वीडियो देखिये, जगन्नाथ रथयात्रा की अनोखी परंपरा: केवल आस्था और भक्ति का उत्सव नहीं; जमीन पर बहा दिया जाता है प्रसाद
KHULASA FIRST
संवाददाता
खुलासा फर्स्ट, पुरी।
भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा केवल आस्था और भक्ति का उत्सव ही नहीं, बल्कि सदियों पुरानी रहस्यमयी परंपराओं का भी जीवंत संगम है। इन परंपराओं में सबसे अनोखी रस्म 'अधर पना' मानी जाती है। इस अनुष्ठान में भगवान को अर्पित किए गए विशेष पेय को न तो श्रद्धालुओं में बांटा जाता है और न ही मंदिर के सेवायत उसका सेवन करते हैं। इसके बजाय मिट्टी के बड़े घड़ों को रथ पर ही फोड़ दिया जाता है, जिससे पूरा प्रसाद जमीन पर फैल जाता है। पहली नजर में यह परंपरा भले ही सामान्य लगे, लेकिन इसके पीछे गहरा धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व बताया जाता है।
रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा अपने-अपने भव्य रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर की यात्रा करते हैं। इस दौरान लाखों श्रद्धालु भगवान के दर्शन और रथ खींचने के लिए उमड़ते हैं। यात्रा के समापन चरण में 'अधर पना' की विशेष रस्म संपन्न होती है, जिसे जगन्नाथ संस्कृति का अत्यंत महत्वपूर्ण अनुष्ठान माना जाता है।
क्या होता है अधर पना?
'अधर' का अर्थ होंठ और 'पना' का अर्थ विशेष पेय या शरबत होता है। यह पेय दूध, गुड़, पनीर, केला, चीनी, जायफल, इलायची तथा अन्य सुगंधित मसालों से तैयार किया जाता है। इसके बाद इसे मिट्टी के बड़े-बड़े घड़ों, जिन्हें स्थानीय भाषा में लाठिया कहा जाता है, में भरकर भगवान के रथ पर उनके अधरों की ऊंचाई तक रखा जाता है। पूजा-अर्चना के बाद इन घड़ों को जानबूझकर रथ पर ही तोड़ दिया जाता है, जिससे पूरा पेय रथ और उसके आसपास की भूमि पर फैल जाता है।
भक्तों को क्यों नहीं दिया जाता यह प्रसाद?
जगन्नाथ धाम की परंपराओं के अनुसार यह संभवतः एकमात्र ऐसा भोग माना जाता है जिसे न श्रद्धालु ग्रहण करते हैं और न ही मंदिर के पुजारी। लोकमान्यताओं के अनुसार यह प्रसाद उन अदृश्य शक्तियों, अतृप्त आत्माओं और पितरों को समर्पित किया जाता है, जो रथयात्रा के दौरान भगवान के दर्शन और कृपा प्राप्त करने के लिए पुरी पहुंचते हैं। मान्यता है कि भगवान की करुणा केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि वे समस्त सृष्टि और दृश्य-अदृश्य सभी प्राणियों पर समान रूप से कृपा बरसाते हैं। इसी भावना के साथ अधर पना का प्रसाद भूमि पर अर्पित किया जाता है।
आत्माओं की तृप्ति और मोक्ष का प्रतीक
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रथयात्रा में केवल भक्त ही नहीं, बल्कि वे आत्माएं भी शामिल होती हैं जिन्हें अभी तक मोक्ष प्राप्त नहीं हुआ है। माना जाता है कि भगवान के अधरों से स्पर्शित इस दिव्य पेय को प्राप्त कर ऐसी आत्माओं को तृप्ति मिलती है और उनके कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।
रथ पर ही क्यों फोड़े जाते हैं घड़े?
परंपरा के अनुसार रथों के पहियों, लकड़ी के विभिन्न भागों और उनके आसपास अनेक पार्श्व देवताओं तथा अदृश्य शक्तियों का वास माना जाता है। इसलिए मिट्टी के घड़ों को रथ पर ही तोड़ा जाता है, ताकि पेय रथ के सभी हिस्सों और भूमि पर फैल जाए तथा सभी अदृश्य शक्तियां उसे ग्रहण कर सकें।
नकारात्मक शक्तियों को शांत करने की मान्यता
जगन्नाथ परंपरा में यह भी विश्वास किया जाता है कि रथयात्रा के दौरान ब्रह्मांड की सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार की शक्तियां पुरी धाम में उपस्थित रहती हैं। अधर पना की रस्म के माध्यम से भगवान स्वयं इन शक्तियों को संतुष्ट और शांत करते हैं, जिससे सृष्टि में संतुलन और मंगल बना रहे। इसी आध्यात्मिक संदेश के कारण अधर पना केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भगवान जगन्नाथ की सर्वसमावेशी करुणा, समभाव और समस्त सृष्टि के कल्याण की भावना का प्रतीक माना जाता है।
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