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क्यों हो रहे हैं अस्थिर करने के प्रयास: सबै भूमि गोपाल की; तो फिर क्यों मचा हल्ला

Khulasa First

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संवाददाता

24 जून 2026, 1:24 pm
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क्यों हो रहे हैं अस्थिर करने के प्रयास

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
कहावत हैं सबै भूमि गोपाल की..... तो फिर यह हल्ला क्यों मचाया है... क्योंकि राज्य का शासक, राज्य में जहां चाहे वहां की सोना उगलने वाली भूमि अपने अधीन कर सकता है, उसे कौन रोकने वाला है।

ऐसा भी नहीं है कि उज्जैन में भूमि की कीमत प्रदेश में देश में या दक्षिण एशिया में या सारी दुनिया के मुकाबले सबसे ज्यादा हो गई है।

ऐसे कोई बहुत महत्वपूर्ण हाई-वे भी नहीं है, जहां भूमि सोने के भाव हो। देश के शासक वर्ग के लिए उज्जैन जैसी भूमि में निवेश तो कुछ भी नहीं है।

स त्ता और सत्ताधारियों की तुलना और अनुपात में यह तो बहुत छोटा-मोटा निवेश है और वह भी खेती-किसानी में हो तो फिर कुछ भी अवैधानिक नहीं प्रतीत होगा। निवेश मुंबई में हो, दिल्ली या स्विस बैंक अथवा लंदन, दुबई वगैरह में हो तो बात समझ में आती है लेकिन ऐसा तो कुछ भी नहीं है।

मीडिया विश्लेषक और जानकर भी कह रहे हैं जो हल्ला मचाया गया वह कानूनी रूप से कहीं भी नहीं ठहरता। न किसी आरोप के घेरे में आता है। यह सिर्फ मुख्यमंत्री को मौका देखकर बार-बार विचलित करने की टेक्टिक्स भर है। इस तरह के प्रयास से मुख्यमंत्री और उनकी सरकार की प्रतिकूल छवि बनी रहेगी, जिसका दीर्घकालीन फायदा विपक्ष को हो सकता है, ऐसा मान लिया गया है।

तो फिर यही सवाल खड़ा होगा ठीक विक्रम बेताल की तरह की हल्ला आखिर क्यों मचा? कहा जा रहा है यह टीआरपी का खेल है यह भी कहा गया सत्तारूढ़ पार्टी के ही संतुष्ट नेताओं द्वारा रचा गया सत्ता षड्यंत्र है। बहकावे में आने वाले कहने लगे अब निपट जाएंगे.... मोटा भाई के इशारे के बिना ऐसा होना संभव नहीं।

जैसा कल एक मीडिया रिपोर्ट में आया। इसके बाद गपबाजी को आधार बनाते हुए कहा जाने लगा तीन राज्यों के सरकारी नेतृत्व में बदलाव होना है, जिनमें मध्यप्रदेश भी शामिल है।

डॉ. मोहन यादव जब से मुख्यमंत्री बने हैं, हर दिन उनके खिलाफ षड्यंत्र रचे जा रहे हैं। ऐसा हर शासक के साथ करीब-करीब होता है। डॉ. यादव विरले नेता नहीं है कि उनका कोई विरोध न हो। उन्हें अस्थिर करने का सुनियोजित षड्यंत्र बार-बार किया जा रहा है।

मुख्यमंत्री बनने के कुछ महीनों बाद जैसे-जैसे सत्ता पर उनकी पकड़ बनने लगी, तबसे उनके खिलाफ कुछ नरेटिव फिक्स किए गए, जो जनचर्चा, माउथ पब्लिसिटी के माध्यम से चलाए गए। इसे बदनाम करने का माध्यम बना लिया गया है।

अब जब मुख्यमंत्री की पकड़ सत्ता, संगठन और संघ पर मजबूत हो चुकी है, मंत्रिमंडल, विधायक और ब्यूरोक्रेसी पूरी तरह उनके नियंत्रण में है। कठोर और जनहितैषी फैसले लेने लगे हैं। पब्लिक फेस बन रहे हैं।

मीडिया से भी बात करने लगे हैं। उनके ऐसे प्रयास विपक्ष के लिए मुसीबत बने हुए हैं। विपक्ष एक तो लंबा वनवास झेल रहा है, दूसरा मुख्यमंत्री मजबूत हुए तो वनवास और लंबा हो जाएगा। ऐसे कई कारण हैं जो विपक्ष को हिम्मत दे रहे हैं।

इस बार पैंतरा अलग...मजबूत आक्रमण के लिए इस समय कुछ अलग दांव-पेंच आजमाए जा रहे हैं। खेल अब और ज्यादा परिष्कृत हो चुका है इसकी बड़ी वजह विपक्ष का चाक चौबंद तरीके से आक्रामक होकर सामने आना है। प्रदेश मे विपक्ष को दिल्ली मुख्यालय से सीधे हाईकमान की देखरेख में चलाया जा रहा है।

हाईकमान ने भाजपा और भाजपा के शासित राज्यों का मजबूत डाटाबेस तैयार किया है रिसर्च एंड डेवलपमेंट, सोशल मीडिया विचारक तर्कशास्त्री, सामाजिक संगठन, विधि शास्त्री और मीडिया प्लेटफॉर्म वगैरह। यानी हर प्रमुख नीतिगत विषय से जुड़े संसाधन, संदर्भ आदि का गोला बारूद व्यवस्थित कर लिया गया है।

इस कारण इसका बेहतर तरीके से उपयोग भी किया और करवाया जा रहा है। यह बड़ा कारण है कि इससे बात का बतंगड़ बनाने में देर नहीं लगती। यह सब कुछ एक बवंडर की तरह उठता है और धीरे से खत्म हो जाता है लेकिन तब तक विपक्ष अपना काम कर चुका होता है।

ऐसा उसे लगता है। लगना भी चाहिए क्योंकि उनके किए-धरे का ठीकरा मुख्यमंत्री, सरकार और उनकी अपनी पार्टी के विरोधी नेताओं के माथे फूटने लगता है। नाम आता है कैलाश विषयवर्गीय का। जबकि, निडर होने से उन्हें किसी नेता के प्रति नाराजगी प्रकट करने के लिए किसी तरह का ताना-बाना बुनने की जरूरत नहीं पड़ती।

जो कहना होता है सामने कह देते है। फिर कुछ और नाम आते हैं शिवराजसिंह चौहान, प्रहलाद पटेल, नरेंद्रसिंह तोमर आदि। इस बहाने टीआरपी बैठे-बिठाए बढ़ जाती है वैसे ये सब परिपक्व नेता है।

मुख्यमंत्री बनने के बाद किसी भी नेता की पुरानी व्यावसायिक गतिविधियां सार्वजनिक जांच के दायरे में आ जाती हैं। राजनीतिक विरोधी सरकार को घेरने के लिए ऐसे मुद्दे उठाते हैं। यदि किसी नेता का परिवार या सहयोगी व्यापारिक गतिविधियों से जुड़े रहे हों, तो हित साधने के प्रश्न उठ सकते हैं।

मीडिया और विपक्ष उन मामलों को बार-बार उठाते हैं जिनसे राजनीतिक नुकसान की संभावना होती है। संभव है कुछ आरोप राजनीतिक लाभ के लिए बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए जाएं। भारतीय राजनीति में लगभग हर बड़े नेता, चाहे वह सत्ता पक्ष का हो या विपक्ष का, पर ऐसे आरोप लगते रहे हैं।

लेकिन यह भी उतना ही सही है कि केवल ‘साजिश’ कहकर हर आरोप को खारिज भी नहीं किया जा सकता। कोई आरोप है तो उसका मूल्यांकन तथ्यों, दस्तावेजों, जांच और न्यायिक प्रक्रिया से होना चाहिए। डॉ. मोहन यादव पर भूमि और शराब कारोबार से जुड़े आरोप राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहे हैं।

यह सब होता रहेगा जब तक मुख्यमंत्री रहेंगे। विधि के जानकार कहते हैं जहां तक घोटालों या भ्रष्टाचार के आरोपों का प्रश्न है, विपक्ष द्वारा हाल में भी आरोप लगाए गए हैं, लेकिन आरोप और न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य अलग-अलग चीजें हैं।

अभी ऐसे आरोप राजनीतिक विवाद का विषय हैं, न कि न्यायिक रूप से स्थापित निष्कर्ष। मुख्यमंत्री बनने के बाद डॉ. मोहन यादव ने प्रशासनिक ढांचे में व्यापक हस्तक्षेप किया है। कई बार बड़े पैमाने पर आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के तबादले किए, मुख्यमंत्री सचिवालय का पुनर्गठन किया और कलेक्टरों तथा पुलिस अधीक्षकों के स्तर पर लगातार बदलाव किए हैं।

इसके अलावा, विभिन्न मामलों में अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई, भी की है आईएएस और आईपीएस अधिकारियों पर जवाबदेही तय की गई, जिससे यह संदेश गया कि सरकार प्रशासनिक अनुशासन पर जोर दे रही है।

राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो डॉ. मोहन यादव अब "संक्रमणकालीन मुख्यमंत्री" नहीं रह गए हैं। 2023 में पद संभालने के बाद धीरे-धीरे अपनी अलग प्रशासनिक पहचान बनाने में सफल रहे हैं। आज राज्य का प्रशासन काफी हद तक उनके नेतृत्व के अनुसार संचालित होता दिखाई देता है।

सबसे बड़ी उपलब्धि है अपेक्षाकृत कम चर्चित चेहरे के रूप में चुने जाने के बाद भी सरकार और संगठन दोनों पर नियंत्रण बनाए हुए हैं वहीं उनकी सबसे बड़ी परीक्षा यह होगी कि वे रोजगार, निवेश, कृषि, शहरीकरण और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर ठोस परिणाम दिखा पाते हैं या नहीं।

इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा डॉ. मोहन यादव की राजनीतिक क्षमता का आकलन जारी है। समर्थक उन्हें कुशल प्रशासक मानते हैं, जबकि आलोचक उनके निर्णयों, नियुक्तियों और कुछ विवादों को लेकर सवाल उठाते हैं।

उनकी सबसे बड़ी परीक्षा यह होगी कि रोजगार, निवेश, कृषि, शहरीकरण और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर ठोस परिणाम दिखा पाते हैं या नहीं। इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा डॉ. मोहन यादव की राजनीतिक क्षमता का आकलन अभी जारी प्रक्रिया है।

अंतिम मूल्यांकन उनके कार्यकाल के दीर्घकालिक परिणामों और तथ्यों पर आधारित होगा। मुख्यमंत्री के खिलाफ उनकी ही पार्टी या सरकार के कुछ वर्गों में असंतोष की चर्चा समय-समय पर होती रही है, लेकिन इसके कहीं सारे राजनीतिक कारण है जो हमेशा बने रहते हैं।

जितने सूबे उतने सूबेदार
मध्य प्रदेश की राजनीति में मालवा, महाकौशल, ग्वालियर-चंबल, विंध्य और बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों के नेताओं के अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र हैं। मुख्यमंत्री को इन सभी क्षेत्रों के हितों में संतुलन बनाना पड़ता है। कभी-कभी किसी क्षेत्र को लगता है कि उसे पर्याप्त प्राथमिकता नहीं मिली।

हर मुख्यमंत्री की प्रशासनिक शैली अलग होती है। कुछ नेता अत्यधिक केंद्रीकृत निर्णय लेते हैं, जबकि कुछ अधिक परामर्श आधारित शैली अपनाते हैं। नई कार्यशैली से सभी नेता सहज हों, यह आवश्यक नहीं।

तेल और तेल की धार
अब तक ऐसा कोई संकेत नहीं है कि भाजपा में मध्य प्रदेश स्तर पर मुख्यमंत्री के खिलाफ कोई संगठित विद्रोह या नेतृत्व परिवर्तन की स्थिति हो। यदि असंतोष है भी, तो वह अधिकतर व्यक्तिगत, आर्थिक व्यवसायिक हित, शासन प्रशासन में दखल, क्षेत्रीय या पद-संबंधी अपेक्षाओं से जुड़ा माना जाता है।

मुख्यमंत्री पद की राजनीतिक प्रकृति भी मायने रखती है
किसी भी बड़े राज्य में मुख्यमंत्री पद स्वयं शक्ति का केंद्र होता है। इसलिए पार्टी के भीतर भी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बनी रहती है। इसका अर्थ यह नहीं कि सरकार संकट में है, बल्कि यह राजनीतिक दलों की सामान्य आंतरिक राजनीति का हिस्सा है।

नेतृत्व परिवर्तन से उत्पन्न असंतोष भी एक कारण है...
जब किसी राज्य में लंबे समय तक एक नेता का प्रभाव रहता है और अचानक नया नेतृत्व आता है, तो पुराने शक्ति-संतुलन बदल जाते हैं। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान लगभग 18 वर्ष तक राज्य की राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरे रहे।

ऐसे में नया नेतृत्व आने पर कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं को समायोजन में समय लगता है। मुख्यमंत्री बनने के बाद मंत्रिमंडल, निगम-मंडलों और संगठनात्मक पदों पर नियुक्तियां होती हैं। जिन नेताओं या समूहों को अपेक्षित महत्व नहीं मिलता, उनमें असंतोष पैदा हो सकता है। यह लगभग हर राजनीतिक दल में देखा जाता है।

डॉ. मोहन यादव
भूमि नवम्बर 2023 जून 2026 13.12.2023 के बाद क्रय

भूमि एकड़ में 17.967 17.967 0

सीमा यादव
भूमि नवम्बर 2023 जून 2026 13.12.2023 के बाद क्रय

भूमि एकड़ में 12.287 12.287 0

कम्पनी सिद्धि विनायक
भूमि नवम्बर 2023 जून 2026 कुल क्रय विक्रय

भूमि एकड़ में 68.430 65.690 9.464 12.123

वैभव यादव
भूमि नवम्बर 2023 जून 2026 13.12.2023 के बाद क्रय

भूमि एकड़ में 16.38 16.38 0

शालिनी यादव
भूमि नवम्बर 2023 जून 2026 13.12.2023 के बाद क्रय

भूमि एकड़ में 0 10.00 10.00

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