सिंहस्थ क्षेत्र में फिर शुरू हुआ पक्का निर्माण कार्य: गृहमंत्री अमित शाह के फैसले की अनदेखी
KHULASA FIRST
संवाददाता

शरद गुप्ता 96177-77331 खुलासा फर्स्ट, उज्जैन।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की आपत्ति और किसानों के व्यापक आंदोलन के बाद जिस सिंहस्थ क्षेत्र में स्थाई निर्माण की लैंडपुलिंग योजना को सरकार ने निरस्त कर दिया था, उसी क्षेत्र में अब प्रशासन ने करोड़ों रुपए के स्थाई निर्माण कार्य शुरू कर दिए हैं।
नई सड़कें बन रही हैं, पुरानी सड़कों का चौड़ीकरण हो रहा है और उनके दोनों ओर स्थाई सीवरेज व पेयजल पाइपलाइन बिछाने की तैयारी है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासन गृह मंत्री के फैसले को दरकिनार कर सिंहस्थ क्षेत्र में फिर से स्थाई विकास की पटकथा लिख रहा है?
जानकारी के अनुसार सिंहस्थ क्षेत्र में करीब 50 किलोमीटर नई सड़क, 67 किलोमीटर पुरानी सड़कों का चौड़ीकरण, 240 किलोमीटर सीवर लाइन और 260 किलोमीटर पेयजल पाइपलाइन बिछाने की योजना पर काम शुरू हो चुका है। केवल सीवर और पानी की लाइन पर ही लगभग 700 करोड़ रुपये खर्च किए जाने हैं, जबकि सड़क निर्माण और भूमि अधिग्रहण की लागत अलग है।
जब कुंभ में अस्थायी व्यवस्था, तो उज्जैन में स्थाई क्यों?: देश के सबसे बड़े धार्मिक आयोजन प्रयागराज महा कुम्भ मेला में करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए पानी और सीवरेज की व्यवस्था अस्थाई रूप से की गई थी। वर्ष 2016 के उज्जैन सिंहस्थ में भी यही मॉडल अपनाया गया था।
ऐसे में 12 साल में केवल एक बार लगने वाले सिंहस्थ के लिए स्थाई पाइपलाइन पर 700 करोड़ रुपए खर्च करने की जरूरत क्या है? यदि यही व्यवस्था अस्थाई रूप से 150 करोड़ रुपए से कम में संभव है तो स्थाई परियोजना पर कई गुना अधिक राशि खर्च करने का औचित्य क्या है? यह सवाल अब प्रशासन की मंशा पर भी खड़े हो रहे हैं।
जिस वजह से योजना रुकी, वही काम अब कैसे?: सिंहस्थ क्षेत्र की लगभग 2500 हेक्टेयर भूमि के लिए लाई गई लेण्डपुलिंग योजना किसानों के विरोध के बाद दिल्ली तक पहुंची थी। समीक्षा बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट सवाल उठाया था कि यदि सिंहस्थ क्षेत्र में स्थाई सड़क, सीवर और पानी जैसी सुविधाएं विकसित कर दी गईं तो भविष्य में नई कॉलोनियों को रोकना मुश्किल होगा और सिंहस्थ की आरक्षित भूमि हमेशा के लिए प्रभावित हो सकती है। इसके बाद योजना निरस्त कर दी गई थी।
क्या फिर से बसाई जा रही है सिंहस्थ की जमीन?
पूर्व की लैंडपुलिंग योजना में जिन क्षेत्रों में सड़कें प्रस्तावित थीं, नए नक्शे में भी अधिकांश सड़कें वहीं दिखाई दे रही हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि योजना का नाम बदल गया है, लेकिन जमीन पर निर्माण का स्वरूप लगभग वही नजर आ रहा है।
यही वजह है कि विरोध करने वाले इसे 'लेण्डपुलिंग पार्ट-2' बता रहे हैं। जानकारों का कहना है कि जहां सड़क, सीवर और पानी जैसी स्थाई सुविधाएं पहुंच जाती हैं, वहां समय के साथ बसाहट और कॉलोनियों का दबाव बढ़ना तय होता है। यही आशंका पहले भी जताई गई थी।
• 700 करोड़ की योजना पर बड़े सवाल
• लैंडपुलिंग योजना निरस्त होने के बाद भी सड़क, सीवरेज और पानी की स्थाई लाइन बिछाने का काम शुरू
• क्या अफसरशाही ने लैंडपुलिंग पार्ट-2' लागू कर दिया?
अब सबसे बड़ा सवाल
अब जबकि उसी आरक्षित क्षेत्र में सड़क, सीवरेज और पेयजल की स्थाई परियोजनाओं पर काम शुरू हो चुका है, सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि- क्या यह लेण्डपुलिंग योजना का बदला हुआ स्वरूप है? यदि स्थाई निर्माण अनुचित था, तो अब वही कार्य किस आधार पर किया जा रहा है? क्या सरकार ने इस संबंध में कोई नई नीति या स्वीकृति दी है?
अब जवाब किसके पास है?
यदि स्थाई निर्माण सिंहस्थ क्षेत्र के लिए अनुचित था तो आज वही निर्माण किसके आदेश पर हो रहा है? क्या सरकार ने अपना रुख बदल दिया है? क्या गृह मंत्री की आपत्तियों का समाधान हो चुका है? या फिर प्रशासन ने योजना का नाम बदलकर उसी मॉडल को दोबारा लागू कर दिया है?
सिंहस्थ की आड़ में 700 करोड़ रुपये की स्थाई परियोजना अब केवल विकास का विषय नहीं, बल्कि नीति, पारदर्शिता और जवाबदेही का भी बड़ा सवाल बन गई है।
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