बिना मूर्ति का जाग्रत शक्तिपीठ जहां केवल एक रहस्यमयी कुंड के आगे झुकता है संसार
KHULASA FIRST
संवाददाता

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
जमीन के नीचे धड़कता है महाकाली का रहस्यमयी कुंड; रक्तबीज के वध से महाकवि कालिदास की विद्वता तक, तंत्र साधना के सबसे जाग्रत गढ़ ‘कालीमठ’ की अनकही कथा, साल में सिर्फ एक बार हटता है चांदी का रजतपट, मुख्यधारा की चकाचौंध से दूर केदारनाथ मार्ग का सिद्धपीठ चार धाम यात्रा के दुर्गम रास्तों पर केवल भक्ति का सैलाब ही नहीं उमड़ता, बल्कि कुछ ऐसे अलौकिक पड़ाव भी आते हैं जहां विज्ञान की दलीलें और आधुनिक सोच घुटने टेक देती है।
रुद्रप्रयाग जिले में मंदाकिनी और कालीगंगा के पावन संगम पर स्थित ‘कालीमठ’ एक ऐसा ही अनूठा और जाग्रत सिद्धपीठ है।
देश के अन्य तमाम मंदिरों के उलट, यहां मुख्य गर्भगृह में मां काली की कोई पाषाण मूर्ति या विग्रह स्थापित नहीं है। यहां सदियों से जमीन के भीतर समाए एक अत्यंत रहस्यमयी और गहरे कुंड की पूजा की जाती है, जिसे तंत्र साधना का सबसे बड़ा और अभेद्य गढ़ माना जाता है।
रजतपट श्रीयंत्र का पहरा
कालीमठ के मुख्य मंदिर के भीतर जब श्रद्धालु कदम रखते हैं, तो उनकी नजरें किसी दिव्य प्रतिमा को नहीं, बल्कि फर्श पर रखे एक विशाल चांदी के पाट (रजतपट) को निहारती हैं।
इस रजतपट पर पवित्र ‘श्रीयंत्र’ उकेरा गया है, जिसे साक्षात देवी का स्वरूप माना जाता है। यह चांदी की प्लेट नीचे स्थित उस रहस्यमयी कुंड को पूरी तरह ढक कर रखती है।
परंपरा के अनुसार इस आवरण को पूरे साल कभी नहीं हटाया जाता। वर्ष में केवल एक बार, शारदीय नवरात्रि की महाअष्टमी की आधी रात को इस कुंड से चांदी का यह पाट हटाया जाता है, जिसे देखने की अनुमति किसी भी आम भक्त को नहीं होती।
आधी रात की तांत्रिक पूजा, मुख्य पुजारी भी आंखों पर पट्टी बांधकर करते हैं अनुष्ठान... महाअष्टमी की काली रात को होने वाला यह अनुष्ठान इस शक्तिपीठ का सबसे बड़ा रहस्य है।
इस विशेष तांत्रिक पूजा को पूरी तरह गुप्त रखा जाता है और उस दौरान गर्भगृह के भीतर किसी भी बाहरी व्यक्ति या कैमरे का प्रवेश पूरी तरह वर्जित होता है।
स्थानीय मान्यताओं और परंपरा के अनुसार, कुंड के भीतर की असीम ऊर्जा और देवी के रौद्र रूप के तेज को सामान्य आंखों से देखना असंभव है।
यही कारण है कि मंदिर के मुख्य पुजारी भी पूरी गोपनीयता, कठोर नियमों और विशेष आध्यात्मिक साधना के साथ इस मध्यरात्रि की पूजा को संपन्न करते हैं।
महाअसुर रक्तबीज का अंत
स्कंद पुराण और देवी महात्म्य के पन्ने इस स्थान की अलौकिकता की गवाही देते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी भूमि पर मां काली ने महिषासुर के पुनर्जन्म रूप यानी महा-भयानक असुर ‘रक्तबीज’ का वध किया था।
रक्तबीज के शरीर से गिरने वाली हर एक बूंद से नया राक्षस पैदा हो रहा था, जिसे रोकने के लिए मां ने उसका सारा रक्त अपने मुख में समेट लिया था। वध के बाद जब संसार सुरक्षित हुआ, तब मां काली का क्रोध शांत हुआ और वे इसी स्थान पर भूमि के भीतर अंतर्ध्यान हो गईं।
वह पवित्र कुंड वही स्थान है जहां से माता पृथ्वी के गर्भ में समाई थीं। मंदिर के समीप ही आज भी वह ‘रक्तशिला’ मौजूद है, जहां राक्षस का शीश काटा गया था।
अखंड धूनी की चमत्कारी भस्म
कालीमठ केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि अघोर और तंत्र क्रियाओं से जुड़े साधकों की तपोभूमि भी है। यहां मंदिर परिसर में एक अखंड धूनी (अग्नि कुंड) सदियों से निरंतर प्रज्वलित है।
इस धूनी की राख या भस्म को तंत्र साधना में बेहद चमत्कारी और सुरक्षा कवच के रूप में अचूक माना जाता है। यहां महाकाली कुंड के साथ-साथ महालक्ष्मी और महासरस्वती के भी प्राचीन मंदिर हैं, जो त्रि-देवी की सामूहिक ऊर्जा का संचार करते हैं।
मान्यताओं के अनुसार, इसी सिद्धपीठ में आकर महाकवि कालिदास ने मां काली की घोर आराधना की थी और कुंड की असीम कृपा से ही उन्हें अद्वितीय विद्वता और ज्ञान का वरदान मिला था।
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