जहां काल के वश में भी नहीं आता कबूतरों का जोड़ा: अमरकथा का साक्षी अमरनाथ; उस रहस्यमयी गुफा की दास्तान
KHULASA FIRST
संवाददाता

पहाड़ों में छिपी अमरता की कहानी: विज्ञान के लिए आज भी अनसुलझी पहेली है बाबा बर्फानी की ये गुफा
चंद्रमा की चाल से तय होता है हिमलिंग का आकार, आस्था की डगर पर सदियों से अटल है ये विश्वास
दुर्गम रास्तों से डिजिटल सुरक्षा तक, बदल गए महादेव की यात्रा के तौर-तरीके, मगर नहीं बदला रोंगटे खड़े करने वाला अहसास
शून्य डिग्री तापमान में भी जहां गूंजती है अमरकथा, बर्फ के साम्राज्य में कौतूहल जगाता है परिंदों का वो जोड़ा
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले में समंदर तल से करीब 13,000 फीट की ऊंचाई पर जब बर्फीली हवाएं चेहरे को छूती हैं, तो शरीर भले ही कांप उठे, लेकिन मन ‘बम-बम भोले’ के जयकारों से गर्म हो जाता है।
यह महादेव की वह डगर है, जहां हर कंकड़ में शंकर का वास माना जाता है, लेकिन इस पूरी यात्रा का जो मुकुट है, वह है अमरनाथ की रहस्यमयी गुफा। यह महज एक गुफा नहीं, बल्कि आस्था, विज्ञान, इतिहास और अनसुलझे रहस्यों की एक ऐसी जीवंत किताब है, जिसके पन्ने आज भी हर किसी को हैरान कर देते हैं।
अमरकथा का एकांत: जब महादेव ने खोजा सृष्टि का सबसे गुप्त कोना
पौराणिक मान्यताएं कहती हैं कि जब माता पार्वती ने भगवान शिव से उनके अमर होने का रहस्य जानना चाहा, तो महादेव एक ऐसी जगह की तलाश में निकल पड़े जहां कोई तीसरा जीव इस परम ज्ञान को न सुन सके।
इस ‘अमरकथा’ को पूरी तरह गुप्त रखने के लिए शिव ने अपनी हर प्रिय चीज का त्याग किया। उन्होंने पहलगाम में अपने वाहन को छोड़ा, चंदनवाड़ी में अपनी जटाओं से चंदन उतारा, शेषनाग झील पर अपने गले के सांपों को विदा किया, महागुनस पर्वत पर अपने पुत्र गणेश को पीछे छोड़ दिया और पंचतरणी पर पांचों तत्वों का परित्याग कर दिया।
आखिर में महादेव ने इस एकांत गुफा में प्रवेश किया। कथा के अनुसार जब शिव माता पार्वती को अमरता का पाठ सुना रहे थे, तब गुफा के भीतर एक सूखी घास के नीचे दो अंडे दबे थे।
शिव के मुख से निकली अमरकथा के प्रभाव से वे अंडे फूट गए और उनमें से दो कबूतर निकले, जो अमर हो गए। आज भी, जब इस गुफा के चारों तरफ मीलों तक सिर्फ बर्फ का साम्राज्य होता है, जहां हाड़ कंपा देने वाली ठंड में किसी परिंदे का जीवित रहना नामुमकिन है, तब श्रद्धालुओं को अचानक कबूतरों का एक जोड़ा उड़ता हुआ दिखाई दे जाता है। काल भी इन कबूतरों का कुछ नहीं बिगाड़ पाया, इसीलिए इन्हें ‘अमर पक्षी’ कहा जाता है।
गुफा का भूगर्भीय महत्व और अनसुलझे सवाल
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो यह गुफा चूना पत्थर की बनी एक विशाल संरचना है। इसकी लंबाई करीब 150 फीट और ऊंचाई 90 फीट के आसपास है।
भूवैज्ञानिकों के अनुसार, इन चोटियों में ग्लेशियरों के पिघलने और चट्टानों के बीच से पानी के रिसाव के कारण इस तरह की गुफाओं का निर्माण लाखों वर्षों की प्राकृतिक प्रक्रिया में हुआ है, लेकिन इस गुफा के भीतर जो घटित होता है, उसका जवाब विज्ञान के पास भी अधूरा है।
अमरनाथ गुफा की सबसे बड़ी विशेषता है वहां प्राकृतिक रूप से बनने वाला ‘हिमलिंग’। गुफा की छत पर जमी बर्फ जब बूंद-बूंद टपकती है, तो नीचे का तापमान शून्य से बहुत कम होने के कारण वह ठोस बर्फ के स्तंभ का रूप ले लेती है।
कौतूहल का विषय यह नहीं है कि बर्फ जमी कैसे, बल्कि कौतूहल इस बात पर है कि यह बर्फ चंद्रमा के चक्र के साथ तालमेल बिठाकर चलती है।
चंद्रमा की कलाओं के साथ हिमलिंग का घटना-बढ़ना... आध्यात्मिक मान्यता के अनुसार, शुक्ल पक्ष में जैसे-जैसे चंद्रमा का आकार बढ़ता है, वैसे-वैसे हिमलिंग का स्वरूप भी भव्य होता जाता है।
पूर्णिमा के दिन यह अपने पूर्ण आकार में आता है और इसके बाद कृष्ण पक्ष में चंद्रमा के घटने के साथ ही इसका आकार भी छोटा होने लगता है। अमावस्या तक यह हिमलिंग पूरी तरह अंतर्ध्यान या बेहद सूक्ष्म हो जाता है।
भक्त इसे साक्षात शिव का चमत्कार मानते हैं, जो चंद्रमा को अपने शीश पर धारण करते हैं। वहीं दूसरी ओर, विज्ञान का मानना है कि गुफा के ऊपर स्थित ग्लेशियरों से पानी के रिसाव का दबाव चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण और रात-दिन के तापमान के अंतर से प्रभावित होता है।
हालांकि, यह थ्योरी भी इस बात को शत-प्रतिशत साबित नहीं कर पाती कि ठीक उसी आकार और उसी तिथि पर यह संतुलन हर साल कैसे बैठ जाता है।
इसके अलावा, मुख्य शिवलिंग के साथ-साथ दो छोटे बर्फ के स्तंभ भी बनते हैं, जिन्हें माता पार्वती और भगवान गणेश का प्रतीक माना जाता है।
आस्था की शाश्वत लौ.. बदलते दौर में तकनीक ने भले ही पहाड़ों को छोटा कर दिया हो, टेंटों में वाई-फाई आ गया हो और रास्ते सुगम हो गए हों, लेकिन अमरनाथ गुफा के भीतर कदम रखते ही जो रोंगटे खड़े होते हैं, वह अहसास आज भी वही है जो सदियों पहले किसी साधक को हुआ होगा।
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