में जमानत देने का अधिकार एसीपी स्तर के अधिकारी के पास होता है और यदि वे चाहते तो आरोपी को जेल भेजा जा सकता था। जिन पत्रकारों के साथ सड़क पर सिर्फ वाहन खड़ा करने को लेकर मारपीट हुई, उन्हें न्याय मिलने के बजाय आरोपी की रिहाई ने पुलिस की मंशा पर संदेह किया। इसे दबाव, प्रभाव या समझौते की कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा है।
हम साथ देते हैं, लेकिन पुलिस सिर्फ खानापूर्ति करती है
मीडिया जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि पुलिस द्वारा जारी किए जाने वाले कई फोटो और कार्रवाई के दावे अक्सर सिर्फ दिखावे तक सीमित रहते हैं। प्लास्टर बंधे आरोपियों की तस्वीरें जारी कर सख्ती का संदेश दिया जाता है, जबकि हकीकत कई बार अलग होती है।
मीडिया को इन बातों की पूरी जानकारी होने के बावजूद शहरहित में कई मामलों को नजरअंदाज किया जाता है, लेकिन जब मीडियाकर्मियों पर ही हमला हो और उसके बाद भी पुलिस झूठे आश्वासन देकर आरोपियों को राहत दे दे, तो यह व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
कुछ अधिकारियों और जवानों के ऐसे रवैये के कारण पूरे पुलिस फोर्स की छवि धूमिल होती है और जनता व मीडिया को पुलिस पर सवाल उठाने के लिए मजबूर होना पड़ता है। जेल रोड क्षेत्र में होने वाले विवाद और कथित ‘सेटिंग के खेल’ भी अब चर्चा का विषय बनते जा रहे हैं।
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