भाजपा जीते या ममता बनर्जी, होगा चमत्कार
KHULASA FIRST
संवाददाता

रमण रावल वरिष्ठ पत्रकार खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
एक दिलचस्प बात तो यह है कि पिछले चुनाव में तृणमूल की सीटें 2016 की 211 सीटों से बढ़कर 215 हो गई थी और भाजपा 2 से उछलकर 77 पर पहुंच गई थी। फिर भी कोई चमत्कार न हो सका, क्योंकि वहां की जनता ने कांग्रेस व वामदल को खारिज कर उनके हिस्से का समर्थन भाजपा को दिया था।
यह देख लेने के बाद धीरे-धीरे वे भाजपा विधायक फिर से तृणमूल में लौट गए जो भाजपा सरकार बनने पर मंत्री पद की ख्वाहिश में इधर आ गए थे। तब भाजपा की संख्या 77 से घटकर 65 रह गई। तो सबसे पहली बात तो यह कि भाजपा को 65 से 148 सीट तक ले जाने में 83 सीटें तो हर हाल में जीतना होंगी। यहीं काम आएगा चमत्कार।
प श्चिम बंगाल में होने जा रहे विधासनभा चुनाव देश के पिछले आम चुनाव से अधिक दिलचस्प,कंटीले और ऐतिहासिक परिणाम वाले होंगे। दोनों ही सूरत में यानी भाजपा सरकार लायक बहुमत जुटा ले तो भी और ममता चौथी बार जीत का परचम फहरा दे तो भी।
ये बात दोनों राजनीतिक प्रतिस्पर्धी तो जानते ही हैं, बंगाल की जनता भी जानती है। इस समय वह ऐसी प्रसव पीड़ा से गुजर रही है, जिसमें संतान कौन और कैसी होगी, इस पर तीव्र जिज्ञासा है। ममता की एक बार फिर सरकार बनना भाजपा के लिए लगातार चौथी संतान भी कन्या होने की तरह रहेगा तो भाजपा की विजय पुत्र रत्न की प्राप्ति की तरह रहेगी।
इस बार प्रसूंता को भी फर्क पड़ेगा कि उसकी नाभि नाल से कौन जुड़ा रहा था, जिसे उसने अपने मन के गर्भ में पांच साल तक पोषित किया।
बंगाल का ये चुनाव मोदी-शाह विरुद्ध ममता बैनर्जी है। याने बेहद निजी लड़ाई बन चुकी है। भाजपा और तृणमूल कांग्रेस वे पार्टियां हैं, जो इनके पीछे खड़ी हैं। उसकी वजह साफ है।
बंगाल में ममता को टक्कर देने लायक एक भी भाजपा नेता तो छोड़िये कांग्रेस व वाम दल के पास भी कोई चेहरा नहीं है। चूंकि कांग्रेस और वाम दल को ममता ने निष्प्रभावी बना दिया है तो मैदान में ये ही योद्धा बचे हैं- मोदी-शाह-ममता।
यूं गौर करें तो मतदान को विशेष समय नहीं बचा। 23 व 29 अप्रैल को वहां मतदान है और 4 मई को परिणाम आ जाएंगे। यानी एक महीने में खेल खत्म। बचे 22 दिन में बंगाल के आसमान से अंगारे बरसे न बरसे, राजनीतिक शोले खूब बरसने वाले हैं।
ममता भारतीय राजनीति का वो आक्रामक चेहरा है, जो नीति-नियम,मर्यादा,कानून में केवल तब यकीन कर सकती है, जब खुद का फायदा हो। वरना तो वामदल की सरकार को अंगद के पैर की तरह जम जाने के 34 साल बाद 20 मई 2011 को यदि उखाड़ कर फेंक पाई तो इसलिये कि उसने भी वो तमाम हथकंडे अपनाये, जिन्हें आजमा कर वाम सरकार काबिज रही।
तब हैरतअंगेज यह था कि एक महिला होकर ममता ने साम-दाम-दंड-भेद को ऐसे अपनाया, जैसे वह राजनीतिक पाठ्यक्रम का हिस्सा रहा हो। बंगाल की जनता चूंकि वामी अराजकता,अत्याचार से बेजार थी तो ममता को स्वाभाविक लाभ मिल गया।
इसके बाद की कहानी ममता और तृणमूल के वामीकरण की सपाट इबारत है। उन्हें लगा कि बंगाल की जनता शायद इसी भाषा और तौर-तरीके से शासित होने की अधिकारी है तो ममता ने नई लकीर खींचने का झंझट नहीं किया।
मौजूदा चुनाव यही तय करेंगे कि बंगाली जनमानस पुन मूषक भव: को प्राप्त होना पसंद करेगी या मनुष्य यौनि को स्वीकार करेगी। इस समय केवल बंगाल ही नहीं तो पूरे देश के राजनीतिक विश्लेषक इस राज्य के चुनावी चक्रव्यूह पर नजर गड़ाये हुए है। अभी किसी को कोई बड़ा परिवर्तन या लहर नजर नहीं आ रही ।
सिवाय एक विशेष तबके के, जो दावा कर रहा है कि बंगाल में चमत्कार होने जा रहा है। इसका सीधा आशय यह है कि वहां भाजपा की सरकार बन रही है। इसके लिये फिलहाल तो कोई ठोस कारण वे भी नहीं बता पा रहे। न कोई दमदार नेतृत्व, न चमकदार मुद्दे, न ममता एंड कंपनी का बैकफुट पर होना दिख रहा है, न उनके कार्यकर्ताओं में कोई हताशा-निराशा है।
याने जहाज से मेंढ़क कूद कर नहीं जा रहे, जैसा 2021 के चुनाव में थोड़ा बहुत तो हुआ भी था। तब ऐसा क्या होगा, जो भाजपा की 65 सीट को न्यूनतम 148 कर दे, जो 294 सदस्यों वाली विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा है। वह भी तब जब तृणमूल के पास अभी 223 सीट है।
एक दिलचस्प बात तो यह है कि पिछले चुनाव में तृणमूल की सीटें 2016 की 211 सीटों से बढ़कर 215 हो गई थी और भाजपा 2 से उछलकर 77 पर पहुंच गई थी। फिर भी कोई चमत्कार न हो सका, क्योंकि वहां की जनता ने कांग्रेस व वामदल को खारिज कर उनके हिस्से का समर्थन भाजपा को दिया था।
यह देख लेने के बाद धीरे-धीरे वे भाजपा विधायक फिर से तृणमूल में लौट गये, जो भाजपा सरकार बनने पर मंत्री पद की ख्वाहिश में इधर आ गये थे। तब भाजपा की संख्या 77 से घटकर 65 रह गई। तो सबसे पहली बात तो यह कि भाजपा को 65 से 148 सीट तक ले जाने में 83 सीटें तो हर हाल में जीतना होगा।
यहीं काम आयेगा चमत्कार। अब यह चमत्कार क्या हो सकता है? तो ये इस समय कोई नहीं जानता। ममता इस बीच जबरदस्त हमलावर है और किसी भी तरह के हथकंडे की आशंका के मद्देनजर रोज ही कोई आरोप भाजपा या चुनाव आयोग पर मढ़ देती है। मतदाताओं को प्रलोभन और फोकटगीरी तो अपनी जगह है ही, जो तमाम सत्तारू़ढ़ दल करते हैं।
अपने हालिया बयानो में ममता ने कहा कि भाजपा सत्ता में आई तो बंगाल में मांसाहार बंद कर देगी। फिर उसने कहा कि चुनाव आयोग फॉर्म-6 स्वीकार कर रही है, जो बाहर के प्रांत के मतदाताओं को लाकर मताधिकार देने की प्रक्रिया है।
हालांकि राज्य चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि आयोग के पास ऐसा कोई सॉफ्टवेयर ही नहीं है, जिससे किसी का नाम जोड़ा या हटाया जा सके। एसआईआर में एक करोड़ से अधिक नाम हटाने का आरोप ममता लगातार लगा ही रही है।
अब इस मुद्दे पर आते हैं कि ममता बैनर्जी के खिलाफ भाजपा के पास कौन-सा ब्रह्मास्त्र है ? सबसे बड़ा अस्त्र तो बांग्लादेशी व म्यांमार घुसपैठियों को ममता का संरक्षण देना बताया जा रहा है। दूसरा मुस्लिम तुष्टिकरण पर प्रहार किया जा रहा है कि तृणमूल सरकार लौटी तो राज्य को मुस्लिम बहुल राज्य बनने से नहीं रोका जा सकेगा,जो बांग्लादेश से सटे राज्य होने के चलते एक और विभाजन की शुरुआत माना जा रहा है।
गुंडागर्दी,बेरोजगारी,उद्योग-धंधों का ठप होना,महिलाओं पर अत्याचार में वृद्धि,कानून के राज की समाप्ति,केंद्र के साथ टकराव और सामान्य शिष्टाचार तक का पालन नहीं करने जैसे मुद्दे भरपूर प्रचारित किये जा रहे हैं।
इनके अलावा क्या ? यही सवाल अनुत्तरित है। दोनों ही पक्ष अभी तो घोषित तीरों से ही वार कर रहे हैं, लेकिन 15 अप्रैल के बाद बंकर ब्लास्टर बम और बेलेस्टिक मिसाइलें दागी जाना सुनिश्चित है। भाजपा क्षेत्रों में बेचैनी इस बात की ज्यादा है कि यदि दीदी को इस बार नहीं निपटा पाये तो 2031 तक उन्हें बरदाश्त करना दुष्कर हो जायेगा।
पहले चरण में देश भर के भाजपा शासित प्रदेशों की चुनावी रणनीति के महारथियों,मंत्रियों की फौज तो वहां तैनात की जा चुकी है। उनका मुख्य फोकस बंगाल के उच्च वर्ग,मारवाड़ी,कायस्थ,ब्राहम्ण,बिहार,उप्र से आये लोग, व्यापारी, उद्योगपतियों पर है।
मुस्लिम,मूल बंगाली और कर्मचारी तो पूरी तरह ममता के साथ दिख रहा है। कौन जनता के मन में घुसपैठ में कामयाब रहा और कौन अपने तर्कों का लोहा मनवा पाया, यह तो 4 मई को ही पता चल सकेगा। (यह लेखक के नीजि विचार हैं।)
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