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घात-प्रतिघात के खेल में परिवार पर निशाना क्यों: जन असंतोष के मुद्दे ठंडे पड़ने से गरमाई राजनीति

KHULASA FIRST

संवाददाता

26 जून 2026, 1:34 pm
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घात-प्रतिघात के खेल में परिवार पर निशाना क्यों

मुख्यमंत्री के किसानों और युवाओं के हित में लिए फैसलों ने छीने विपक्ष के हथियार

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
दो दिन पहले प्रदेश के सबसे बड़े विपक्षी दल कांग्रेस द्वारा जितनी तीव्रता से मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के खिलाफ खड़ा किया या करवाया गया चक्रवात राजनीतिक वायुमंडल में धूम मचाकर जमीन से टकराकर ठंडा पड़ता दिखाई दे रहा है। पब्लिक डोमेन में पहले से घूम रहे विपक्ष के आरोप वाले दस्तावेज ऐसा कुछ भी साबित नहीं कर सके, जिनसे मुख्यमंत्री अस्थिर हो जाएं।

महिलाओं और सामाजिक योजनाओं की निरंतरता
सरकार ने लाड़ली बहना जैसी प्रमुख योजनाओं को जारी रखा तथा सहायता राशि बढ़ाने की घोषणा की । सामाजिक कल्याण की योजनाओं को भी विस्तार देने का दावा किया गया । प्रशासनिक सख्ती और कानून-व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए अधिकारियों के खिलाफ और कार्रवाई भी की गई।

कहा जा रहा है कि नाराज बड़े अधिकारी सरकार को प्रभावित करने की कोशिश करते रहे हैं। कार्यभार संभालने के शुरुआती दौर में सार्वजनिक स्थानों पर ध्वनि विस्तारकों के नियमन और खुले में मांस बिक्री पर रोक जैसे फैसलों ने व्यापक राजनीतिक चर्चा बटोरी। इन्हें समर्थकों ने प्रशासनिक सख्ती को विरोधियों ने वैचारिक निर्णय बताया।

सवाल आरोपों का नहीं कांग्रेस के हमले का है, जिसे अनैतिक कहा जा रहा है। जैसा वरिष्ठ नेता कहते हैं हमला मुख्यमंत्री तक सीमित होता तो ठीक था, लेकिन परिवार पर किया गया, यह राजनीतिक शुचिता के खिलाफ है। विपक्ष का ऊर्जावान नेतृत्व वैसे तो राजनीतिक मर्यादाओं के लिए जाना जाता हैं, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ।

मुख्यमंत्री के खिलाफ जमीन घोटाले का हमला तथाकथित भाजपाई राजनीतिक साजिश हो या कांग्रेस का सुनियोजित चक्रव्यूह, बताता है निगाहें कहीं और और निशाना कहीं और है। विश्लेषक मानते हैं प्रदेश सरकार के खिलाफ बीते दो वर्ष में किसानों के कई आंदोलन खड़े हुए।

किसानों में सरकार की नीतियों के खिलाफ गहरा संतोष था जो जगह-जगह आंदोलन के रूप में सामने आया। यह अलग बात है ये किसान विरोधी नीतियां भाजपा की पूर्ववर्ती सरकार के समय लागू की गई थी। इसी तरह के कुछ आंदोलन युवाओं में असंतोष के कारण भी हुए।

इन दोनों वर्गों के आंदोलन कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से बहुत ज्यादा फायदेमंद साबित हो रहे थे, यहां तक कहा जाने लगा था अगली सरकार कांग्रेस की बनेगी। देखते देखते मुख्यमंत्री ने बाजी कांग्रेस के हाथ से छीन ली। ऐसा इसलिए कि एक तो किसान कल्याण वर्ष की घोषणा की गई दूसरा ऐतिहासिक फैसला लेते हुए भूमि अधिग्रहण के बदले प्रभावित किसानों को चार गुना मुआवजा देने जैसी साहसी नीति लागू कर दी गई, साथ ही फसलों के समर्थन मूल्य को लेकर भी किसानों के बीच बड़ा बवाल बार-बार खड़ा हो रहा था। इस मामले में भी मुख्यमंत्री ने उदार रख अपनाया और समर्थन मूल्य पर खरीदी की। यह सब सरकार की भयावह प्रतिकूल वित्तीय परिस्थिति के बावजूद किया गया।

कांग्रेस ने खेला हारा दांव...विश्लेषक कहते हैं कांग्रेस को ऐसी उम्मीद कतई नहीं थी कि मुख्यमंत्री किसानों के आंदोलन को ठंडा कर प्रदेश के करीब 50% किसान मतदाताओं को अपने पक्ष में करने में सफल हो जाएगे। ऐसा होने से कांग्रेस के हाथ से एक बड़ा राजनीतिक हथियार छिन गया।

हताशा से घिरे विपक्ष ने नए मुद्दों की तलाश की और जमीन घोटाला उसके हाथ लगा। यह जानते हुए भी कि इस मामले में इतना दम नहीं है कि सरकार हिल जाए फिर भी मीडिया रिपोर्ट को आधार बनाकर हारा दांव ही खेला गया।

सूत्र बताते हैं इस सुनियोजित हमले के बारे में मुख्यमंत्री को बहुत पहले से काफी कुछ मालूमात थी। मामला ऐसा नहीं है जो किसी तरह का संकट खड़ा कर सके इसलिए उन्होंने न पहले इसकी चिंता की न इस समय चिंतित है।

बताते हैं उनकी परेशानी का कारण परिवार को निशाना बनाना है। विपक्ष के साथ राजनीतिक मर्यादा और शुचिता निभाने वाले मुख्यमंत्री को शायद विपक्ष से ऐसी उम्मीद नहीं थी इसलिए आहत होना स्वाभाविक है।

पलट गई बाजी...राजनीति के जानकार कहते हैं भाजपा के असंतुष्टों और विपक्ष को लग रहा था मुख्यमंत्री ढाई वर्ष के कार्यकाल में कमजोर साबित होंगे। किसान, युवा ऒर भ्रष्टाचार के विषय विपक्ष के लिए संजीवनी बन चुके थे, लेकिन बाजी पलट गई। लगता है मुद्दा विहीन कांग्रेस ने सॉफ्ट टारगेट के रूप में मुख्यमंत्री के परिवार पर निशाना साधा। इसे अपनी रणनीति का हिस्सा बना लिया।

विपक्ष की जमीन फिर कमजोर होने का बड़ा कारण किसानों की नाराजगी को सरकार द्वारा दूर करना रहा है। प्रदेश में खेती-किसानी की अर्थव्यवस्था है और कृषक परिवारों को मिलाकर मतदाताओं की बड़ी संख्या सरकार बनाने और बिगड़ने का काम निर्णायक तरीके से करती है।

उपलब्ध सरकारी और कृषि जनगणना के आंकड़ों के आधार पर प्रदेश में किसानों की संख्या लगभग 1 करोड़ (10 मिलियन) कृषि जोतधारकों के आसपास मानी जाती है। यदि व्यापक अर्थ में खेती पर निर्भर परिवारों की बात करें, तो संख्या कहीं अधिक है।

कृषि भूमि अधिग्रहण पर बढ़े हुए मुआवजे (चार गुना तक), ब्याज दरों और भुगतान की एक वर्ष की समय अवधि बढ़ाने में राहत, ऋण संबंधी रियायतें, समर्थन मूल्य पर खरीद और किसान हितैषी घोषणाओं को एक साथ देखा जाए, तो स्पष्ट है डॉ. मोहन यादव सरकार ने किसानों के बीच अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश की है। इन फैसलों का उद्देश्य केवल प्रशासनिक सुधार नहीं बल्कि ग्रामीण और किसान वर्ग में सरकार के प्रति सकारात्मक संदेश देना भी माना जा सकता है।

प्रदेश में निर्णायक हैँ किसान मतदाता... प्रदेश में किसान परिवारों और उन पर निर्भर मतदाताओं को शामिल किया जाए तो माना जाता है 50–60% से अधिक मतदाता प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े हैं।

इसलिए किसान हित से जुड़े फैसले—जैसे भूमि अधिग्रहण मुआवजा, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी), सिंचाई, ऋण राहत और कृषि निवेश—चुनावी राजनीति पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकते हैं। वर्तमान परिस्थिति में कहा जा सकता है किसान हितैषी निर्णयों ने सरकार को ग्रामीण क्षेत्रों में राजनीतिक बढ़त दिलाने का प्रयास किया है।

इससे कांग्रेस के लिए केवल किसान असंतोष के आधार पर व्यापक आंदोलन खड़ा करना पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। डॉ. मोहन यादव ने अपने लगभग ढाई वर्ष के कार्यकाल में विकास, निवेश, धार्मिक पर्यटन, कृषि और प्रशासनिक सुधार को अपनी राजनीति का प्रमुख आधार बनाया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री की कल्याणकारी योजनाओं को जारी रख अपनी अलग पहचान "विकास और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' के संयोजन से बनाने का प्रयास किया।

युवाओं के लिए सक्रियता... उद्योग बढ़ाने के लिए डॉ. मोहन यादव ने देश और विदेश में रोड शो तथा ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट से मध्य प्रदेश को निवेश गंतव्य के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया। सरकार का दावा है इससे रोजगार और औद्योगिक विकास को गति मिलेगी। इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी बड़ा दांव लगाया।

इसमें कई परियोजनाएं कृषि भूमि अधिग्रहण के साथ बड़े पैमाने पर विस्थापन और वनभूमि अधिग्रहण के कारण जन असंतोष का कारण बनी है इस पर प्रभावितों को बाजार मूल्य के बराबर चार गुना मुआवजा और बेहतर पुनर्वास का भरोसा दिलाया जा रहा है। औद्योगिक कॉरिडोर और शहरी कनेक्टिविटी परियोजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाया गया। सरकार का मानना है इनसे माल परिवहन, पर्यटन और निवेश को लाभ मिलेगा।

किसान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर फोकस
दुग्ध उत्पादन, मत्स्य पालन, जल संरक्षण तथा कृषि आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए नई पहल की गई। प्रत्येक जिले में फिश हैचरी स्थापित करने का लक्ष्य भी घोषित किया गया।

धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को राजनीतिक आधार
महाकाल लोक, उज्जैन तथा धार्मिक पर्यटन को सरकार की प्राथमिकता बनाया गया। धार्मिक आयोजनों और सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देकर हिंदुत्व समर्थक वर्ग में अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता मजबूत करने की रणनीति दिखाई दी।

महिलाओं और सामाजिक योजनाओं की निरंतरता
सरकार ने लाड़ली बहना जैसी प्रमुख योजनाओं को जारी रखा तथा सहायता राशि बढ़ाई। सामाजिक कल्याण योजनाओं को भी विस्तार देने का दावा किया गया। प्रशासनिक सख्ती और कानून-व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए अधिकारियों के खिलाफ भी कार्यवाही भी गई।

कहां जा रहा है नाराज बड़े अधिकारी सरकार को प्रभावित करने की कोशिश करते रहे हैं। डॉ. मोहन यादव ने कार्यकाल के शुरुआती दौर में सार्वजनिक स्थानों पर ध्वनि विस्तारकों के नियमन और खुले में मांस बिक्री पर रोक जैसे फैसलों ने व्यापक राजनीतिक चर्चा बटोरी। इन्हें समर्थकों ने प्रशासनिक सख्ती तो विरोधियों ने वैचारिक निर्णय बताया।

कई मामलों में नीतिगत लचीलापन भी दिखाया। संकेत दिया जन प्रतिक्रिया के आधार पर नीतियों में बदलाव भी किया जा सकता है साथ ही समान नागरिक संहिता पर सुझाव लेने की प्रक्रिया शुरू की गई। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इन दो वर्षों में डॉ. मोहन यादव ने पांच प्रमुख वर्गों किसान, महिला, युवा, धार्मिक-सांस्कृतिक मतदाता और उद्योग जगत को साधने की कोशिश की है।

निवेश, आधारभूत संरचना और धार्मिक पर्यटन उनके राजनीतिक ब्रांड की प्रमुख पहचान बनकर उभरे है। हालांकि दूसरी ओर भूमि सौदों और अन्य मुद्दों को लेकर विपक्ष ने सरकार और मुख्यमंत्री पर आरोप लगाए हैं। सरकार इन आरोपों से इनकार कर रही है और कई मामलों में अंतिम न्निष्कर्ष सामने नहीं आया है।

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