आखिर क्यों हुआ धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा?: क्या इन कारणों से आया सरकार पर दबाव; क्या चुनावों पर पड़ सकता है आंदोलनों का असर
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, नई दिल्ली।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ पिछले कई सप्ताह से चल रहा छात्र आंदोलन एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया था। NEET परीक्षा में कथित गड़बड़ियों और पेपर लीक के मुद्दे पर शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन धीरे-धीरे राष्ट्रीय आंदोलन का रूप लेता गया। विपक्ष के लगातार हमलों, छात्रों के व्यापक प्रदर्शन और बढ़ते राजनीतिक दबाव के बीच सरकार ने आखिरकार धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा स्वीकार किया, जिसके बाद आंदोलन समाप्त करने की घोषणा की गई।
जंतर-मंतर का आंदोलन बना राष्ट्रीय अभियान
20 जून से दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों और विभिन्न संगठनों का विरोध प्रदर्शन लगातार जारी रहा। समय के साथ आंदोलन में शामिल लोगों की संख्या बढ़ती गई। 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान पुलिस कार्रवाई के बाद आंदोलन को और अधिक समर्थन मिलने लगा। देश के विभिन्न राज्यों से छात्र दिल्ली पहुंचने लगे और विरोध प्रदर्शन राष्ट्रीय स्तर पर फैल गया।
विपक्ष ने बनाया बड़ा राजनीतिक मुद्दा
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव सहित कई विपक्षी नेताओं ने आंदोलन का खुलकर समर्थन किया। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरना दिया और संसद के भीतर तथा बाहर लगातार शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग उठाई। विपक्ष ने सरकार पर छात्रों की आवाज दबाने और बल प्रयोग करने के आरोप लगाए। लगातार हंगामे के कारण संसद की कार्यवाही भी प्रभावित रही।
समाज के विभिन्न वर्गों का बढ़ता समर्थन
आंदोलन को केवल छात्रों तक सीमित समर्थन नहीं मिला। विभिन्न सार्वजनिक हस्तियों, शिक्षाविदों, कलाकारों और कुछ वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं ने भी छात्रों की मांगों पर संवाद की आवश्यकता जताई। कई मीडिया रिपोर्टों में यह भी उल्लेख किया गया कि देश-विदेश में पढ़ रहे भारतीय छात्रों ने भी प्रदर्शन किए और शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग उठाई।
युवाओं में बढ़ती नाराजगी की आशंका
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शिक्षा, भर्ती परीक्षाओं और रोजगार जैसे मुद्दे युवाओं से सीधे जुड़े हुए हैं। ऐसे में आंदोलन लंबा खिंचने से सरकार के प्रति युवा मतदाताओं में असंतोष बढ़ने की आशंका जताई जा रही थी। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह आंदोलन और अधिक व्यापक होता, तो इसका असर आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों की राजनीति पर भी पड़ सकता था।
आंदोलन के और व्यापक होने का खतरा
विश्लेषकों का मानना है कि यदि सरकार समय रहते कोई बड़ा राजनीतिक निर्णय नहीं लेती, तो आंदोलन देश के अन्य हिस्सों में और तेज हो सकता था। लगातार बढ़ते विरोध, विपक्ष की एकजुटता और राष्ट्रीय स्तर पर हो रही चर्चाओं ने सरकार पर दबाव बढ़ाया। इन्हीं परिस्थितियों के बीच धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया और उसके बाद आंदोलन समाप्त करने की घोषणा कर दी गई।
अगर इस्तीफा नहीं होता तो क्या हो सकता था?
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, यदि सरकार कोई बड़ा कदम नहीं उठाती तो छात्र आंदोलन और अधिक राज्यों में फैल सकता था। विपक्ष इस मुद्दे को आगामी चुनावों में प्रमुख राजनीतिक अभियान बना सकता था।
संसद में गतिरोध लंबा खिंच सकता था। शिक्षा और रोजगार से जुड़े मुद्दों पर सरकार को लगातार राजनीतिक दबाव झेलना पड़ता। युवा मतदाताओं के बीच सरकार की छवि प्रभावित होने की आशंका बनी रहती। हालांकि, यह सभी संभावित राजनीतिक परिदृश्य हैं। इनका निश्चित रूप से घटित होना तय नहीं माना जा सकता।
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