करवट बदली तो जाग उठी आस्था: कृष्ण कन्हाई के जलवा पूजन में लीन हुआ इंदौर
KHULASA FIRST
संवाददाता

डोल ग्यारस के रूप में इंदौर आज पूरे उत्साह के साथ मनाएगा एक बड़ा लोकोत्सव
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
धर्म और संस्कृति की राजधानी इंदौर आज जलझूलनी (डोल) ग्यारस के पावन अवसर पर भक्ति और पराक्रम के अनूठे संगम की साक्षी बनेगी। शहर के पारंपरिक मार्गों पर भगवान विष्णु और बालकृष्ण के विग्रह आकर्षक डोल (विमान) में सवार होकर भक्तों को दर्शन देने निकलेंगे।
इस महा-आयोजन में जहां एक ओर शहर के अखाड़ों के उस्ताद और खलीफा अपनी जांबाज टोलियों के साथ तलवारबाजी, लाठी और पट्टे जैसी हैरतअंगेज पारंपरिक शस्त्र कलाओं का प्रदर्शन करेंगे, वहीं दूसरी ओर विद्युत रोशनी से नहाई भव्य झांकियां और झिलमिलाती झांझ-मंजीरों की थाप पूरे माहौल को भक्तिमय बनाएगी। उत्सव को लेकर राजवाड़ा सहित पूरे मध्य क्षेत्र में सुरक्षा और ट्रैफिक के विशेष इंतजाम किए गए हैं।
डोल ग्यारस (जिसे परिवर्तिनी एकादशी, जलझूलनी एकादशी, पद्मा एकादशी या वामन एकादशी भी कहा जाता है) सनातन धर्म का एक अत्यंत पवित्र त्योहार है। यह भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। ‘डोल' का शाब्दिक अर्थ सुंदर सजा हुआ विमान, पालकी या छोटा रथ होता है।
डोल ग्यारस के दिन भगवान श्रीकृष्ण के बालरूप (बालमुकुंद) या श्री शालिग्राम की मूर्ति को एक आकर्षक रूप से सजे हुए काठ (लकड़ी) या पीतल के विमान (पालकी) में विराजमान किया जाता है। इसी पालकी को ‘डोल' या ‘रामरेवाड़ी' कहा जाता है। इस दिन देश के कई हिस्सों, विशेषकर मध्य प्रदेश और राजस्थान में मंदिरों से ठाकुरजी की भव्य शोभायात्रा या चल-समारोह निकाला जाता है और जलयात्रा और नौका विहार होता है।
भगवान के डोल को गाजे-बाजे, ढोल-मंजीरों और अखाड़ों के करतबों के साथ नगर भ्रमण कराते हुए किसी पवित्र नदी, तालाब या जलाशय के घाट पर ले जाया जाता है। जलाशय पर ले जाकर भगवान की मूर्ति को जल से स्नान कराया जाता है (जिसे जलझूलनी कहा जाता है) और फिर उनकी आरती कर उन्हें नए वस्त्र और भोग अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद शाम को डोल वापस मंदिर लौटते हैं।
कृष्ण का जलवा पूजन... आज भगवान विष्णु करवट भी बदलते हैं... डोल ग्यारस मनाने और डोल निकालने के पीछे मुख्यत: तीन बड़ी धार्मिक मान्यताएं और भाव जुड़े हैं। पहला है श्रीकृष्ण का जलवा (कुआं) पूजन। पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के 18वें दिन माता यशोदा ने उनका ‘जलवा पूजन' यानी सूर्य और घाट (कुआं) पूजन किया था।
हिंदू धर्म में बच्चे के जन्म के बाद होने वाले इसी संस्कार और शुद्धि की खुशी में भगवान के बालरूप को पहली बार डोल में बैठाकर नगर भ्रमण कराया जाता है। भगवान विष्णु का करवट बदलने से भी इस पर्व पहचान है। चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु क्षीरसागर में योग निद्रा में होते हैं। माना जाता है कि भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन ही भगवान विष्णु सोते हुए करवट बदलते हैं। स्थान परिवर्तन (करवट लेने) के कारण ही इसे ‘परिवर्तिनी एकादशी' भी कहा जाता है।
इसी तिथि पर भगवान विष्णु ने राजा बलि का अहंकार चूर करने और देवताओं की रक्षा के लिए अपना प्रसिद्ध वामन अवतार लिया था, इसलिए इस दिन वामन भगवान की पूजा का भी विशेष भाव रहता है। इस पर्व को मनाने का मुख्य भाव यह है कि भक्त अपने आराध्य को केवल मंदिर के गर्भगृह तक सीमित न रखकर, उन्हें अपने नगर और गलियों में लाते हैं, ताकि हर कोई भगवान के बालरूप का दर्शन कर सके और आनंदोत्सव में शामिल हो सके।
इंदौर की वैभवशाली होलकर परंपरा और लोक-संस्कृति का सबसे जीवंत रंग आज डोल ग्यारस के चल समारोह में नजर आएगा। ढोल-ताशों की गड़गड़ाहट के बीच जब अखाड़ों के जांबाज पहलवान अपने हैरतअंगेज करतबों से हवा में शस्त्र लहराएंगे, तो इंदौरियों का सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा।
इस बार का चल समारोह बेहद खास होने जा रहा है, जिसमें शहर के प्रमुख मंदिरों के डोल के साथ-साथ विशेष रूप से तैयार की गईं सामाजिक और धार्मिक संदेश देतीं झांकियां मुख्य आकर्षण होंगी। भगवान के जलविहार और इस अद्भुत शौर्य प्रदर्शन को निहारने के लिए लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने की उम्मीद है।
देशभर में मशहूर है बिजलपुर की डोल ग्यारस, रतजगा होगा
इंदौर में डोल ग्यारस पर्व का माहौल बेहद भव्य, पारंपरिक और उल्लास से भरा रहता है। मालवा संस्कृति में डोल ग्यारस (जलझूलनी एकादशी) का एक विशेष स्थान है और इस दिन पूरा इंदौर शहर भक्ति के रंग में डूब जाता है। झांकियों की तरह शाम को एक विशाल और ऐतिहासिक चल समारोह (शोभायात्रा) निकाला जाता है। इस चल समारोह की सबसे बड़ी विशेषता पारंपरिक अखाड़े होते हैं।
शहर की विभिन्न व्यायामशालाओं और अखाड़ों के उस्ताद और युवा कलाकार तलवारबाजी, लाठी, पट्टा और बनेठी चलाने जैसे हैरतअंगेज और साहसिक करतब दिखाते हुए चलते हैं। पूरे रास्ते ढोल-ताशे, झांझ-मंजीरे और डीजे पर बजने वाले श्रीकृष्ण के भजनों से पूरा माहौल गुंजायमान रहता है।
श्रद्धालु जगह-जगह मंच लगाकर चल समारोह का स्वागत करते हैं। शहर के सभी प्रमुख वैष्णव और कृष्ण मंदिरों जैसे पंढरीनाथ मंदिर, यशोदा माता मंदिर, बांके बिहारी मंदिर से भगवान के डोल बाहर निकाले जाते हैं। विभिन्न समाज के डोल भी इसमें शामिल होते है।
यदि आप इंदौर में डोल ग्यारस का सबसे बड़ा और पारंपरिक रंग देखना चाहते हैं, तो इंदौर का बिजलपुर क्षेत्र इसके लिए पूरे मालवा में प्रसिद्ध है। यहां डोल ग्यारस पर एक बहुत बड़ा मेला लगता है। यहां ग्रामीण और शहरी संस्कृति का अनोखा संगम देखने को मिलता है, जहां रातभर झांकियों का दौर और अखाड़ों का प्रदर्शन चलता है।
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